कांग्रेस अधिवेशन : संघ विरोध और जातीय राजनीति पर ही आगे बढ़ेंगे राहुल गांधी.!
कांग्रेस की कोशिश गुजरात की धरती से भारतीय जनता पार्टी, विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधी चुनौती देने की है। वो इसमें कितना सफल हो पाएंगे, यह तो आगामी चुनावों के नतीजों में पता चलेगा।
कांग्रेस की कोशिश गुजरात की धरती से भारतीय जनता पार्टी, विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधी चुनौती देने की है। वो इसमें कितना सफल हो पाएंगे, यह तो आगामी चुनावों के नतीजों में पता चलेगा।
विस्तार
पिछले महीने राहुल गांधी गुजरात की राजधानी अहमदाबाद में थे, तब उन्होंने कांग्रेस पार्टी के कुछ नेताओं पर भाजपा के लिए काम करने का आरोप लगाया था। यह और बात है कि अहमदाबाद में ही कांग्रेस पार्टी ने अपना अधिवेशन कर लिया। गुजरात कांग्रेस के सभी नेता अपने केंद्रीय दल के वरिष्ठों की सेवा करते नजर आए।
कांग्रेस की कोशिश गुजरात की धरती से भारतीय जनता पार्टी, विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधी चुनौती देने की है। वो इसमें कितना सफल हो पाएंगे, यह तो आगामी चुनावों के नतीजों में पता चलेगा। हालांकि, किसी नई रणनीति के बजाय कांग्रेस का पहिया एकबार फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और जातीय राजनीति के इर्द-गिर्द ही घूमता नजर आ रहा है। पार्टी की निर्भरता पहले की भांति गांधी परिवार पर ही बनी हुई है।
वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में जब कांग्रेस पार्टी को देश में 99 सीटें मिली थीं, तब पार्टी नेताओं ने जमकर जश्न मनाया था। 99 सीटों पर जीत का सेहरा राहुल गांधी के सिर पर बांधा गया था। हालांकि, लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद 99 सीटें जीतने का जोश कांग्रेस पार्टी में अब तक बना हुआ है।
लोकसभा चुनाव के बाद राहुल गांधी एंग्री यंग नेता की भूमिका में बने हुए हैं। पार्टी भी उन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुकाबले में खड़ा करने का कोई अवसर नहीं छोड़ पा रही है। सड़क से लेकर संसद तक राहुल गांधी की एक अलग छवि गढ़ी जा रही है। वैसे, अहमदाबाद में कांग्रेस के अधिवेशन में राहुल गांधी के दिए भाषण से एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि वो जातीय राजनीति के मैदान में पार्टी को पूरी तरह उतारने के लिए आतुर हैं।
राहुल गांधी ने अधिवेशन में दिए अपने भाषण में कहा कि कांग्रेस दलित, मुस्लिम व ब्राह्मण को साधती रही और अति पिछड़ा जातियां (ओबीसी) हमसे दूर चली गईं। यह और बात है कि एक समय कांग्रेस का नारा था कि न जात पर-न पात पर, इंदिरा जी की बात पर, मुहर लगेगी हाथ पर। ओबीसी को आरक्षण की सिफारिश करने वाले मंडल कमीशन के विरोध में सबसे बड़ा भाषण राहुल गांधी के पिता स्वर्गीय राजीव गांधी ने संसद में दिया था। शायद ओबीसी तभी से कांग्रेस से नाखुश है। ब्राह्मण भी राम मंदिर आंदोलन के बाद भाजपा के साथ जुड़ते चले गए।
