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दूसरा पहलू: जहां महिलाएं रच रहीं एक नई इबारत... भेदभावों के खिलाफ अभियान छेड़ आत्मनिर्भरता की कोशिश
सार
छत्तीसगढ़ की श्रीजन कल्याण समाजसेवी संस्था भेदभाव खत्म कर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में लगी है। संस्था द्वारा कानूनी मार्गदर्शन केंद्र चलाया जाता है, जहां लोगों की समस्याओं को सुलझाने की कोशिश की जाती है। संस्था ने जैविक खेती को पुनर्जीवित करने का भी काम किया है। इसने किसानों को जंगल को हरा-भरा करने, पारंपरिक बीज संरक्षण, जैविक खाद-कीटनाशक बनाने की दिशा में प्रेरित किया है।
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छत्तीसगढ़ में बदलाव की कहानी रच रहीं महिलाएं
- फोटो : अमर उजाला प्रिंट
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विस्तार
छत्तीसगढ़ की श्रीजन कल्याण समाजसेवी संस्था की हेमलता राजपूत कहती हैं कि ‘गांवों में अब भी महिलाओं के साथ कई तरह के भेदभाव होते हैं। ये आम तौर पर परिवार और समाज में देखने को मिलते हैं। इसी के मद्देनजर हमारी संस्था ने भेदभावों के खिलाफ अभियान छेड़ा है और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की भी कोशिश हो रही है।’ इस बदलाव की शुरुआत वर्ष 2016 से हुई है, लेकिन हेमलता, संस्था के गठन के पहले से ही इस दिशा में सक्रिय रही हैं।
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छत्तीसगढ़ पारिस्थितिकीय और सांस्कृतिक विविधता के लिए जाना जाता है। मध्य क्षेत्र का मैदानी भाग, जहां से महानदी गुजरती है, धान का इलाका है। यहां राइस मिलें हैं। हेमलता बताती हैं, ‘समाज की सोच गैर बराबरी पैदा करती है, जिसे हम बदलने की कोशिश कर रहे हैं। सरकार, समाज और स्वैच्छिक संगठनों के प्रयास से इसमें सुधार आ रहा है।’
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संस्था द्वारा कानूनी मार्गदर्शन केंद्र चलाया जाता है, जिसमें लोग समस्याएं लेकर आते हैं। परिवार से मिलकर पूरे मामले की जानकारी ली जाती है। परिवार व समाज के स्तर पर मामला सुलझाने की कोशिश की जाती है, अगर वहां मामला नहीं सुलझा, तो परिवार परामर्श केंद्र या कोर्ट भेजा जाता है।
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संस्था ने जैविक खेती को पुनर्जीवित करने का भी काम किया है। इसने किसानों को जैविक खेती, प्राकृतिक खेती करने, जंगल को हरा-भरा करने, पारंपरिक बीज संरक्षण, जैविक खाद, जैव कीटनाशक बनाने की दिशा में प्रेरित करने का काम किया है। कुहरी गांव की कौशल्या बाई कहती हैं कि देसी बीजों में रोग ज्यादा नहीं लगता है, खाने में भी स्वादिष्ट होते हैं।
अगर फसलों में कीट प्रकोप लगता भी है, तो जैव कीटनाशक बनाकर छिड़कते हैं, जिसे वे स्थानीय पौधों की पत्तियों से तैयार कर लेते हैं। कर्रा, आक, नीम, कड़वा रोहना, बिरहा आदि की पत्तियों से जीवामृत बनाया जाता है। बोडरा गांव की श्यामा ध्रुव बताती हैं कि हम देसी बीजों के साथ धान की खेती करते हैं। रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं करते हैं, जिससे हमारी लागत भी कम हो जाती है। इससे हमें आत्मनिर्भर बनने में मदद मिली है।
कुल मिलाकर, घरेलू हिंसा के खिलाफ अभियान, स्वास्थ्य जागरूकता, किचन गार्डन, जैविक खेती, सामुदायिक वन अधिकार दिलवाने में मदद करना और महिला नेतृत्व को गांवों में उभारने की कोशिश करना संस्था का काम है। हेमलता राजपूत कहती हैं कि अगर आधी आबादी सशक्त बनेगी, तो परिवार और समाज भी सशक्त होगा। यह पहल सराहनीय होने के साथ प्रेरणादायक भी है।