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कांग्रेस में राजनीति: मल्लिकार्जुन खड़गे के कांग्रेस अध्यक्ष बनने से टूटेगा राहुल गांधी का सपना?

Fri, 30 Sep 2022 08:50 PM IST
Vinod Patahk विनोद पाठक
Updated Fri, 30 Sep 2022 08:50 PM IST
सार

राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद कांग्रेस पार्टी युवाओं को छोड़कर पुनः वयोवृद्ध नेताओं पर विश्वास जताने लगी। सोनिया गांधी को कार्यकारी अध्यक्ष बनना पड़ा। अभी राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के चुनाव में यह साफ-साफ झलक भी रहा है।

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मल्लिकार्जुन खड़गे होंगे कांग्रेस के अगले राष्ट्रीय अध्यक्ष? - फोटो : ANI

विस्तार

कांग्रेस का अगला राष्ट्रीय अध्यक्ष कौन होगा? इस रहस्य से करीब-करीब पर्दा उठ गया है। अंतिम समय में राज्यसभा में कांग्रेस पार्टी के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने नामांकन किया। उनसे पहले मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का नाम अध्यक्ष पद के लिए लिया जा रहा था, लेकिन खड़गे का नाम आते ही दिग्विजय सिंह ने अपनी दावेदारी वापस ले ली। वैसे खड़गे के मुकाबले में कांग्रेस सांसद शशि थरूर भी हैं और झारखंड के पूर्व विधायक कृष्णानंद त्रिपाठी ने नामांकन भरा है, परंतु खड़गे की जीत निश्चित है। उन्हें गांधी परिवार का आशीर्वाद प्राप्त है।

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खड़गे के प्रस्तावकों में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी शामिल हैं, जो चार दिन पहले तक स्वयं राष्ट्रीय अध्यक्ष की दौड़ में सबसे आगे थे। मल्लिकार्जुन खड़गे की उम्र 80 साल है। वो कांग्रेस के इतिहास में संभवतः अब तक के सबसे वयोवृद्ध राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने जा रहे हैं।
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खड़गे की ताजपोशी से बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि कुछ बरस पहले तक राहुल गांधी युवाओं को कांग्रेस पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी देकर आगे लाना चाहते थे। क्या खड़गे के अध्यक्ष बनने से राहुल का सपना टूट गया है?

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राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी पर सीनियर्स

कांग्रेस पार्टी के पूर्व में रहे राष्ट्रीय अध्यक्षों की बात करें तो सीताराम केसरी 77 साल की आयु में शीर्ष पद पर बैठे थे, जबकि मोतीलाल नेहरू ने 67 साल की उम्र में कुर्सी संभाली थी। पार्टी ने पूर्व में कई बार युवा नेताओं को सबसे बड़े पद पर बैठने का मौका दिया है।

 

साल 1923 में मौलाना आजाद जब कांग्रेस अध्यक्ष बनने थे, तब उनकी उम्र मात्र 35 साल की थी। वो भारत के पहले शिक्षा मंत्री भी रहे। पंडित जवाहरलाल नेहरू 40, राजीव गांधी 41, इंदिरा गांधी 42, राहुल गांधी 47 और सोनिया गांधी 52 साल की उम्र में कांग्रेस अध्यक्ष बन गई थीं। 


दिसंबर 2017 में जब राहुल गांधी को राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई थी, तब युवा जोश का नारा पार्टी ने दिया था। राहुल गांधी ने एक पूरी यूथ ब्रिगेड खड़ी करने की कवायद शुरू की थी। देश में युवाओं को नेतृत्व देने की बात जोर-शोर से उठाई थी। राहुल की टीम में सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया, आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद, अशोक तंवर, मिलिंद देवड़ा, मनीष तिवारी, दिव्या स्पंदना, सुष्मिता देव जैसे कई युवा चेहरे हुआ करते थे।

राहुल की पहल पर ज्योतिरादित्य सिंधिया, सचिन पायलट, आरपीएन सिंह और जितिन प्रसाद को मनमोहन कैबिनेट में शामिल किया गया था। संगठन में युवाओं को आगे बढ़ाया जा रहा था। 

सचिन पायलट को राजस्थान तो अशोक तंवर को हरियाणा में प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व दिया गया था। सचिन के नेतृत्व में पार्टी दिसंबर 2018 में राजस्थान की सत्ता में लौटी। उस समय लग रहा था कि कांग्रेस की कमान अब युवाओं के हाथ में आ जाएगी। हालांकि, मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजस्थान में सचिन पायलट को मुख्यमंत्री न बनाने से राहुल गांधी के युवा जोश के सपने को झटका लगा था।

