कोरोनाकाल में नकली दवाएं और बढ़ती कालाबाजारी: महामारी में भी नहीं पसीजे मौत के बेशर्म सौदागर
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सच में आपदा के मौके पर भी अगर किसी की इंसानियत मर गई तो वह जीते जी मुर्दे से भी बदतर है। इससे बड़ा मौजूदा सवाल यह कि भरोसा किस पर करें? उन दवा विक्रेताओं पर जिन्हें हर कोई बहुत ही आशा भरी निगाहों से देखता है या नहीं? उससे भी बड़ा सच यह कि मोहल्ले में हर किसी को पहला इलाज यानी फर्स्ट एड देने वाला वही होता है, लेकिन नकली इंजेक्शन और दवाओं का कोरोना महामारी की आपदा के बीच जो भंडाफोड़ हुआ, उससे दवा विक्रेताओं की नीयत पर सवाल जरूर उठ खड़ा हुआ है। लेकिन सभी कुसूरवार हैं यह हरगिज नहीं। चंद विक्रेताओं से लेकर कुछ फार्मा कंपनियों की मिली भगत की जो सच्चाइयां सामने आई हैं, उसने हर किसी को हैरान और परेशान कर दिया है।
बेशक आपदा के इस अवसर में कागज की दौलत को अपना भगवान बनाने वाले चंद कथित हत्यारों के चलते हर कहीं इन्हें शक से देखा जाना गलत होगा, लेकिन कहते हैं न एक मछली से सारा तालाब गंदा हो जाता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि सबसे बेदाग, असली और भरोसे की दुकान देश में केवल दवाओं की मानी जाती थी। अब इसमें भी चंद मुनाफाखोरों ने बट्टा लगा दिया। क्या शहरी क्या गांववाले, सबका पहला डॉक्टर दवाई वाला ही होता है।
हद तो तब हो गई कि कोरोना महामारी पर सबसे असरकारक कहे जाने वाले रेमडेसिविर इंजेक्शन के तार नेपाल से जुड़ते दिखे। उसके बाद तो जैसे पूरे देश में जहां-तहां मामले मिलने से लोग सकते में हैं। न्यूमोनिया में काम आने वाले पाउडर से नोएडा जैसे शहर में तो कहीं नमक और ग्लूकोज से बने इंजेक्शन को जबलपुर में खपाए जाने के मामले ने जैसे होश उड़ा दिए।
इसके अलावा मोरपेनम जेनरिक इंजेक्शन का लेबल बदल रेमडेसिविर में तब्दील किए जाने तक घिनौना काम नक्कालों ने कर इंसानियत को ही दागदार कर दिया। ऐसा नहीं है कि यह केवल छोटे स्तर पर हो रहा हो। इसमें बड़े-बड़े लोगों के शामिल होने रोजाना कोई न कोई खुलासा हो रहा है। उप्र में तो एक पूर्व मंत्री का भांजा भी पकड़ा गया। मौजूदा तय दामों 900 रुपये से लेकर 3500 रुपये में बिकने वाले असली इंजेक्शन की कमी के चलते नकली इंजेक्शन 35 हजार से 50 से 75 हजार और एक लाख रुपये तक में कालाबाजार में बिकने लगा, तभी शक ही सही सबको खेल समझ आने लगा।
हैरान कर देने वाली सच्चाई तो और भी डराती है। कमाई के इस काले कारोबार में जिन अस्पतालों से नई जिन्दगी की आस होती है, अगर वही जिंदगी की नाश में शामिल हो जाए तो भरोसा किस पर किया जाए?
