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नए भारत के निर्माण में आखिर क्यों पीछे छूट रहे हैं बच्चे?

Wed, 25 Dec 2019 10:51 PM IST
Devendra Baral देवेंद्रा बराल
Updated Wed, 25 Dec 2019 10:51 PM IST
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Child friendly society will have to be created to build a new India says Devendra Baral
भारत के निर्माण् में हर बच्चे की अपनी भूमिका होगी। कौन लाएगा बच्चों को मुख्यधारा में? - फोटो : Amar Ujala

आज से 5 साल पहले नोबेल कमेटी ने कैलाश सत्यार्थी को नोबेल शांति पुरस्कार दिया था। नोबेल पुरस्कार ने सत्यार्थी की बाल दासता के खिलाफ बच्चों की मुक्ति के लिए किए गए उनके अथक संघर्ष को अचानक वैश्विक सुर्खियों में ला दिया था।

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दुनिया के इस सबसे बड़े पुरस्कार ने जबरिया मजदूरी को किए जाने वाले बाल दुर्व्यापार (ट्रैफिकिंग), बंधुआ मजदूरी, बाल वेश्यावृत्ति, बाल विवाह, बाल शरणार्थी, बाल भिक्षावृत्ति और ऐसे बच्चे जिनका अंग प्रत्यारोपण के लिए दुर्व्यापार कर लिया जाता है की ओर सबका ध्यान आकृष्ट किया। 
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सत्यार्थी ने 2014 में ओस्लो में जब इस पुरस्कार को ग्रहण किया, तब उन्होंने अपने भाषण में इस बात पर विशेष रूप से जोर दिया हर बच्चा मायने रखता है, वहीं दूसरी ओर हरेक बचपन भी मायने रखता है।
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इस संदर्भ में यहां यह भी सवाल पैदा होता है कि क्या हम अभी सभी बच्चों की स्वतंत्रता, सुरक्षा, शिक्षा और स्वास्थ्य को सुनिश्चित करने की दिशा में तीव्रता और प्राथमिकता से काम कर पाने में सक्षम हो पा रहे हैं?  

Child friendly society will have to be created to build a new India says Devendra Baral
बच्चों के बचपन को हर समाज को बचाना होगा। - फोटो : childrens day

गौरतलब है कि 2016 में  बाल श्रम कानून में जो संशोधन किए गए, उसमें इस बात को सुनिश्चित करने की कोशिश की गई है कि 14 वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों का स्कूल जाना अनिवार्य है और ऐसी कोशिश की जानी चाहिए कि वे किसी भी सूरत में बाल श्रम के शिकार नहीं होने पाए।

शिक्षा के लिए हर बच्चे के मौलिक अधिकार को पूरा करने की दिशा में इसे एक उल्लेखनीय शुरुआत के रूप में देखा जा सकता है। यहां तक कि शिक्षा पर भारत सरकार का "प्रदर्शन डैशबोर्ड" इस बात की पुष्टि भी करता है कि बच्चे वाकई स्कूल जा रहे हैं।

प्राइमरी स्कूलों के लिए सकल नामांकन अनुपात अब 94 प्रतिशत है और उतने ही प्रतिशत स्कूलों में शौचालय की भी सुविधा है। लड़कियों की शिक्षा का यह सबसे महत्वपूर्ण कारक है। 

वहीं दूसरी ओर, इतनी संतोषजनक स्थिति के बावजूद क्या हम इस बात को दावे के साथ कह सकते हैं कि हमारे बच्चे अधिक शिक्षित और बेहतर जानकारियों से लैस हैं? दुर्भाग्य से जवाब ‘नहीं’ में होगा, क्योंकि एक साल पहले 2018 में भारत सरकार द्वारा जो एजुकेशन रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, उसके वार्षिक आंकड़ों का ही यदि हवाला दिया जाए, तो उसके अनुसार आठवीं कक्षा तक के बच्चे जब अनिवार्य स्कूली शिक्षा पूरी करते हैं, तब उनमें से मात्र 73 प्रतिशत ही ग्रेड II स्तर का टेक्स्ट पढ़ सकते हैं।

