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नागरिकता संशोधन का विरोध कितना जायज?

Dr. Ashish Kumar Massy डॉ.आशीष कुमार मैसी
Updated Thu, 09 Jan 2020 09:17 AM IST
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citizenship amendment act 2019 protest and politics
नागरिकता कानून के खिलाफ प्रदर्शन - फोटो : पीटीआई

प्रख्यात लेखिका सुश्री ‘‘लैरी मे’’की रिपोर्ट ‘‘क्राइम अगेंस्ट हृयूमैनिटी-2019’’ने पूरे विश्व में उथल-पुथल मचा दी थी। रिपोर्ट के बाद से अल्पसंख्यक समुदाय के धार्मिक उत्पीड़न से सम्बंधी प्रकरणों को और अधिक गंभीरता से लिया जाने लगा। अमेरिका एवं यूरोप के कुछ देशों में हाल में नागरिक संशोंधनों व कानूनों में धार्मिक उत्पीड़न से ग्रसित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के प्रावधानो में प्राथमिकता दिखने लगी है।

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उल्लेखनीय है कि वर्ष 2000 से भारत के पड़ोसी राष्ट्रों  में मानवाधिकार उल्लंघन व अल्पसंख्यक उत्पीड़न की शिकायतें हद पार कर रही थी, उसका प्रभाव भारत की आंतरिक व्यवस्था पर स्वाभाविक रूप से दिखा था।
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कूटनीति के विशेषज्ञ प्रो. एपीजे अप्पादुरई ने 1968 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस से प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘‘डोमैस्टिक रूट्स ऑफ इण्डियन फॉरेन पॉलिसी’’में लिखा था कि किसी भी देश की आंतरिक नीति उस देश की सीमाओं में आने वाली बाहरी हवाओं से प्रभावित होती हैं। देश की नीति-रीति के स्वर भी उसी क्रम में परिवर्तित होते हैं। 
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सीएए के विरोध में देहरादून में कांग्रेस की रैली - फोटो : अमर उजाला

संयुक्त राष्ट्र संघ के संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त कार्यालय (यूएनएचसीआर) की पिछले 20 वर्षों की रिपोर्ट के अनुरूप भारत सरकार भी इस हलचल से प्रभावित हुई और पिछली भाजपा सरकार में तत्कालीन राज्यसभा सांसद डॉ मनमोहन सिंह ने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाते हुए पड़ोसी देशों के धार्मिक रूप से उत्पीड़ित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने की पुरजोर वकालत की थी।

डॉ मनमोहन सिंह जी के इस ज्वलंत सवाल की पृष्ठभूमि में पाकिस्तान और बांग्लादेश में बढ़ते  कट्टरवाद से उत्पन्न धार्मिक अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के शिकार लोगों की चिंता थी। भारतीय नागरिकता कानून में संशोधन की आवश्यकता अटल जी के शासनकाल में महसूस की गई। दुर्भाग्यपूर्ण यह रहा कि अपने द्वारा उठाए गए प्रश्न का समाधान डॉ मनमोहन सिंह ने अपने 10 वर्ष के प्रधानमंत्रित्व काल में नहीं किया।

आजादी के बाद देश के संसदीय इतिहास में वोट बैंक से प्रभावित हमारा तत्कालीन राष्ट्रीय नेतृत्व कई बार मौका देखकर यू-टर्न मारते दिखा है। उदाहरण के रूप में शाह बानो प्रकरण पर तत्कालीन सरकार का यू-टर्न खासा चर्चा का विषय रहा है, जिसके चलते भारत की राजनीतिक व विधिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह लगा ? ऐसे दलीय नेतृत्व के चलते भारत में आधार, जीएसटी एवं राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर आया, लेकिन फिर ढुलमुल व वोट बैंक से प्रभावित स्पष्ट नीति व नेतृत्व की दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव में सबसे लंबे समय तक शासन करने वाली पार्टी की सरकार सभी मूल प्रश्नों पर बैक गियर में ही नजर आई है।

