{"_id":"5df786298ebc3e881b4c2b24","slug":"citizenship-amendment-act-protest-move-from-violence-to-non-violence","type":"story","status":"publish","title_hn":"हिंसा से अहिंसा की ओर आंदोलन","category":{"title":"Blog","title_hn":"ब्लॉग","slug":"blog"}}
हिंसा से अहिंसा की ओर आंदोलन
विज्ञापन
नागरिकता संशोधन कानून का विरोध
- फोटो : PTI
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नागरिकता (संशोधन) कानून के खिलाफ जारी राज्यव्यापी आंदोलन को हिंसा से अहिंसा की तरफ ले जाना एक बेहतर प्रयास है। इससे इस आंदोलन को नई ऊर्जा और हर पक्ष का समर्थन मिलेगा। इससे आंदोलन को लंबे समय तक ले जाने में मदद मिलेगी।
विज्ञापन
नागरिकता (संशोधन) कानून के खिलाफ असम के लोगों में काफी गुस्सा है। भले ही सारे लोग सड़कों पर नारे नहीं लगा रहे हैं या आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप में शामिल नहीं हों, लेकिन इस कानून के खिलाफ चल रहे आंदोलन को वैसे लोगों का भी नैतिक समर्थन है। लेकिन आंदोलन में शामिल ज्यादातर लोगों हिंसक आंदोलन के खिलाफ हैं। वे चाहते हैं कि शांतिपूर्ण और अहिंसक तरीके से लोकतांत्रिक आंदोलन चले। जिस तरह से गुवाहाटी और राज्य के दूसरे क्षेत्रों में नागरिकता (संशोधन) कानून के खिलाफ आंदोलन के प्रारंभिक तीन-चार दिनों में हिंसा फैली, उससे आम असमिया आहत हैं।
विज्ञापन
आंदोलन के नाम पर सड़कों को तांडव, टायर जलाकर और बैरिकेट लगाकार यातायात व्यवस्था को ठप कर देना, वाहनों पर हमला, यात्रियों के साथ दुर्व्यवहार, सरकारी संपत्तियों को नष्ट करना, निजी प्रतिष्ठानों पर हमला जैसी घटनाएं घटीं। आंदोलनकारियों ने एंबुलेस और मीडिया के वाहनों पर भी हमला किया। इसकी वजह से घर से निकले लोग जहां-तहां फंस गए। स्कूल गए हजारों बच्चे बीत रास्ते में घंटों अफरातफरी की स्थिति में घिरे रहे और उनके अभिभावक उनकी सलामत वापसी के लिए बेचैन रहे। शादी के लिए जा रही वाहनों को रास्ते में रोक दिया गया और दुल्हा पक्ष को तांडव के बीच पैदल जाने को मजबूर किया गया।
विज्ञापन
तीन दिनों तक अराजक स्थिति बनी रही। एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशनों और बस अड्डे पर हजारों लोग कई दिनों तक भूखे-प्यासे फंसे रहे। सड़क किनारे फुटपाथों पर स्थानीय लोगों की दुकानों के फर्नीचर को जला दिया गया। सड़क किनारे के लगाए पौधे को उखाड़ दिया गया। इसकी वजह से गुवाहाटी समेत राज्य के कई जिले में कर्फ्यू लगाने से लोगों के लिए नई मुसीबत आ गई। जरूरी सामान के लिए लोग परेशान हो गए।
इन घटनाओं ने नागरिकता (संशोधन) कानून का विरोध करने वाले आम लोग हतप्रद हो गए और आंदोलन से अलग हो गए। स्थिति को देखते हुए अखिल असम छात्रसंघ (आसू) ने नेतृत्वविहीन हो रहे आंदोलन को शिल्पी समाज की मदद से एक दिशा देने की सार्थक कोशिश की। कर्फ्यू के बावजुद आसू की पहल पर गुवाहाटी लतीशिल और चांदमारी मैदान में अलग-अलग दिन धरना का कार्यक्रम किया गया। जिसमें नेतृत्व ने संपूर्ण आंदोलन को शांतिपूर्ण तरीके से चलाने का आह्वान किया। जिसमें इस बात पर जोर दिया गया कि यदि आंदोलन को लंबे समय तक चलाना है तो शांतिपूर्ण तरीके से लोकतांत्रिक आंदोलन को आगे बढ़ाना होगा। हिंसा होते ही सरकारी तंत्र को दमन का मौका मिल जाएगा और आंदोलन अपने मूल मकसद से भटक जाएगी।
इस तथ्य को आसू नेताओं ने महसूस किया और अराकतता को एक दिशा देने की पहल की। जिसमें कलाकार, बुद्धिजीवियों, मीडियाकर्मियों, कलाकारों, सरकारी कर्मचारियों, बुजुर्ग लोगों और महिलाओं को शामिल किया गया। इस पहल का पूरे राज्य पर प्रभाव दिख रहा है। यह महसूस किया गया कि असामाजिक तत्व आंदोलन के नाम पर हिंसा फैलाने चाहते हैं। इसलिए फिलहाल आंदोलन के कार्यक्रम अंधेरा होने के पहले समाप्त करने का फैसला लिया गया। इसकी वजह से बहुत हद तक हिंसा थम गई है। राज्य की स्थिति सामान्य हो रही है। दिन में कर्फ्यू हटाया जा रहा है। स्थिति सामान्य होते ही आंदोलनात्मक कार्यक्रमों में आम आदमी भागीदारी बढ़ती जा रही है। लेकिन आंदोलन कर रहे समूहों को इस बात के लिए चौकस रहना होगा कि आंदोलन हिंसक रूप न ले।
नागरिकता (संशोधन) कानून के खिलाफ जारी आंदोलन के नेतृत्व को शांतिपूर्ण तरीके से आंदोलन को आगे बढ़ाना होगा। ताकि आम आदमी आतंकित न हो और सरकार पर दबाव बढ़ा सके। अच्ची बात है कि हिंसा से शुरु हुआ आंदोलन अहिंसा की राह पर चल पड़ा है।
(लेखक दैनिक पूर्वोदय के संपादक और उत्तर पूर्व मामले के जानकार हैं।)