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चर्चा: कॉकरोच जनता पार्टी और जय भीम की पॉलिटिक्स क्या है?

Mon, 08 Jun 2026 05:03 PM IST
Awatansh Chitransh अवतंस चित्रांश
Updated Mon, 08 Jun 2026 05:03 PM IST
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cockroach janata party and jai bheem in india know what are their future
कॉकरोच जनता पार्टी - फोटो : अमर उजाला

सोशल मीडिया पर मार्केटिंग और इलेक्शन कैम्पेन का चलन आजकल आम बात है, लेकिन यह तब सफल होता है जब प्रोडक्ट अच्छा हो या कैम्पेन ग्राउंड पर भी हो। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी का इंस्टाग्राम पर आगाज जानदार रहा और उतना ही जमीन पर फ्लॉप शो रहा। सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर एक तरफा कमेंट पोस्टबाजी जारी है तो दूसरी तरफ चाय-चौराहों पर फेस टू फेस बहस जारी है कि आखिर ये कॉकरोच जनता पार्टी की पॉलिटिक्स है क्या?  

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6 जून को जब दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे पर अनरजिस्टर्ड पार्टी या संस्था के अध्यक्ष, संयोजक या जो भी वह खुद कहें, अभिजीत दिपके उतरे।उनके हाथ में बाबा साहेब डॉ भीमराव अंबेडकर की एक किताब थी। हाथों में लहराते हुए, कार में दिखाते हुए, गोद में संभाले हुए दिपके, विचार और संघर्ष की प्रतिमूर्ति दिख रहे थे।
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एक बारगी तो उनके इस अवतार से बड़े बड़े राजनीतिक विश्लेशण के सूरमा भी हिल गए। क्योंकि अंबेडकर की थाती पर कब्जा जमाने का होड़ पिछले दस पंद्रह बरस से कुछ ज्यादा ही तेज गति से चल रहा है। अब इसकी वजह भले ही बसपा चीफ मायावतीजी की शिथिलता लग रही हो। लेकिन दावा तो राहुल गांधीजी से लेकर अखिलेशजी और खुद भाजपा भी गाहे बगाहे करती ही रही हैं।
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अंबेडकर के लेगेसी पर कब्जा करने की रणनीति?

यहां यह याद कर लेना चाहिए कि 2024 का लोकसभा चुनाव विपक्ष संविधान और डॉ भीमराव अंबेडकर के संविधान को बचाने के लिए लड़ा था। ये चुनावी नैरेटिव यूपी में काम भी किया। तो क्या अभिजीत दिपके  एक सोची समझी चाल के तहत फोटो अपॉर्चुनिटी क्रिएट कर रहे थे?

खैर, हवाई अड्डे से दिपके और जंतर मंतर पहुंचते हैं, वहां उनके तीन प्रवक्ता पहले से ही मोर्चा संभाले हुए थे। हालांकि दो दिन पहले हुई उनकी प्रेस कांफ्रेस उथली पुथली सनसनाहट थी लेकिन उनके उम्र और जज्बे को देखकर भूल जाना चाहिए। लेकिन  जंतर मंतर पर अभिजीत दिपके ने मौजूद समर्थकों,यूट्यूबरों के मोबाइल कैमरे के आगे जय.. जय.. जय.. जय भीम का नारा उछालना फिर सवाल खड़ा करता है कि क्या वह अंबेडकर के लेगेसी पर कब्जा करने के मूड में हैं?