मप्र के जबलपुर में तो हद ही हो गई जब नकली दवाओं में एक थोक व्यापारी और अस्पताल के संचालक की मिलीभगत सामने आई। ओमती थाना पुलिस ने इन पर तमाम रसूखदारों के आशीर्वाद को दरकिनार कर एफआईआर कर ली। समाज में खासा रुतबा और प्रतिष्ठा के बावजूद जान देने वाले ही जब जानलेवा बन जाएं तो विडंबना ही है। इनसे निपटना वैसी ही चुनौती है जैसे आस्तीन में सांप लिए घूमना। जबलपुर के सिटी हस्पताल के डायरेक्टर सरबजीत सिंह मोगा के अलावा दवा कारोबारी सपन जैन, देवेश चौरसिया पर भी मामला दर्ज होने से पूरा प्रदेश और देश तक भौंचक्का है।
कुछ दिन पहले गुजरात की मोरबी पुलिस ने नकली रेमडेसिविर इंजेक्शन बनाने वाले गिरोह का पर्दाफाश किया और इसके जबलपुर सहित देशभर में जहां-तहां कनेक्शन होने पर एक बड़े दवा कारोबारी को गिरफ्तार भी किया। मामला कितना बड़ा और किस तरह नकली इंजेक्शन से नोट छापने का है इससे ही पता लगता है कि पुलिस ने इनसे 90 लाख रुपये और 3370 नकली रेमडेसिविर इंजेक्शन जप्त किए तथा 7 आरोपी गिरफ्तार किए।
इन्दौर में भी दो दिन पहले विजय नगर पुलिस ने रेमडेसिविर के नकली इंजेक्शन को बेचते कुछ लोगों को पकड़ा, जिनमें एक हॉस्पिटल का डॉक्टर है। फिलाहाल 11 आरोपियों समेत 14 इंजेक्शन जप्त हो चुके हैं। यहां भी गुजरात में कनेक्शन मिला है। ये मौत के सौदागर सोशल मीडिया पर मदद की दुहाई देकर महंगे दाम में नकली इंजेक्शन बेचते थे।
हरिद्वार से भी एक बड़ी चेन जुड़नी शुरु हुई। मामले में 26 अप्रेल को दिल्ली से साधना शर्मा नाम की महिला को संदिग्ध लगने पर निगरानी रखी गई, जिसके बाद तो पूरे गिरोह के तार खुलने लगे। पुलिस ने जाल फैलाया और उत्तराखण्ड के पौड़ी जिले के कोटद्वार तक जा पहुंची। यहां नेक्टर हर्ब्स एंड ड्रग्स के नाम से लीज पर ली हुई कंपनी आदित्य गौतम द्वारा चलाई जा रही थी जो दूसरी एंटी बायोटिक दवाईयों से नकली रेमडेसिविर इंजेक्शन तैयार कराने लगा।
कुछ इंजेक्शन के लेबल हटाकर उन पर रेमडेसिविर के लेबल लगाने लगा। धीरे-धीरे अपने नेटवर्क के जरिये पूरे देश में मुंहमांगे दामों में बेचने लगा। मामले में दिल्ली पुलिस ने कई गिरफ्तारियों के साथ 198 नकली इंजेक्शन, 3000 खाली शीशियां, पैकिंग मशीने, नकली रैपर्स, पैकिंग का अन्य सामान, दूसरी कंपनी की एंटीबायोटिक दवाईयां, कंप्यूटर और कुछ गाड़ियां जप्त की है।
प्रधानमंत्री की जेनरिक दवाओं की परिकल्पना के बावजूद लोगों को सस्ती दवा न मिलने का सच भी इसी में छुपा है। रेमडेसिविर की कमी के बाद कालाबाजारी तक तो मामला समझ आता है, लेकिन नकली इंजेक्शन वह भी केवल नमक और ग्लूकोज से दवा फैक्ट्री में तैयार करने को जितना भी घिनौना, शर्मनाक, घोर आपराधिक कहा जाए कम है। इन्हें सामूहिक नरसंहार का दोषी भी कहना बेजा नहीं होगा।
यकीनन इस सच से दुनिया के सामने भारत की छवि को कितना गहरा धक्का लगा है, जिसका आकलन नामुमकिन है। सामान्य दिनों में विदेशों से आने वाले सैलानियों से लेकर तमाम दूतावासों और यहां पर आए हजारों विदेशियों के दिमाग में क्या चलेगा, सोचकर भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। दवा नक्कालों को मौत का सौदागर या बीहड़ के खूंखार अपराधी से भी बड़ा कहना बिल्कुल गलत नहीं होगा।
लगता नहीं कि अब दवा बनाने और बेचने पर सख्ती होनी चाहिए। निगरानी और जांच तंत्र को पुख्ता और ऑनलाइन होना चाहिए। कम से कम जीवन रक्षक और महंगी दवाओं का ऑनलाइन डेटा हो, जिसमें बैच से लेकर एक्पायरी तक की पारदर्शिता की जानकारी आम और खास को हो ताकि कालाबाजारी पर रोक लगे। इन सबसे बढ़कर यह कि क्या कभी नकली इंजेक्शन से जान गंवा चुके लोगों का पता लग पाएगा भी या नहीं?
सच में इंसानियत को शर्मसार कर देने वाली इस सच्चाई का जवाब शायद यमराज के पास भी नहीं होगा, क्योंकि कहते हैं वह तो बस मौतों का हिसाब किताब करता है, मौत के सौदागरों से दी हुई मौतों का नहीं! कानून की सख्ती की बात तो की जा सकती है, लेकिन नकली इंजेक्शन से हुए नरसंहारों पर सार्वजनिक फांसी दिए जाने की बात करना भी अपराध ही होगा। इतनी तो उम्मीद की जा सकती है कि इन मौत के सौदागरों का हर कहीं फास्ट ट्रायल कोर्ट में मामला चले और इन्हें भी वही सजा मिले जिसका दर्द कीमत चुकाकर भी लोगों ने झेला है ताकि आगे नक्कालों से महामारी में मौतों का आंकड़ा न बढ़े।
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