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विमर्श: नए साल में पर्यावरणीय चुनौतियां कम होने के आसार नहीं

Thu, 02 Jan 2025 12:41 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Thu, 02 Jan 2025 12:41 PM IST
सार

जलवायु परिवर्तन के कारण तूफान, बाढ़, सूखा और जंगलों में आग लगने की घटनाएं अधिक बार और अधिक तीव्र हो सकती हैं। इनसे कृषि उत्पादन और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान हो सकता है। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हर स्तर पर महसूस किया जा रहा है।

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Climate Crisis in India Will Face Environmental Challenges in New Year 2025
2025 में पर्यावरणीय चुनौतियां - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

नए साल का आगमन न केवल नई उम्मीदों और अवसरों को लेकर आता है, बल्कि पर्यावरणीय चुनौतियों की बढ़ती जटिलताओं की भी याद दिलाता है। जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता में गिरावट और संसाधनों की अति-खपत जैसे मुद्दे न केवल हमारे पर्यावरण को बल्कि मानव समाज और अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित कर रहे हैं। 2025 में दुनिया को कई महत्वपूर्ण पर्यावरणीय चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। जैसे औसत वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी, चरम मौसमी घटनाओं की तीव्रता और आवृत्ति में वृद्धि और ग्लेशियरों के पिघलने से समुद्र स्तर में संभावित वृद्धि। साथ ही वनों की कटाई, प्लास्टिक प्रदूषण और असंतुलित शहरीकरण जैसी समस्याएं प्राकृतिक संसाधनों पर भारी दबाव डाल रही हैं। आज यह आवश्यक है कि हम पर्यावरणीय संरक्षण को वैश्विक और स्थानीय स्तर पर सर्वोच्च प्राथमिकता दें। यह न केवल एक चेतावनी है बल्कि एक अवसर भी है कि हम प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का नया अध्याय शुरू करें।

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जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों का सामना करना होगा

 


जलवायु परिवर्तन पिछले कुछ दशकों में एक प्रमुख वैश्विक समस्या बन गई है। वायुमंडल में ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ता स्तर धरती के तापमान को बढ़ा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि आगे वैश्विक तापमान 1.5° सेंटीग्रेट से ऊपर बढ़ने की संभावना है। यह समस्या न केवल पर्यावरण, बल्कि समाज, अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य पर भी व्यापक प्रभाव डाल रही है। इस दौर में नए साल में भी औसत वैश्विक तापमान में वृद्धि जारी रहेगी।

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यह प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित कर सकती है और खेती, जल स्रोतों, तथा मानव जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है। इस स्थिति में गर्मी की चरम घटनाओं की तीव्रता और अवधि में वृद्धि होगी। वैश्विक तापमान वृद्धि से ध्रुवीय बर्फ और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से समुद्र स्तर में वृद्धि होगी, जिससे तटीय क्षेत्रों का खतरा बढ़ेगा।

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छोटे द्वीप और निचले तटीय क्षेत्र (जैसे मालदीव) डूबने के कगार पर आ सकते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण तूफान, बाढ़, सूखा और जंगलों में आग लगने की घटनाएं अधिक बार और अधिक तीव्र हो सकती हैं। इनसे कृषि उत्पादन और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान हो सकता है। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हर स्तर पर महसूस किया जा रहा है। इसे रोकने और इसके प्रभाव को कम करने के लिए तत्काल और सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है।


जल संकट घटने के आसार नहीं


बढ़ते तापमान और अनियमित वर्षा चक्र के कारण जल स्रोतों का संकट गहराने के आसार हैं। हिमनदों के पिघलने से नदियों का जलस्तर प्रभावित होगा, जो करोड़ों लोगों के लिए जल आपूर्ति का मुख्य स्रोत हैं। पृथ्वी पर उपलब्ध 97 प्रतिशत पानी खारा है और केवल 3 प्रतिशत पानी पीने योग्य है। हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जिससे गंगा, ब्रह्मपुत्र और यमुना जैसी नदियों का प्रवाह प्रभावित हो सकता है। भारत में विश्व के कुल भूजल का 25 प्रतिशत उपयोग किया जाता है, जो 2025 में संकट की स्थिति में पहुंच सकता है। बड़े शहरों में पानी की मांग बढ़ने के कारण झीलें और जलाशय सूख रहे हैं।

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2025 में प्रदूषण का खतरा बना रहेगा - फोटो : Freepik.com

प्रदूषण का बढ़ता खतरा बना रहेगा

वर्ष 2025 में प्रदूषण से जुड़ी कई चुनौतियां सामने आ सकती हैं, जो न केवल पर्यावरण बल्कि मानव स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था को भी प्रभावित करेंगी। वर्ष 2024 में दिल्ली सहित कई भारतीय शहर विश्व के सबसे प्रदूषित शहरों में शुमार थे। हर साल लगभग 8 मिलियन टन प्लास्टिक महासागरों में फेंका जाता है। प्रदूषण के विभिन्न प्रकारों के कारण होने वाले प्रभाव और उनकी चुनौतियों पर नजर डालते हैं।

