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सुप्रीम कोर्ट का फैसला : सवाल भारत निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता और विश्वसनीयता का

Mon, 20 Mar 2023 02:07 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Mon, 20 Mar 2023 02:07 PM IST
सार

जब तक चुनाव व्यवस्था में सुधार नहीं होता और जब तक निर्वाचन आयोग में सुधार नहीं आता तब तक राजनीतिक भ्रष्टाचार से मुक्ति नहीं मिल सकती।

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committee including pm cji and opposition leader of lok sabha will appoint members of election commission
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि अब निर्वाचन आयोगी के सदस्यों की नियुक्ति समिति करेगी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने आखिरकार निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिये निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की सरकारी व्यवस्था को बदलने का ऐतिहासिक फैसला ले ही लिया। मौजूदा व्यवस्था की खामियों के कारण निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर तो सवाल उठते ही रहे साथ ही इसकी विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में रही।

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आयोग में टीएन सेषन जैसे विरले ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त आए जिन्होंने अपनी निष्पक्षता से आयोग की गरिमा और विश्वसनीयता पर आंच नहीं आने दी। आज हालत यह है कि अगर आयोग सचमुच निष्पक्षता से फैसले लेता भी है तो भी उस पर उंगली उठ ही जाती है, क्योंकि सरकारी नियंत्रण और सत्ताधारी दलों की कारगुजारियों पर से नजर फेर देने की मजबूरी के कारण उसकी विश्वसनीयता का ह्रास होता गया है। आयोग आज केवल एक सरकारी विभाग की तरह ही काम करता है, जिसके मालिक सरकार और परोक्ष रूप से सत्ताधारी दल ही होता है।

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कई समस्याओं की जड़ है राजनीतिक भ्रष्टाचार

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। हम अपने लोकतांत्रिक सिद्धान्तों की दुहाई देते नहीं थकते, लेकिन हमारे लोकतंत्र पर घुन की तरह लगे राजनीतिक भ्रष्टाचार की ओर आंखें फेर देते हैं। जब तक राजनीतिक भ्रष्ट आचरण पर रोक नहीं लगती तब तक भारत में फैले भ्रष्टाचार से मुक्ति नहीं मिल सकती। इसी तरह जब तक चुनाव व्यवस्था में सुधार नहीं होता और जब तक निर्वाचन आयोग में सुधार नहीं आता तब तक राजनीतिक भ्रष्टाचार से मुक्ति नहीं मिल सकती।

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देखा जाए तो भ्रष्टाचार की गंगोत्री चुनाव से ही बहनी शुरू होती है। मसलन निर्वाचन आयोग ने लोकसभा चुनाव में बड़े राज्यों के प्रत्याशियों के लिये खर्च की सीमा 95 लाख और छोटे राज्यों के लिये 75 लाख तय कर रखी है। कौन नहीं जानता कि बिना धन बल के चुनाव जीतना नामुमकिन है। लोकसभा चुनाव में एमपी बनने के लिये करोड़ों रुपये खर्च करने होते हैं। पानी की तरह शराब बहानी होती है। अब तो वोटरों को भी सीधे वोट के बदले नोट देने की शिकायतें आम हो गई हैं।

चुनाव में 95 लाख या 75 लाख के अलावा करोड़ों की धन राशि कहां से आती है और कहां चली जाती है। यह खुला रहस्य किसी से भी इसलिए नहीं छिपा रह सकता क्योंकि इस हमाम में डुबकी लगाए बिना चुनाव जीतना संभव नहीं है और देश में भ्रष्टाचार और अनाचार की यही असली जड़ है। निर्वाचन आयोग विपक्ष के उम्मीदवारों पर नजर तो रखता है मगर सत्ताधारियों पर उसकी नजर नहीं पड़ती। जो लोग अनुचित तरीकों से सत्ता में आएंगे उनसे सदाचार की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?

कई संस्थाओं की नियुक्तियां केवल सरकार के हाथ में नहीं

निर्वाचन आयोग की नकेल अपने हाथ में रखने की प्रवृति ही गलत नीयत की निशानी है। अगर सरकारें सचमुच स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव चाहती हैं तो फिर स्वतंत्र निर्वाचन आयोग से डर क्यों? जब सीबीआई के निदेशक की नियुक्ति एक कमेटी के द्वारा कराई जा सकती है तो फिर निर्वाचन आयोग के सदस्यों की नियुक्ति एक निष्पक्ष और स्वतंत्र व्यवस्था के तहत क्यों नहीं? सीबीआई एक सरकारी विभाग है, कोई संवैधानिक संस्था नहीं।

उसके निदेशक के चयन के लिए नई व्यवस्था इसलिए की गई ताकि वह स्वतंत्र और निष्पक्ष होकर दूध का दूध और पानी का पानी कर सके। जब सीबीआई की निष्पक्षता के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में प्रतिपक्ष के नेता और प्रधान न्यायाधीष या उनके द्वारा नामित एक जज की कमेटी की आवश्यकता महसूस की गई तो निर्वाचन आयोग के सदस्यों के लिए ऐसी ही कमेटी क्यों नहीं। सीबीआई ही नहीं मुख्य सतर्कता आयोग और मुख्य सतर्कता आयुक्त के चयन के लिए भी कमेटी की व्यवस्था है।