ज्ञात रहे हिंदू, क्रिश्चियन, बौद्ध, सिख आदि धार्मिक भेदभाव झेल रहे मतावलंबियों की संख्या में भी अप्रत्याशित गिरावट दर्ज हुई थी। हिंदू आबादी तो लगभग 40 प्रतिशत से घटकर 05 प्रतिशत तक सिमटने को मजबूर हो गई। जबरन धर्म परिवर्तन के चलते अल्पसंख्यक धार्मिक उत्पीड़न के शिकार मतावलंबी अपना घर-बार, व्यापार छोड़कर भारत आने को विवश हुए। 

03 जनवरी 2020 को जब दिल्ली के शाहीन बाग में भारत के संविधान को बचाने के लिए प्रदर्शन हो रहा था, तभी पाकिस्तान स्थित विश्व प्रसिद्ध गुरुद्वारा ननकाना साहब की हिंसात्मक घेराबंदी एवं अल्पसंख्यक समुदाय को नेस्तनाबूद करने की नारेबाजी इंटरनेशनल टीवी पर दिखी।

इधर, पिछले सालों में क्वेटा चर्चेस में बम विस्फोट में सैंकड़ो लोगों की मृत्यु, हिन्दू युवा महिला डॉक्टर की आत्महत्या, जबरन धर्म परिवर्तन करवाकर हिन्दू व सिख लड़कियों की शादी के चलते पलायन निश्चित रूप से बढ़ा है, जिसके कारण शरणार्थियों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज हुई। इस सत्य को अमेरिकी संसद, संयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी रिपोर्ट ने भी स्वीकार किया है।

इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि पाकिस्तान व बांग्लोदश में सभ्य, समझदार और संवेदनशील मुसलमान नहीं हैं। दुर्भाग्य यह है कि उनकी आवाज नक्कार खाने में तूती की आवाज बनी हुई है। धार्मिक कट्टरवाद के आगे पुलिस व प्रशासन भी फेल है। शायद यही कारण है कि शोएब अख्तर जैसे नामचीन खिलाड़ियों का दानिश कनेरिया के प्रति सहानुभूति ने मानवता को सम्बल दिया है।

दरअसल, भारत में विधि का शासन है। यहां हर समस्या का समाधान व उसका तरीका-सलीका विधि द्वारा निर्धारित है। लोकतंत्र में विपक्ष और विरोध आवश्यक है। भारत गणराज्य में लोकतांत्रिक मर्यादाओं की परिधि के अंदर ही विरोध को न्यायोचित माना जाता है, जिसका अर्थ हिंसा, तोड़-फोड़, राष्ट्रीय सम्पत्ति को नुकसान पहुंचाना कदापि नहीं है।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गांधी के नेतृत्व में विरोध आंदोलन चला। पूरा राष्ट्र एक मत, एक स्वर में एकत्र होकर विरोध में जुटा। इस गांधीवादी विरोध में न तो वैमनस्य था, न ही हिंसा के लिए कोई स्थान। इस तर्कसंगत एवं शांतिपूर्ण विरोध ने विदेशी सत्ता की नींव की चूलें हिला दी थी। वह देश छोड़ने पर मजबूर हुए।

इधर, इसके बाद इमरजेंसी काल का विरोध लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में वर्ष 1977 में उभरा और शीघ्र ही इस विरोध ने एक राष्ट्रीय स्वरूप धारण कर लिया। यह विरोध भी गांधीवादी तरीके से किया गया, जो पूर्णतः शांतिप्रद था। इस जनांदोलन ने भी लोकतांत्रिक तरीके से सत्ता परिवर्तन के संकल्प को साकार किया। कांग्रेस हारी, पहली बार जनता पार्टी के नेतृत्व में विपक्ष को मौका मिला।

पिछले दशक में अन्ना हजारे के नेतृत्व में भी ‘‘भ्रष्ट्राचार हटाओ’’का एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन चला। इस आंदोलन ने भी सत्ता परिवर्तन के संकल्प को साकार किया। भारत के आधुनिक इतिहास में विरोध के यह तीनों स्वर तार्किक कहे जाएंगे। ऐसे आंदोलनों में ठोस तथ्य थे, तर्क थे, कुतर्क के लिए कोई स्थान न था, न है और न ही भविष्य में भारत की नागरिक व्यवस्था ऐसे लोकतांत्रिक चीर हरण को स्वीकृति प्रदान करेगी।

