नेहरू बनाम मोदी और चीन-7: जब चीनी कंपनियां घोंटने लगी घरेलू उद्योगों का गला
- हर साल होने वाले वाईव्रेंट गुजरात कान्फ्रेंस में चीनी निवेश बढ़ने लगा।
- चीन में बने लैंप और टॉर्च जैसे दैनिक उपयोग के सामान देश में बने सामान से कम कीमत पर मुहैया हो गए।
- चीन की अनेक ऑटोमोबाइल कंपनियां भारत में निवेश कर रही हैं।
विस्तार
साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने, तब चीन की मीडिया में भी गुजरात मॉडल की तारीफ में घुंआधार लेख छपने लगे। टोक्यों में प्रधानमंत्री मोदी ने एलान किया था कि "कारोबार उनकी रगों में दौड़ता है और अगर उन्हें आकर्षक डील मिले तो वह किसी से भी व्यापार करने को तैयार हैं।'
चीन की कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए नियम-कायदे आसान बनाए गए जिसका नतीजा यह हुआ कि भारत में चीनी निर्यात की बाढ़ आ गई। कंप्यूटर और मोबाइल के उपकरणों से लेकर पटाखे और गणेश की मूर्तियां तक चीनी उत्पादों से हमारे बाजार पट गए।
यहां तक कि चीन में बने लैंप और टॉर्च जैसे दैनिक उपयोग के सामान देश में बने सामान से कम कीमत पर मुहैया हो गए। विशेषज्ञों ने चिंता भी जताई कि चीन भारत में अपने उत्पादों की ढेर लगा रहा है, लेकिन मोदी सरकार के चीन प्रेम पर जरा भी असर नहीं पड़ा।
शुरू-शुरू में चीनी कंपनियों ने गुजरात के औद्योगिक क्षेत्रों में परियोजनाएं लगाईं लेकिन 2014 के बाद वे बड़े पैमाने पर विस्तार करने लगीं और गुजरात में जमीन भी खरीदने लगीं। क्योंकि चीनियों को लगने लगा कि अब मोदी पीएम बन गए हैं और उनके प्रोजेक्ट नहीं रुकेंगे।
चीनियों ने कच्छ और राजकोट में इकाइयां लगाने के लिए बड़े भू-भाग खरीदने की इच्छा भी जताई। चीन की नजर गुजरात के समुद्री तट पर थी जहां के बंदरगाहों से वह अफ्रीका और खाड़ी के देशों तक निर्यात कर सकता था। ये बंदरगाह भारत का प्राचीन व्यापारिक केन्द्र है।
चीन से इन इलाकों के लिए समुद्री रूट बहुत लंबा है और अगर चीन के कंटेनर सड़क मार्ग से गुजरात के बंदरगाहों तक आ पाते तो पैसे और समय, दोनों की बहुत बचत हो जाती। चीन की सरकारी बंदरगाह कंपनी गुआनझाउ पोर्ट ने अडानी के स्वामित्व वाले मुंद्रा पोर्ट में 2018 में निवेश किया और तकनीकी विशेषज्ञता साझा की।
गुजरात में टाटा मोटर्स की नैनो कार का प्रोजेक्ट भले नहीं चल पाया पर...
गौर करने की बात है कि मुंबई और तूती कोरिन-जैसे बंदरगाहों में सुरक्षाकारणों से चीनी निवेश की इजाजत नहीं है जबकि मुंद्रा पोर्ट के मामले में ऐसी चिंताओं को दरकिनार कर दिया गया। इसका क्या कारण था ये आज तक भारत की जनता के सामने खुलासा नहीं हुआ।
यह सब इसलिए हो रहा था ताकि चीनी निवेश से गुजरात विकास का सुपर मॉडल बन जाए। हर साल होने वाले वाईव्रेंट गुजरात कान्फ्रेंस में चीनी निवेश बढ़ने लगा। 2007 के बाद हर साल MOU साइन होने लगे।
गुजरात में टाटा मोटर्स की नैनो कार का प्रोजेक्ट भले नहीं चल पाया पर ‘मॉरिस गराज’ नाम की जिस ब्रिटिश कंपनी ने एमजी 'हेक्टर' नाम से कार लांच की है उसका प्लांट कामयाब रहा। यह केवल नाम भर की ब्रिटिश कंपनी थी। इसमें अधिकतर निवेश चीन का है।
चीन की एसएआईसी मोटर कॉर्प ने 2017 में गुजरात में दो हजार करोड़ रुपए की लागत से अपना संयंत्र शुरू किया और 2019 में वहां से बन कर एमजी हेक्टर गाड़ी बाजार में आ गई।
इसके पीछे- पीछे चीन की अनेक ऑटोमोबाइल कंपनियां भारत में निवेश कर रही हैं और यह अंदाजा लगाया जा रहा है कि जल्दी ही जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी और अमेरिकी कंपनियों को पीछे छोड़ कर चीन की ऑटोमोबाइल कंपनियां भारत के बाजार पर कब्जा कर लेंगी।
इसी तरह चीन की एक बड़ी स्टील कंपनी ने गुजरात के धोलेरा में 21 हजार करोड़ रुपए का संयंत्र लगाने का ऐलान किया। इस संयंत्र में उत्पादन शुरू हो गया तो यह देश की सबसे बड़ी स्टील कंपनी बन सकती है।
चीन की कंपनियां गुजरात, महाराष्ट्र में टेक्सटाइल और औद्योगिक पार्क बनाने की तैयारी कर रही हैं। संचार से लेकर बुनियादी ढांचे के विकास तक के काम में चीन की कंपनियों को मंजूरी देकर उन्हें शामिल किया गया है।
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