कोरोना से जंग: भारत तो सभी मित्र देशों को दवा देगा, लेकिन अमेरिका ना करे भारत के हितों की अनदेखी
भारत के फ़ैसले ने दुनिया के चौधरी डोनाल्ड ट्रंप को बड़ी राहत मिली होगी। अपने देश में कोरोना के संकट के मद्देनज़र उन्होंने सारी दुनिया को दवा निर्यात पर पाबंदी लगा दी थी। उसके बाद भारत में इस बीमारी का ख़तरा बढ़ा तो उसने भी निर्यात रोक दिया। अगर हिन्दुस्तान ने निर्यात पर पाबंदी न हटाई होती तो अमेरिका, ब्राज़ील और बाक़ी पड़ोसियों के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती थीं। हालांंकि भारत जैसे बड़ेे देश के लिए हाईड्रॉक्सी क्लोरोक्वीन की अपनी ज़रूरत भी बहुत है ,फिर भी उसने मित्र देशों की मदद का निर्णय लिया है तो यह सराहनीय है।
भारत अमेरिका से आबादी में क़रीब क़रीब चार गुना बड़ा है। भारत में कोरोना दिनों दिन विकराल आकार ले रहा है। ऐसे में अपनी ज़रूरतें देखनी होती हैं। दवा उत्पादन क्षमता का ध्यान रखना होता है और मित्र पड़ोसियों के घरों को भी संंभालना होता है। ज़ाहिर है कि भारत अगर अमेरिका को यह दवा देगा तो श्रीलंका,नेपाल,मालदीव,भूटान,बांग्लादेश और म्यांमार जैसे अनेक दोस्तों को क्यों नहीं देगा ? लेकिन महाबली डोनाल्ड ट्रंप यक़ीनन संकट के इस समय में धीरज खोते नज़र आ रहे हैं।
कोरोना से निपटने में उनकी सरकार की नाक़ामी दुनिया के सामने उजाग़र हो गई है। वे पहले इस संक्रमण के अंतर्राष्ट्रीय विस्तार का ठीकरा चीन के सिर फोड़ते रहे तो कभी विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ ) पर चीन परस्त होने के आरोप में फंड रोकने की धमकी देते हैं। अब वे कह रहे हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अमेरिका की उपेक्षा की है। वे दवा के लिए भारत के प्रति भी सख़्त लहज़ा दिखा चुके थे।
दरअसल, अमेरिका को समझने में भारत से भूल हुई है। पाकिस्तान को अलग-थलग करने की कोशिशों में भारतीय विदेश नीति ने शुरुआत में तो अमेरिकी समर्थन लिया, लेकिन बदले में अमेरिका ने भारत से लगातार फ़ायदा उठाया। उसका प्रयास था कि हम पूरी तरह उस पर निर्भर हो जाएंं। किसी अन्य संपन्न राष्ट्र से बड़े कारोबारी रिश्ते नहीं रखें अथवा रखें तो उन्ही से रखें,जिन्हें अमेरिका चाहे।
हिन्दुस्तान ने अमेरिका को प्रसन्न रखने के लिए अपने कई राष्ट्रीय हितोँ की क़ुर्बानी होते देखी है। इसी वजह से ईरान और रूस जैसे भरोसेमंद मित्र देशों के साथ संबंधों में गर्माहट समाप्त हो गई। अमेरिका ने भारत को लगातार आर्थिक और कारोबारी झटके दिए हैं। ईरान से तेल आयात बंद करने के लिए भारत को विवश किया, जो इस उप महाद्वीपीय संतुलन को देखते हुए भारत के लिए बेहद ज़रूरी था।
चाबहार बंदरगाह के मामले में हिन्दुस्तान की कूटनीतिक प्राथमिकता नहीं देखी। कश्मीर के मामले में पाकिस्तान से जबरिया मध्यस्थता का राग ट्रंप लंबे समय तक अलापते रहे ,जबकि उन्हें भारत की नीति का स्पष्ट अंदाज़ था। उन्होंने तो यहांं तक कह डाला कि नरेंद्र मोदी ने भी उनसे मध्यस्थता करने का अनुरोध किया है। बाद में इसका खंडन करना पड़ा। इतना ही नहीं पाकिस्तान को गुपचुप फंड जारी रखा और उसकी सेना को आधुनिक प्रशिक्षण देने का क़रार किया। तालिबान के साथ समझौता ट्रंप के गले की हड्डी बन गया था। भारत को भरोसे में लिए बिना साल भर वे पाकिस्तान की ख़ुफ़िया मदद लेते रहे और तालिबानियों के साथ बैठकें करते रहे।
अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में भारत की भूमिका छिपी नहीं है, लेकिन ट्रंप तो भारत की सार्वजनिक ख़िल्ली उड़ाते रहे। उन्होंने बयान दिया कि हिन्दुस्तान वहांं पुस्तकालय बना रहा है। जंग लड़ रहे मुल्क़ में पढ़ेगा कौन? इतना तो अमेरिका अपनी फ़ौज पर पांंच घंटे में ख़र्च कर देता है।हिन्दुस्तान की ओर से इतना सब कुछ करने के बाद भी पिछले दिनों उन्होंने साफ़-साफ़ कहा था कि वे नरेंद्र मोदी को पसंद करते हैं,पर भारत ने कभी अमेरिका के साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया। लेकिन ट्रंप अपने देश की भूमिका याद नहीं करते,जब1971की जंग में अमेरिका ने अपना सैनिक बेेड़ा पाकिस्तान के पक्ष में भेज दिया था।
अगर उस समय सोवियत संघ ने सहायता न की होती तो तस्वीर कुछ और भी हो सकती थी। यह अमेरिका ही है जिसने कश्मीर समस्या का अंतर्राष्ट्रीयकरण करने का कोई अवसर नहीं छोड़ा है। इस तरह के अनेक उदाहरण हैं ,जब अमेरिका ने अपने स्वार्थ की ख़ातिर हिन्दुस्तान के हितों की धज्जियांं उड़ाई हैं। वास्तव में यह समय भारत के लिए राष्ट्रीय हितों के मद्देनज़र अपनी विदेश नीति और प्राथमिकताओं की समीक्षा करने का भी है। कोरोना त्रासदी से निपटने के बाद उसे अब एक महाशक्ति की तरह ही व्यवहार करना सीखना होगा।
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