ये आंकड़े इस बात की भी तस्दीक करते हैं कि शिक्षा के मौलिक अधिकार को बच्चे स्कूल जा रहे हैं सिर्फ इसी से पूरा नहीं किया जा सकता है, बल्कि इसके लिए प्रत्येक बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाने की भी दरकार है। 

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हमारे बच्चों के स्वास्थ्य की स्थिति अत्यंत चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। - फोटो : अमर उजाला

हमारे बच्चों के स्वास्थ्य की स्थिति अत्यंत चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 में बच्चों के पोषण का स्तर  इंगित करता है कि पांच वर्ष से कम उम्र के 38 प्रतिशत बच्चे नाटे कद के हो रहे हैं, जबकि 21 प्रतिशत बेहद दुबले। दोनों स्थितियां कुपोषण के लक्षण हैं।

इसके अलावा 59 प्रतिशत बच्चे एनीमिक (खून की कमी से ग्रस्त) हैं, जिससे उनका उनके संज्ञानात्मक विकास बाधित होता है, बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास भी इससे प्रभावित होता है, जो उनमें संक्रामक रोगों को पैदा करते हैं। दूसरी ओर 18 प्रतिशत शिशु कम वजन के साथ पैदा होते हैं, जिससे उनमें बचपन में ही मृत्यु का जोखिम अधिक हो जाता है। 

ऐसे नवजातों के जन्म के पहले सप्ताह में ही मरने की आशंका अधिक रहती है, जबकि 5 वर्ष की आयु पूरी करने से पहले भी मरने वाले बच्चों का प्रतिशत बहुत अधिक है।

गौरतलब है कि सरकार का एक प्रमुख कार्यक्रम समन्वित बाल विकास परियोजना (आईसीडीएस) भी पिछले 45 वर्षों में कुपोषण और बीमारी के दुष्चक्र को रोकने में विफल रहा है। इसकी सेवाओं के उपयोग के राज्यवार हालात इस तरह हैं कि ओडिशा, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों के 70 प्रतिशत से अधिक बच्चों ने इस सेवा का यदि एक ओर उपयोग किया है।

वहीं दूसरी ओर राजस्थान और उत्तर प्रदेश के 40 प्रतिशत से भी कम बच्चों को इस सेवा का लाभ मिल सका है। आईसीडीएस की खराब कार्यप्रणाली का ही नतीजा है कि 6 साल की उम्र तक के बच्चों में कुपोषण की दर काफी ऊंची है।

दूसरी ओर अनौपचारिक शिक्षा (प्री स्कूल) के लिए भी बच्चे तैयार नहीं हो पाते। दुनियाभर के कल्याणकारी अर्थशास्त्री इस बात पर एकमत हैं कि किसी देश को अपनी क्षमता का अहसास करने और सतत विकास करने के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने नागरिकों विशेषकर बच्चों के स्वास्थ्य और शिक्षा पर ज्यादा से ज्यादा निवेश करे। दुर्भाग्य से यह अभी भी हमारे लिए एक सपना है।
 

Child friendly society will have to be created to build a new India says Devendra Baral
पोर्नोग्राफी बच्चों के लिए सबसे बड़ा अपराध है। इस संकट से उन्हें बचाना होगा। - फोटो : Social media

इस बात पर जोर देने की जरूरत है कि बच्चों की सुरक्षा सबसे अहम है। सत्यार्थी कहते हैं-‘’अपने बच्चों की रक्षा करके हम अपने संविधान की रक्षा करते हैं।‘’ सरकार ने पिछले पांच वर्षों में बच्चों के संरक्षण के लिए एक मजबूत कानूनी ढांचा तैयार किया है, जैसे कि 2016 में जुवेनाइल जस्टिस एक्ट लागू करना, जिसे  सन् 2000 में नए रूप में प्रभावकारी बनाया गया है।

पॉक्सो अधिनियम 2012 में और 2019 में संशोधन करके दंड को और कठोर बनाया गया है तथा इसमें बाल पोर्नोग्राफी पर ध्यान केंद्रित किया गया है। यहां इस बात का जिक्र करना जरूरी है कि बाल पोर्नोग्राफी आज के दौर में बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों में सबसे तेजी से बढ़ता अपराध है। 