भारत का संविधान एक गतिशील संविधान है, जो देश, काल और परिस्थिति के अनुरूप अपने को ढालता व बदलता रहता है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 368 में संविधान संशोधन की पूरी प्रक्रिया है।

वर्ष 2016 में मोदी जी के शासन ने इन संशोधन पर गहनता और गंभीरता से विचार करने हेतु एक संयुक्त पार्लियामेंट्री कमेटी का गठन मुम्बई के पुलिस कमिश्नर व बागपत के सांसद सत्यपाल सिंह की अध्यक्षता में किया गया।

कुछ महीनो में ही भारत सरकार के मानव संसाधन मंत्री बनने के कारण दिनांक 25/12/2017 में इस कमेटी की अध्यक्षता मेरठ से वरिष्ठ सांसद राजेन्द्र अग्रवाल जी को सौंपी गई। इस कमेटी में कांग्रेस के वर्तमान लोकसभा में नेता अधीर रंजन चैधरी, महिला कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्षता व आसाम से सांसद कु सुश्मिता देव, कम्युनिस्ट पार्टी के तेज तर्रार नेता मो सलीम, बसपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सतीश चंद्र मिश्रा, सपा नेता जावेद अली खां व तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ-ब्रेन इस कमेटी के प्रमुख चेहरे थे।

कुल मिलाकर संयुक्त संसदीय समिति में 30 सांसदों के अतिरिक्त भारत सरकार के गृह, न्याय और विदेश मंत्रालय के प्रतिनिधियों के अलावा भारत की आंतरिक सुरक्शा से जुडे खुफिया तंत्र अनुसंधान और विश्लेषण विंग (रॉ), इंटेलीजेंस ब्यूरो (आईबी) सहित सभी प्रमुख एजेंसियों की उपस्थिति प्रमुखता से दर्ज की गई। इस कमेटी के पास 9267 व्यक्तियों के ज्ञापन, 56 गैर सरकारी संगठनों की सूची उपलब्ध है, जिन्होने समिति के समक्ष मौखिक साक्ष्य  प्रस्तुत किए। जेपीसी का दस्तावेज 438 पृष्ठों का तैयार हुआ। 

 

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दिल्ली में जगह-जगह प्रदर्शन करते लोग - फोटो : अमर उजाला

मजे की बात यह है कि जब जेपीसी में आपकी पार्टी की सशक्त उपस्थिति रही। तब क्या आपके सांसद बैठक में अनुपस्थित थे? या संसद में जागृत अवस्था में नहीं थे अथवा आंखो से इशारे कर समय नष्ट कर रहे थे। बिल के दस्तावेज बनाने वाले आप कैसे अनुच्छेद 14 एवं 19 को नहीं देख पाए।

यह तर्क भारत की सबसे बड़ी पंचायत के सदस्यों की गरिमा को धूमिल करने वाला कुर्तक लगता है। सत्य तो यह है कि सड़क पर विरोध और विद्रोह करने वाले नेता राफेल की जेपीसी जांच कराने की वकालत करते हुए इसे सर्वश्रेष्ठ पड़ताल कमेटी घोषित करने में थकते नहीं थे।

अब वही नेता जेपीसी को धता बताकर धर्म के आधार पर भ्रम फैलाने में लगे हैं। संसद के दोनो सदनों ने सर्वदलीय समझदारी और संसदीय साझेदारी से बने इस बिल को साझा जिम्मेदारी के साथ पास करके राष्ट्रपति महोदय द्वारा इस पर अनुमति मुहर लगा दी गई। अब यह देश का कानून बन गया। इसके पश्चात् कानून का कोई भी विरोध भारत की संसद की अवमानना नहीं तो क्या कहा जाएगा ?  

अतः सड़क पर इस पाखण्ड की नौटंकी के द्वारा विरोध औचित्यहीन है। भीड़ को धर्म के नाम पर फैलाए जा रहे भ्रम के बहकावे में न आकर इस संशोधित नागरिकता कानून का स्वयं अवलोकन करना चाहिए।

लेखक उत्तर प्रदेश सरकार में राज्य अल्पसंख्यक आयोग पूर्व अध्यक्ष रहे हैं। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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