क्योंकि जय भीम, बहुजन समाज पार्टी के उत्थान के दौर से पार्टी के कैडर शोषित,वंचित,गरीब,पिछ़डे वर्ग का युद्धघोष है। जय भीम केवल एक नारा नहीं है। यह देश के एक बड़े वर्ग के लंबे संघर्ष, सम्मान की आकांक्षा और सामाजिक परिवर्तन की राजनीति की मिसाल है।

डॉ.भीमराव आंबेडकर के समर्थक के बीच यह अभिवादन का रूप है, जिसका इस्तेमाल कांग्रेस, भाजपा या अन्य दल दलित वोटों को लुभाने के लिए गाहे बगाहे करते रहते हैं। अभी हाल में ही बसपा के संस्थापक कांसीराम जी के जयंती के अवसर पर यूपी में समाजवादी पार्टी ने भी खूब जय भीम किया।

इसमें कोई दो राय नहीं कि पिछले कुछ दशकों में बसपा के मजबूत राजनीतिक विकल्प बनने के साथ ही जय भीम विश्वविद्यालयों, आंदोलनों, चुनावी सभाओं और सोशल मीडिया में जय हिन्द जय भारत जैसा ही प्रसिद्धी पा चुका है।  

साथ ही साथ इस नारे को लेकर बहस और विवाद भी खूब होते रहे हैं। समर्थकों के लिए यह सदियों के सामाजिक अपमान के विरुद्ध सम्मान और आत्मविश्वास का उद्घोष है। उनके अनुसार यह नारा संविधान, समानता और प्रतिनिधित्व की मांग का प्रतीक है। तो दूसरी तरफ, एक वर्ग मानता है कि जब किसी भी सामाजिक या राजनीतिक पहचान का नारा अत्यधिक राजनीतिक हो जाता है, तो वह संवाद के बजाय ध्रुवीकरण की वजह बनता है।

2024 के लोकसभा चुनाव के बाद जय भीम नारे के साथ ह रहे प्रयोग इसी तरफ इशारा करते हैं। हालांकि दिल्ली में झाडू सिंबल के साथ वाल्मिकी वोट का ध्रुवीकरण करने में आम आदमी पार्टी सफल रही है। बाद में उसने 2022 के पंजाब विधानसभा चुनावों में भगत सिंह और डॉ भीमराव अंबेडकर के फोटो फ्रेम के साथ एक बड़ा नैरेटिव खड़ा किया।

पंजाब में दलित वोट पूरे देश की अपेक्षा सबसे ज्यादा है। और खुद बसपा के संस्थापक कांसीराम जी पंजाब से आते हैं। 2009 तक पंजाब में बसपा का बड़ा जनाधार तैयार हो गया था लेकिन बाद के वर्षो में वह ध्रुवीकरण कांग्रेस बसपा में बिखरा रहा  और फिर आम आदमी पार्टी ने उसे कैप्चर कर लिया।

जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके ने जय भीम नारे के साथ उसी ध्रुवीकरण को अपने पाले में लाने की कोशिश की है, जो सोशल मीडिया पर अंबेडकर के विचारों से अधिक उनके नाम और प्रतीकों को भुनाने की कोशिश करता है।

जाहिर है इससे बाबा साहेब का जातिवाद के खिलाफ संघर्ष धुंधला पड़ता है। सोशल मीडिया पर एक वर्ग ने डॉ.अंबेडकर के असली विचार शिक्षा, संवैधानिकता और सामाजिक सुधार से अधिक आईडेंटिटी पॉलिटिक्स बना दिया है।

शायद यही वजह कि बहुजन मिशन की महानायिका मायावती खामोशी से देख रही हैं, क्योंकि इस भीड़ को विचार से संभालना मुश्किल है। इसको इंस्टा फास्टफूड चाहिए। इसलिए सवाल ये नहीं है कि कॉकरोच जनता पार्टी को जय भीम नारे से इतनी मुहब्बत क्यों है।

सवाल ये है कि क्या हमारा समाज आज भी उन असमानताओं से पूरी तरह मुक्त हो पाया है, जिनके खिलाफ अंबेडकर ने संघर्ष किया था। और जिसे राजनीतिक तौर पर एकजुट करके कांसीराम साहेब ने अपने मूवमेंट और मायावती की चार बार की सरकार ने जय भीम को सामाजिक परिवर्तन का नारा बना दिया।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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