बढ़ते औद्योगिकरण और वाहनों की संख्या में वृद्धि से शहरों में वायु गुणवत्ता और खराब हो सकती है। वायु प्रदूषण से श्वसन रोग, हृदय संबंधी समस्याएं और बच्चों में अस्थमा जैसी बीमारियां बढ़ेंगी। फेफड़ों के लिए घातक धूल पीएम 2.5 और पीएम-10 जैसे कण वातावरण में बढ़ सकते हैं जिससे दृश्यता और हवा की शुद्धता प्रभावित होगी। औद्योगिक कचरा, कृषि में उपयोग किए गए रसायन और घरेलू कचरे के कारण जल स्रोतों का प्रदूषण बढ़ सकता है। समुद्र में प्लास्टिक कचरे और तेल रिसाव से समुद्री जीवों और प्रवाल भित्तियों को नुकसान हो सकता है। वाहनों, निर्माण कार्यों और औद्योगिक गतिविधियों से शोर प्रदूषण में वृद्धि होगी।

सिंगल-यूज प्लास्टिक का उपयोग और गलत तरीके से निपटान पर्यावरण के लिए एक बड़ी समस्या बना रहेगा। पर्यावरणीय मानकों का पालन न करने वाले उद्योगों से विषाक्त पदार्थों का उत्सर्जन बढ़ेगा। बिना उपचारित पानी और रसायन नदियों और जलाशयों को दूषित करेंगे। पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के अनुपचारित निपटान से भारी धातुओं (जैसे सीसा और पारा) का प्रदूषण बढ़ सकता है। प्रदूषण एक वैश्विक संकट है और इसे रोकने के लिए सरकार, उद्योग और नागरिकों को मिलकर कार्य करना होगा।

2025 में यह हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए कि हम प्रदूषण को नियंत्रित करने और एक स्वच्छ और स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाएं।

जैव विविधता का नुकसान जारी रहेगा


नए साल में भी बायोडायवर्सिटी (जैव विविधता) की कमी पारिस्थितिकी तंत्र को असंतुलित कर सकती है। वनों की कटाई और शहरीकरण के कारण कई प्रजातियां विलुप्त हो रही हैं। मधुमक्खियां और अन्य परागणकर्ता विलुप्त हो रहे हैं, जिससे फसलों का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। दुनिया की 80 प्रतिशत ऊर्जा अभी भी जीवाश्म ईंधन से आती है। इसके जलने से ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित होती हैं। सौर और पवन ऊर्जा का उपयोग बढ़ रहा है, लेकिन यह अभी भी पर्याप्त नहीं है। जबकि इलेक्ट्रिक वाहन बढ़ रहे हैं, उनकी बैटरी के लिए खनिजों का दोहन पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकता है।

खाद्य सुरक्षा और कृषि पर संभावित संकट

बदलते मौसम चक्र, अत्यधिक तापमान, अनियमित वर्षा और प्राकृतिक आपदाएं कृषि उत्पादकता को सीधे प्रभावित करती हैं। मानसून की अनिश्चितता से फसल बुआई और कटाई के समय में समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। इससे फसलों की उत्पादकता और गुणवत्ता में गिरावट आती है। सूखा या अत्यधिक बारिश फसलों को नुकसान पहुंचाती है। बढ़ता तापमान गेहूँ, धान, मक्का और अन्य फसलों की पैदावार कम कर सकता है, क्योंकि कई फसलें अधिक गर्मी सहन नहीं कर पातीं।

भारी बारिश और बाढ़ मिट्टी की ऊपरी उपजाऊ परत को नष्ट कर देती है। हिमनदों के पिघलने और जल स्रोतों के सूखने से सिंचाई के लिए जल की उपलब्धता घट सकती है। नदियों का प्रवाह घटने से कृषि उत्पादन पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। बदलते मौसम से कीटों और रोगजनकों की संख्या और फैलाव बढ़ सकता है। उच्च आर्द्रता और तापमान की वजह से फसलों में रोग लगने की संभावना अधिक हो सकती है। कम उत्पादन के कारण खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे गरीब और कमजोर वर्ग सबसे अधिक प्रभावित होंगे। यदि समय पर प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में खाद्य संकट और आर्थिक अस्थिरता गहरा सकती है। सतत और सामूहिक प्रयासों से ही इस चुनौती का समाधान संभव है।

पर्यावरणीय समस्याएं वैश्विक और जटिल हैं, लेकिन इन्हें हल करना असंभव नहीं है। 2025 में हमें विज्ञान, प्रौद्योगिकी और सामुदायिक भागीदारी का उपयोग करके इन चुनौतियों का सामना करना होगा। यदि हम अभी ठोस कदम उठाते हैं, तो एक टिकाऊ और हरित भविष्य की संभावना बनी रह सकती है।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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