म्यांमार के जरिये चीन ने बढ़ाया भारत पर दबाव, बांग्लादेश से मिल सकता है दूसरा झटका.!
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चीन से एक और झटका। पाकिस्तान, नेपाल, मालदीव और श्रीलंका के बाद म्यांमार भी चीन के क़र्ज़- जाल में उलझ गया। गुरुवार को म्यांमार और चीन के बीच बंगाल की खाड़ी में क्यौकप्यू शहर के किनारे गहरे पानी का एक बंदरगाह बनाने पर समझौता हुआ। क़रीब दस बिलियन डॉलर की इस परियोजना का सत्तर फीसदी चीन ख़र्च करेगा और तीस फ़ीसदी म्यांमार। इससे पहले फ़ौजी हुक़ूमत के दौरान इसी बंदरगाह के लिए चीन ने टेंडर जीता था। उसके मुताबिक़ 85 फ़ीसदी चीन को और 15 फ़ीसदी म्यांमार को ख़र्च करना था। जब चुनाव में आंग सान सू ची जीत कर आईं, तो उन्हें इस समझौते में कुछ गड़बड़ी की बू आई। उन्होंने इसकी समीक्षा की और फिर चीन का ख़र्च 85 से कम करके 70 फ़ीसदी किया और कुछ शर्तों में भी संशोधन किया।
पहले चरण का काम अब जल्द ही शुरू हो जाएगा। इस चरण में 1.3 बिलियन डॉलर का निवेश चीन करने जा रहा है। म्यांमार को यक़ीन है कि यह बंदरगाह उसकी आर्थिक रफ़्तार को तेज़ करेगा।इससे पहले सितंबर में भी चीन ने म्यांमार के साथ इकॉनॉमिक कॉरिडोर क़रार किया था।इसके अलावा म्यांमार से चीन तक तेल गैस पाइपलाइन की योजना भी काम कर रही है।
म्यांमार और भारत की दोस्ती में दरार की कोशिश
दरअसल, हिन्दुस्तान से म्यांमार के हमेशा मधुर रिश्ते रहे हैं। तमाम कोशिशों के बाद भी चीन इस दोस्ती में दरार नहीं डाल सका। लेकिन दो घटनाओं ने इस रिश्ते में खटास पैदा कर दी। जब उग्रवादियों ने मणिपुर के चंदेल में भारतीय सेना की डोगरा रेजिमेंट के 18 सैनिकों को मारा तो पड़ताल में इसके तार म्यांमार में चल रहे आतंकवादियों के प्रशिक्षण केंद्रों से जुड़ते थे। इसके बाद म्यांमार की मदद से भारत ने सर्जिकल स्ट्राइक की और दो शिविरों में 158 उग्रवादियों को मार गिराया। यहां तक तो ठीक था, लेकिन इसके बाद यह कार्रवाई म्यांमार की मुसीबत बन गई।
हमारे राजनेताओं और फ़ौज के आला अफसरों ने मीडिया में वाहवाही लूटने का कोई अवसर न छोड़ा। एक संप्रभु देश के रूप में म्यांमार को चीन का भारी दबाव और विरोध सहना पड़ा। म्यांमार ने इस बारे में चुप्पी साध रखी। हमारे लोग गाल बजाते रहे। युद्ध -कूटनीति के यह ख़िलाफ़ था। सर्जिकल स्ट्राइक के प्रचार के बाद अगली कार्रवाइयों के लिए दरवाज़े बंद हो जाते हैं। संबंधित देश सहयोग से बचने लगता है। इस तरह गोपनीय अभियान मीडिया में पीठ थपथपाने के लिए नहीं होते। भारत में पढ़ी-लिखी आंगसान सू ची ने चुनाव जीतने के बाद किनारा कर लिया। उन्होंने विरोध नहीं किया पर खुलकर भारत के साथ भी नहीं आईं। उनके आंदोलन को भारत का हमेशा समर्थन मिला, लेकिन अब यह अतीत बन चुका है।
चीन और म्यांमार आए करीब
इसके बाद राखाइन प्रान्त से रोहिंग्या मुसलमानों के निष्कासन के बाद उत्पन्न परिस्थितियों में भी भारत की तुलना में चीन और रूस ने म्यांमार का खुलकर साथ दिया। संयुक्त राष्ट्र में भी ये देश मज़बूती से म्यांमार के साथ खड़े रहे। भारत मध्यस्थता की ज़िम्मेदारी उठाने की बात करता रहा। ग़ौरतलब है कि भारत में म्यांमार और बांग्लादेश के लिए भारतीय विदेश मंत्रालय की दो विशेष इकाइयां काम कर रही हैं। इसके बावजूद भारत चीन को अपना प्रभाव म्यांमार में बढ़ाने से रोक न सका। हालांकि स्टेट कौंसलर आंग सान सूची जनवरी में भारत आई थीं। फरवरी में एक शान्ति समझौता भी हुआ। नौ सेना के साथ एक संयुक्त अभ्यास भी हुआ, लेकिन संबंधों में वो गर्माहट ग़ायब है।
म्यांमार और चीन नए बंदरगाह निर्माण की शर्तों पर ख़ामोश हैं। उनकी ओर से केवल यह कहा गया कि निर्माण अंतर्राष्ट्रीय मापदंडों के अनुरूप ही किया जाएगा। इसके बाद शर्तों और म्यांमार के लिए लगाईं गई शर्तों के बारे में दोनों देश कुछ नहीं बोल रहे हैं। पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह ,श्रीलंका में हंबनटोटा बंदरगाह की शर्तों और मालदीव तथा नेपाल को दिए क़र्ज़ के बारे में भी दुनिया अनजान है। इस बंदरगाह के बाद अगला झटका भारत को बांग्लादेश से मिलने जा रहा है। वहां चीन चिटगांव में एक बंदरगाह निर्माण के लिए धन दे रहा है।
भारतीय समुद्री सीमा असुरक्षित
एक समय था ,जब भारत की समंदर- सीमाएं अभी तक काफी हद तक सुरक्षित मानी जाती थीं, लेकिन चीन ने पश्चिम ,दक्षिण और पूरब में भारत को घेरने के लिए आक्रामक विदेश नीति का सहारा लिया है। अब भारत किस तरह उसका प्रतिवाद करता है? भारत ने ईरान में चाबहार बंदरगाह के अलावा कोई ऐसी चाल नही चली है ,जिससे चीन उलझन में आए। क्या भारत ने चीन से इन मामलों में कोई बात की है? चीन से पाकिस्तान बस सेवा का विरोध करने वाला बयान देकर हम पल्ला नहीं झाड़ सकते। अंदरूनी चुनावी राजनीति में उलझे हम लोग पड़ोस में पलने वाली हरक़तों के ख़तरे को सूंघ पा रहे हैं ? शिखर सियासत को इसे प्राथमिकता से देखना होगा।
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