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फुरसत के पहाड़ों पर उतरे बादल और मुनिया ने चखा बारिश की बूंदों का स्वाद 

Tue, 09 Jul 2019 03:46 PM IST
Sarang Upadhyay सारंग उपाध्याय
Updated Tue, 09 Jul 2019 03:46 PM IST
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बचपन का आकाश रंग-बिरंगा होता है। उसका छोर कहां। - फोटो : Pixabay.com

बचपन का आकाश रंग-बिरंगा होता है। उसका छोर और रंग कहां। एक पगडंडी मन से गुजरती है और तितली की मानिंद एक बगिया से उस फूल तक और एक डाल से झूमती हुई हर झुरमुट और बेल के कई रंगों में टहल आती है। एक चक्कर मन के पार। गांव के कच्चे रास्तों पर उछलते-कूदते बच्चों के झुंड और भरी दोपहर में डूबता उतरता शोर। नदियों, बावड़ियों में नहाते नंग-धड़ंग बच्चे। कस्बों की गलियां और मोहल्लों में गूंजती मदमस्त आवाजें-

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पौसम पार भई पौसम पार..! 

सुदूर फैले पहाड़ों पर मुस्काते चेहरे। मंद हवा और आम के बागानों में झूले डाले रिमझिम गीतों की माला पिरोते कोमल स्वर। बच्चों की आंखों में परियों के गीत। दोपहर शोर में गुजरती और शामें दौड़ते-कूदते फांदते। रातों की कहानियां दादी-नानी के कई किस्सों से भरी। 
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ऐसे सपनों के दिनों में मोबाइल कहां थे। वीडियो गेम कहां थे?

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ऐसे सपनों के दिनों में मोबाइल कहां थे। वीडियो गेम कहां थे? - फोटो : Social Media

फुरसती चिड़िया के रंग हजार 
जानें कितने किस्से कितनी पीढ़ियों के पास किस रूप में दर्ज हैं। हर जेहन में यादों की ट्रेन लकदक गुजरती। नाना-मामा के घर यादें। हर एक के किस्से अलग, हर किस्सों में ख्वाबगाह अलग और ख्वाबगाह की दुनिया के जुगुनू अलग।

जो सड़क शहर की ओर गई वह लौटती बस के साथ गांव के बस स्टॉप पर आती और रिश्तों की खनकती आवाज, द्वार चौखट और दरवाजों की डेल पर बजती।

दिन हवा हुए की बच्चे घर लौट आए हों। इधर गर्मी की छुट्टियां लगी नहीं की उधर जमघट जमा। कहीं पेड़ों के नीचे तो कहीं नदी किनारे। कहीं मंदिर के पीछे से उठता शोर, तो कहीं किसी पगडंडी से दूर झांकते टीले तक पहुंचने की होड़। हर नदी पर डेरा और हर पहाड़ पर सवेरा। अनगिनत बातें और फुरसत का ऊंचा पहाड़। 

बादलों ने लगाई भीगने की मनुहार
आंगन से बादल मुंह चिढ़ाते गुजरे और कारी बदरी ठुमकती हुई धूप पर मुंह फुलाते बरसने लगी। मुनिया, चीनू, मीनू का झूला हवा के साथ तैरा। बादलों के गुच्छों से अटे आसमान को पीपल की डारी ने देखा और आंख मिचकाती, मुंह बनाकर हिली।

लगा की ताना दे रही है तो देर से क्यों आए हो।

मुनिया का फ्रॉक उड़ता है और मीनू के बाल कहां ठहरते हैं। चीनू ने झूले को रोककर आवाज लगाई। घर चलो की बारिश होने वाली है। जंगल से गायें लौटती हैं बरगद मामा के नीचे। बादल उतरते हैं पहाड़ों के ऊपर।

बारिश की बूंदें मुनिया के चेहरे पर हैं और नन्ही सी जीभ ने धीरे-धीरे बूंदों का स्वाद चखा और फूल मुस्कुराते नाच रहे..! 
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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