कोरोना काल: सोशल मीडिया पर विधवा पुनर्विवाह को लेकर सार्थक चर्चा
सोशल मीडिया पर इन दिनों जब कोराना छाया हुआ है तब विधवा विवाह जैसे सामाजिक मुद्दे पर बहस में लोगों का उत्साह और बेबाकी दिखाना आकर्षित करता ही है। हम सभी मानते हैं कि विधवा विवाह इस देश में आज भी एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लिए समाज के सामने उपस्थित है। कानून हैं, शिक्षा का स्तर भी बढ़ा है, विकास की दौड़ भी तेज हुई है, सामाजिक सवालों पर वैचारिक स्वीकार्यता भी पहले की अपेक्षा बढ़ी है। इस सबके बावजूद विधवा विवाह का सवाल आज भी समाज और परिवार के लोगों में असमंजस की स्थिति पैदा करता दिखाई देता है।
हाल ही में सोशल मीडिया के एक सामाजिक ग्रुप 'कायस्थ परिवार' में विधवा विवाह पर सार्थक चर्चा हुई। प्रश्न था- कन्या विवाह की तरह विधवा विवाह भी पारिवारिक जिम्मेवारी होनी चाहिए या नहीं। इस ग्रुप में देश भर के सामाजिक चिंतकों, पत्रकारों के अलावा मध्यम एवं शिक्षित वर्ग के लोग ही ज्यादा हैं। सबसे बड़ी बात ग्रुप में महिलाओं की संख्या पुरुषों की अपेक्षा ज्यादा हो या ना हो, सवालों पर रायशुमारी में उनकी शिरकत और बेबाकी ज्यादा झलकती है।
कहने का मतलब यह कि सामाजिक सरोकारों से जुड़ी बहस में महिलाएं उत्साह से भाग ही नहीं लेतीं, अपितु उनके मन की छटपटाहट यह दर्शाती है कि कहीं ना कहीं महिलाओं से जुड़े सवालों पर वे सामाजिक स्तर पर न्याय भी चाहती हैं और परिस्थितियों में बदलाव की पक्षधर भी हैं।
सामाजिक ग्रुप में अनुमानित 83 हजार सदस्य हैं। इनमें 600 से अधिक सक्रिय सदस्यों ने अपने विचार बेबाकी के साथ रखे। उल्लेखनीय बात यह कि इनमें 80 फीसदी के लगभग महिलाएं थीं। सभी ने एक स्वर से विधवा विवाह का समर्थन ही नहीं किया बल्कि इस दिशा में समाज को जागरूक और चैतन्य बनाने के कार्यक्रमों को और अधिक तरजीह देने की जरूरत बताई।
अनिता शरण ने केवल नि:संतान विधवाओं के विवाह के पक्ष में अपनी राय दी। उनका मानना था कि बच्चे होने के कारण नए घर में कई तरह की समस्याएं उत्पन्न होती हैं, जिसका खामियाजा महिला को ही भुगतना पड़ता है। इस कारण बच्चों वाली विधवा के विवाह नहीं करने का सुझाव उन्होंने दिया।
आगरा की 75 वर्षीय कुमुदिनी सिन्हा ने भी विधवा विवाह का पक्ष लेते हुए जहां मुंशी प्रेमचंद के पुनर्विवाह की चर्चा करते हुए बताया कि आर्य समाज की सामाजिक क्रांति के परिणाम स्वरूप वर्षों पहले विधवा विवाह की शुरुआत हुई। खासकर यूपी और पंजाब में विधवा आश्रम की महिलाओं के साथ नौजवान विवाह करने लगे थे। लेकिन सामाजिक स्तर पर इस दिशा में अभी और काम करने की जरूरत है।
इधर जया प्रसाद का कहना था कि पाश्चात्य संस्कृति के बढ़ते प्रभाव के कारण विधवा एवं विधुरों को लेकर सामाजिक विकृतियां पैदा होने के भय को टालने का उपाय पुनर्विवाह ही है। अतः इनकी गृहस्थी दोबारा बसा दी जानी चाहिए। नीतू दत्ता के अनुसार समाज की सोच अब बदलने लगी है। विधवा विवाह के गिने चुने उदाहरण आजकल देखने को मिल जाते हैं। लेकिन इसे अभी और गति देने की जरूरत है। ताकि प्रभावित महिलाओं के जीवन में बदलाव आए।
आईएम कुदेशिया का कहना था कि केवल विधवा का ही क्यों तलाकशुदा का भी विवाह कराया जाना चाहिए। विवाह में अत्यधिक विलंब भी समाज में बड़ी समस्या बनता है। यू कानूनगो ने विधवा/विधुर पुनर्विवाह का समर्थन करते हुए कहा इस प्रक्रिया में कभी कभी संपत्ति के मामले बाधक बनते हैं।
वहीं गोपाल श्रीवास्तव का विचार था कि किसी भी विधवा स्त्री को अपने जीवन में खुशियां ढूंढने का पूरा अधिकार है। पति के जाने के बाद अकेलापन उसका पूरा जीवन खोखला कर देता है। ऐसे में अगर कोई जरूरतमंद साथी मिल जाता है तो निश्चित रूप से उसे पुनर्विवाह कर लेना चाहिए। यह बात स्त्री-पुरुष दोनों पर लागू होती है। लेकिन इससे जिनके स्वार्थ प्रभावित होते हैं वो तो विरोध करेंगे ही।
बहस में व्यक्त विचारों से यह तो स्पष्ट है ही कि लोग सामाजिक भय को दरकिनार करते हुए विधवा या विधुर पुनर्विवाह के पक्षधर होते जा रहे हैं। लेकिन ऐसे परिवार जहां विधुर या विधवा है, वे सामने आने में अभी भी हिचकिचाते हैं। केवल रूपम कुमारी ने यह बताया कि उन्होंनेे स्वयं अपनी ननद का 44 वें वर्ष में दूसरा विवाह कराया और एक अन्य युवा ने यह घोषणा ही कर दी कि यदि उपयुक्त प्रस्ताव आता है तो वह विधवा अथवा तलाकशुदा के साथ विवाह करने को तैयार है।
निश्चित ही ऐसे प्रयासों और घोषणाओं से समाज में चेतना संचार होता है। सामाजिक न्याय के मुद्दों पर लोगों और खासकर महिलाओं में हिचकिचाहट अथवा संकोच दूर होना आवश्यक है। नौजवानों ही नहीं समाज के अग्रणियों और वरिष्ठों को इस दृष्टि से आगे आना चाहिए, तभी तस्वीर बदलेगी।
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