दलितों का बड़ा वर्ग अब भी कांग्रेस के साथ है। हालांकि, उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में बहुजन समाज पार्टी के उदय के साथ दलित शिफ्ट हुए हैं। जहां-जहां क्षेत्रीय दल जैसे समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, द्रमुक, तृणमूल कांग्रेस, आम आदमी पार्टी सत्ता में आए, वहां मुस्लिम कांग्रेस से छिंटक गया। हालांकि, मुस्लिमों को दोबारा अपने फोल्ड में लाने की कांग्रेस की कोशिशें तेज हो चली हैं। राहुल गांधी कह रहे हैं कि मुस्लिम हितों को लेकर वो पीछे नहीं हटेंगे। यह और बात है कि यह कोशिशें उसके सहयोगी दलों को रास नहीं आ रही हैं।
राहुल गांधी का जोर भले मुस्लिम हितों पर अडिग रहने का है, लेकिन इसे लेकर कई बार उनकी पार्टी के नेता भी असहज नजर आते हैं। पार्टी के मुस्लिम हित ने हिंदुओं के बड़े वर्ग को भाजपा की ओर शिफ्ट किया है। अनुच्छेद 370, नागरिकता संशोधन कानून और अब वक्फ संशोधन कानून पर कांग्रेस का रुख देश के बहुसंख्यकों को रास नहीं आया है। पिछले दिनों संपन्न प्रयागराज महाकुंभ और सद्गुरु के कार्यक्रम में शामिल होने पर जिस तरह से कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार की पार्टी के अंदर से आलोचना हुई, उसने भी कांग्रेस को लेकर बहुसंख्यकों को निराश किया।
अहमदाबाद अधिवेशन में कांग्रेस ने एक बार फिर सरदार वल्लभभाई पटेल के बहाने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हमला बोला है। पार्टी ने अपने अधिवेशन को सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम पर बने मेमोरियल में रखा। पार्टी ने यह भी याद दिलाया कि कैसे सरदार वल्लभभाई पटेल ने संघ पर प्रतिबंध लगाया था? पार्टी ने इस मेमोरियल में अपने अधिवेशन को विशेष भी बताया। यह और बात है कि गुजरात में ही बने स्टैचू ऑफ यूनिटी को देखने आज तक राहुल गांधी नहीं गए हैं।
कांग्रेस के नेता स्टैचू ऑफ यूनिटी पर जाने से परहेज करते हैं, क्योंकि इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बनवाया है। सरदार पटेल की विरासत को अपने हाथों से जाता देख कांग्रेस परेशान भी है। पार्टी को अब सरदार पटेल और पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के बीच संबंधों को बताना पड़ रहा है। कहीं न कहीं पार्टी भाजपा के ट्रैप में फंसती नजर आती है।
गुजरात में पिछले तीन दशक से कांग्रेस पार्टी सत्ता से बाहर है। विगत् विधानसभा चुनाव में तो उसका अब तक का सबसे निराशाजनक प्रदर्शन रहा था। लोकसभा चुनाव में भी पार्टी को बहुत अधिक सफलता गुजरात में नहीं मिली, लेकिन राहुल गांधी को शायद लग रहा है कि गुजरात के रास्ते वह देश की सत्ता को पुनः हासिल कर सकते हैं।
गुजरात संघ परिवार की प्रयोगशाला माना जाता है। जहां नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पिछले कुछ सालों में लगातार अच्छा प्रदर्शन किया है। शायद राहुल गांधी गुजरात में आकर नरेंद्र मोदी को सीधी चुनौती देकर अपने इंडी गठबंधन के सहयोगियों को बताना चाहते हैं कि वो गठबंधन में बड़े भाई की भूमिका में हैं।
वर्ष 2029 के चुनाव में अभी चार साल से अधिक का समय है। वर्ष 2024 के नतीजों को लेकर कांग्रेस का उत्साह अभी भी कायम है। पार्टी को लग रहा है कि 2029 उनके लिए बेहतर अवसर हो सकता है और इसी की तैयारी गुजरात से राहुल गांधी ने शुरू की है। अब देखना यह होगा कि राहुल गांधी के यह प्रयास कितने सफल होते हैं। संघ विरोध और जातीय राजनीति कांग्रेस को कितनी चुनावी सफलता दिला पाती है।
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