यह विडंबना है कि इतनी मजबूत कानूनी संरचना के बावजूद बच्चों का शोषण, दुर्व्यवहार और दुर्व्यापार लगातार जारी है। 2017 में 1,20,651 बच्चे अपराध के शिकार हुए। पीड़ित बच्चों को संकट से निकालने के लिए विशेष अदालतों का भी पर्याप्त अभाव है।

इसके परिणामस्वरूप अदालतों पर ज्यादा बोझ और दबाव बढ़ रहे हैं। अकेले राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में पॉक्सो एक्ट के तहत 1,623 मामले दायर हैं, जिन मुकदमों के निपटान का इंतजार है। इस हिसाब से देखें, तो प्रति अदालत 383 मामले दायर हैं।

स्थिति को गंभीरता से लेते हुए शीर्ष अदालत ने देश के उन जिलों में विशेष अदालतों को स्थापित करने का आदेश जारी किया है, जिनमें बाल यौन शोषण के 100 से अधिक मामले लंबित हैं। यह सर्वोच्च न्यायालय का एक स्वागतयोग्य कदम है और यह पीडित बच्चों को राहत और न्याय दिला सकता है।

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बाल मजदूरी हर समाज के लिए एक अभिश्राप है। - फोटो : अमर उजाला

पिछले पांच वर्षों में जो कानून बनाए गए हैं, देखा जाए तो वे बच्चों के हितों को ध्यान में रखकर बनाए गए हैं। लेकिन इसका परीक्षण करने की भी जरूरत है कि ये जो पहल किए गए हैं, इन पहलों में धन का आवंटन पर्याप्त किया गया है या नहीं।

गौरतलब है कि 2015-16 में बच्चों के मद में धन का जो आवंटन किया गया था, वह कुल केंद्रीय बजट का 3.26 प्रतिशत था। जबकि 2019-2020 में यह और कम कर केवल 3.25 प्रतिशत कर दिया गया है।

इस हिसाब से देखें तो जिस देश की आबादी का 39 फीसदी हिस्सा सिर्फ बच्चों का हो, वहां उनके लिए मात्र 3.25 प्रतिशत धन का प्रावधान करना कहीं से भी उचित नहीं कहा जा सकता है। 

निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि हालांकि बच्चों के अधिकारों को हासिल करने की दिशा में प्रगति हुई है लेकिन अभी भी बहुत कुछ किए जाने की जरूरत है। श्री कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किए जाने का सबसे बड़ा फायदा अभी यही हुआ है कि पॉलिसी स्पेस में बच्चों के मुद्दों को मान्यता तो मिल गई है लेकिन उसको व्यावहारिक रूप देना अभी बाकी है।

इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है कि पिछले पांच साल बाल संरक्षण और उनके अधिकारों के संवर्धन के लिहाज से भी नए युग की शुरुआत है। लेकिन श्री सत्यार्थी के सपने को साकार करने के लिए नीतियों के साथ-साथ उसके लिए पर्याप्त बजट का भी आवंटन करना होगा और फिर उसको कार्यरूप में भी परिणत करना होगा। 

हर बच्चे को स्वतंत्र, स्वस्थ और शिक्षित करने के लिए एक मिशन के तहत काम करना होगा। इसके लिए हमें ऐसे कार्यात्मक संस्थानों, प्रशिक्षित अधिकारियों और बाल मित्र माहौल की दरकार है, जहां बच्चे सुरक्षित महसूस कर सकें, चाहे वे घर पर हों, खेल के मैदान में हों, स्कूल में हों या समुदाय में ही क्यों नहीं हों?

बाल मित्र भारत के निर्माण के लिए यह भी अनिवार्य है कि प्रत्येक अभिभावक अपने बच्चों के साथ-साथ आस-पास के बच्चों की भी देखभाल की जिम्मेदारी को प्राथमिकता दे। इससे ना सिर्फ बाल मित्र भारत का निर्माण सुनिश्चित होगा बल्कि हम त्वरित आर्थिक और सामाजिक विकास भी प्राप्त कर सकेंगे।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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