यही नहीं केन्द्र और राज्यों के सूचना आयोगों के सदस्यों के लिए भी एक सक्षम और स्वतंत्र कमेटी के गठन की व्यवस्था है। इसी निष्पक्षता और स्वतंत्रता के लिये राज्यों के लोकायुक्तों और केन्द्र के लोकपाल के गठन के लिए भी एक स्वतंत्र कमेटी के गठन की व्यवस्था है। अगर सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकारी सचमुच स्वतंत्र और निष्पक्ष थे तो इन संस्थाओं के सदस्यों के चयन का एकाधिकार सरकार को क्यों नहीं सोंपा गया?

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चुनाव सुधार की दिशा में सबसे पहले 1990 में दिनेष गोस्वामी कमेटी का गठन हुआ। - फोटो : Social Media

चुनाव सुधार हुए मगर चुनाव आयोग में सुधार नहीं हुआ

लोकतंत्र की मजबूती और उसके लिए चुनाव व्यवस्था की सुचिता के लिये काफी पहले से बहस चलती रही है और उन बहसों के फलस्वरूप चुनाव सुधार हेतु कमेटियों का गठन भी होता रहा है और समितियों की सिफारिशों पर कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाते रहे हैं। जैसे मतदाताओं की न्यूनतम उम्र सीमा 18 वर्ष करना, फोटो पहचान पत्र की व्यवस्था, ईवीमए मशीनों का चलन, मतदान से पहले चुनावी सर्वेक्षणों पर रोक और नोटा की शुरुआत आदि कई नई व्यवस्थाएं शुरू हुईं मगर चुनाव आयोग को निष्पक्ष और सरकार के नियंत्रण से मुक्त करने की दिशा में प्रयास नहीं हुए।

चुनाव सुधार की दिशा में सबसे पहले 1990 में दिनेश गोस्वामी कमेटी का गठन हुआ। इस समिति ने सिफारिश की थी कि राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग के साथ पंजीकरण कराना चाहिए और अपने धन के स्रोतों का खुलासा करना चाहिए।

इसने यह भी सिफारिश की कि चुनावों में धन और बाहुबल के इस्तेमाल पर रोक लगाई जानी चाहिए। गोस्वामी समिति के बाद 1998 में इंद्रजीत गुप्त समिति ने सिफारिश की कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग के पास अधिक शक्तियां होनी चाहिए। इसने यह भी सिफारिश की कि राजनीतिक दलों को अपने वार्षिक लेखा परीक्षित खातों को चुनाव आयोग को प्रस्तुत करने की आवश्यकता होनी चाहिए। इसके बाद  2001 में संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए  गठित राष्ट्रीय आयोग ने सिफारिश की कि लोकसभा (संसद के निचले सदन) और राज्य विधानसभाओं के चुनावों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की प्रणाली शुरू की जानी चाहिए।

इसके बाद 2015 में विधि आयोग ने चुनाव में धन और बल के इस्तेमाल को अपराधिक कृत्य मानने की सिफाारिश की। उसके बाद 2017 में एक विशेषज्ञ कमेटी ने इवीएम के साथ वीवीपैट की व्यवस्था की सिफारिश की। मगर अब तक निर्वाचन आयोग को सरकार के चंगुल से मुक्त करने की बात किसी ने नहीं की।

निर्वाचन आयोग का गठन

संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत भारतीय चुनाव आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को की गई थी। भारत में संसद और राज्य विधान मंडलों के निर्वाचन और राष्ट्रपति तथा उप-राष्ट्रपति कार्यालय के निर्वाचन आयोजित करने तथा निर्वाचन सूचियां तैयार करने के पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण का कार्य निर्वाचन आयोग को सौंपा गया है। यह एक स्वतंत्र संवैधानिक प्राधिकरण है।

आयोग में वर्तमान में एक मुख्य चुनाव आयुक्त और दो चुनाव आयुक्त होते हैं। जब यह पहले पहल 1950 में गठित हुआ तब से और 15 अक्टूबर, 1989 तक केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त सहित यह एक एकल सदस्यीय निकाय था। 16 अक्टूबर, 1989 से 1 जनवरी, 1990 तक यह आर. वी. एस. शास्त्री (मु.नि.आ.) और निर्वाचन आयुक्त के रूप में एस.एस. धनोवा और वी.एस. सहगल सहित तीन सदस्यीय निकाय बन गया।

2 जनवरी, 1990 से 30 सितम्बर, 1993 तक यह एक एकल सदस्यीय निकाय बन गया और फिर 1 अक्टूबर, 1993 से यह तीन सदस्यीय निकाय बन गया। मुख्य निर्वाचन आयुक्त समेत सभी सदस्यों की नियुक्ति केन्द्र सरकार अपनी इच्छा और सुविधानुसार करती है, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद प्रधानमंत्री, लोकसभा में प्रतिपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीष की कमेटी आयोग के सदस्यों का चयन करेगी।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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