साल 2019 की गर्मियों में लोकसभा चुनाव हारने के बाद जैसे ही राहुल गांधी ने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया, उनकी युवा ब्रिगेड बिखरती चली गई। आज की स्थिति देखें तो ज्योतिरादित्य सिंधिया, आरपीएन सिंह और जितिन प्रसाद भाजपा में शामिल हो चुके हैं। अशोक तंवर ने आम आदमी पार्टी और सुष्मिता देव ने तृणमूल कांग्रेस का दामन थाम लिया है।

मनीष तिवारी असंतुष्ट जी-23 ग्रुप के सदस्य हैं और कई अवसरों पर पार्टी की आलोचना कर चुके हैं। सचिन पायलट साल 2020 में बगावत कर चुके हैं और विगत दो साल से मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए लड़ते दिखाई दे रहे हैं। ऐसी ही स्थिति अन्य राज्यों में भी है।

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राहुल गांधी के कांग्रेस को युवा बनाने के सपने का क्या हुआ? - फोटो : Twitter


कांग्रेस को 'युवा' बनाने के सपने का क्या?

राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद कांग्रेस पार्टी युवाओं को छोड़कर पुनः वयोवृद्ध नेताओं पर विश्वास जताने लगी। सोनिया गांधी को कार्यकारी अध्यक्ष बनना पड़ा। अभी राष्ट्रीय अध्यक्ष पद के चुनाव में यह साफ-साफ झलक भी रहा है।

पहले चर्चा राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को अध्यक्ष बनाने की थी, जो 72 साल के हैं। 66 साल के शशि थरूर पहले दिन से चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुके हैं। राजस्थान में 25 सितंबर की रात कांग्रेस पार्टी में भारी उठा-पटक के बाद अशोक गहलोत रेस से बाहर हुए तो दिग्विजय सिंह का नाम सामने आया, जो 75 साल के हैं। 


यदि आज पार्टी में नजर दौड़ाकर देखें तो युवा कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। सवाल उठता है कि राहुल गांधी के कांग्रेस को युवा बनाने के सपने का क्या हुआ? क्या कारण थे कि वो पुनः अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठने को तैयार नहीं हुए? क्या इसके पीछे यही वयोवृद्ध नेताओं की ब्रिगेड है? जिसकी कार्यपद्धति से राहुल खुन्नस खाते रहे हैं, जिसके संकेत वो अपने पूर्व के बयानों में देते रहे हैं। 

अब मल्लिकार्जुन खड़गे को राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाने से पार्टी कैसे युवाओं को जोड़ेगी? यह सवाल है। बेशक मल्लिकार्जुन खड़गे बहुत ही अनुभवी नेता हैं। कर्नाटक में प्रदेश अध्यक्ष और मंत्री, केंद्र में मंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष रह चुके हैं। राज्यसभा में वर्तमान में कांग्रेस पार्टी के नेता हैं। हालांकि, आज के समय में केवल अनुभव होने से काम नहीं चलता है।

कांग्रेस को ऐसे जननेता की जरूरत है, जो पार्टी को पुनः भाजपा के मुकाबले में लाकर खड़ाकर सके। सोनिया गांधी ने अध्यक्ष बनने के बाद दो बार केंद्र में कांग्रेस की सरकार बनवाई। वैसा ही करिश्मा दिखाने की आवश्यकता है।


खड़गे के आगे बड़ी चुनौतियां

मल्लिकार्जुन खड़गे के आगे सबसे बड़ी चुनौती आगामी गुजरात और हिमाचल विधानसभा चुनाव की होगी। गुजरात में अशोक गहलोत पर्यवेक्षक की भूमिका हैं। अब खड़गे किसी नए नेता को जिम्मेदारी देंगे या गहलोत पर ही विश्वास जताएंगे। जी-23 के नेताओं से वो कैसे डील करेंगे? क्योंकि हिमाचल प्रदेश में आनंद शर्मा सख्त तेवर दिखा चुके हैं।

खड़गे के आगे राजस्थान और छत्तीसगढ़ की चुनौती भी होगी। राजस्थान में बगावत की धूल अभी बैठी नहीं है। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में क्या 80 वर्षीय खड़गे पार्टी में जोश भर पाएंगे? जहां पार्टी का झंडे उठाने वाले गायब हो चुके हैं। पंजाब, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के साथ दक्षिण भारत के केरल, अपने खुद के राज्य कर्नाटक में भी खड़गे को चुनौतियों से दो-चार होना पड़ेगा।

अंत में गांधी परिवार से वो कैसे समन्वय बनाकर चलेंगे? क्योंकि परिवार के प्रति निष्ठा के चलते कुर्सी तो मिल जाएगी, लेकिन पर्दे के पीछे से राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के दिशा-निर्देशों को साधकर चलना आसान नहीं होगा। कुल मिलाकर कांग्रेस अध्यक्ष की कांटों भरी कुर्सी मल्लिकार्जुन खड़गे को मिलेगी। समय बताएगा कि उनके नेतृत्व में कांग्रेस का कितना भला हो पाएगा?


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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