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Budget 2024: केन्द्रीय बजट से हिमाचल और उत्तराखण्ड को राहत और भरोसा

Tue, 23 Jul 2024 03:04 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Tue, 23 Jul 2024 03:04 PM IST
सार

ये दोनों हिमालयी राज्य विषम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण विकास की दौड़ में पिछड़ जाते जाते हैं और आर्थिक तंगी के साथ ही विशेष श्रेणी के राज्य होने के चलते सदैव केन्द्र सरकार की सहायता पर निर्भर रहते हैं। यद्यपि इन हिमालयी राज्यों की ग्रीन बोनस और पूर्वोत्तर राज्यों की तरह अलग बजट की मांग इस बार भी अनसुनी रह गई।

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Budget 2024: Relief and confidence to Himachal and Uttarakhand from the Union Budget
निर्मला सीतारमण पंकज चौधरी व अन्य अधिकारियों के साथ। - फोटो : पीटीआई

विस्तार

मानसून सीजन में दैवीय आपदाओं के संकट से घिरे हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश के लिए केन्द्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का सातवां बजट राहत और नए भरोसे को लेकर आया है। वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में घोषणा की है कि बादल फटने, त्वरित बाढ़, भूस्खलन, बिजली गिरने और जमीन के धसने से हर साल भारी जन हानि के साथ ही हजारों करोड़ का आथिक नुकसान झेलने वाले उत्तराखण्ड और हिमाचल प्रदेश को भारत सरकार भरपूर आर्थिक सहायता देगी।

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ये दोनों हिमालयी राज्य विषम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण विकास की दौड़ में पिछड़ जाते जाते हैं और आर्थिक तंगी के साथ ही विशेष श्रेणी के राज्य होने के चलते सदैव केन्द्र सरकार की सहायता पर निर्भर रहते हैं। यद्यपि इन हिमालयी राज्यों की ग्रीन बोनस और पूर्वोत्तर राज्यों की तरह अलग बजट की मांग इस बार भी अनसुनी रह गई।
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हिमाचल के लिए पुनर्निमाण और पुनर्वास की घोषणा

वित्त मंत्री ने मंगलवार को अपने बजट भाषण में घोषणा की है कि केन्द्र सरकार हिमाचल प्रदेश को गत वर्ष से लेकर अब तक मानसून के दौरान हुए भारी नुकसान की दृष्टिगत अवसंरचना के पुनर्निर्माण और प्रभावित जनसंख्या के पुनर्वास के लिए आर्थिक सहायता देगी। इसके लिए हिमाचल प्रदेश की सरकार केन्द्र सरकार से निरन्तर अनुरोध करती रही है, क्योंकि अपने बलबूते पर इतने बड़े नुकसान की भरपाई इस हिमालयी राज्य के बूते से बाहर है।
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उत्तराखण्ड के लिए भी बढ़ा मदद का हाथ

इसी प्रकार वित्त मंत्री ने उत्तराखण्ड की ओर भी सहयोग और मदद का हाथ बढा़ते हुए राज्य को भूस्खलन, बादल फटने और जमीन धंसने की जैसी आपदाओं के लिए विशेष सहायता देने की घोषणा की है। इस राज्य में भी हर साल मानसूनी आपदाओं से हजारों करोड़ के आर्थिक नुकसान के साथ ही भारी जन हानि होती है। उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने गत वर्ष की मानसूनी आपदाओं में 1000 करोड़ से अधिक की हानि बताने के साथ केन्द्र से मदद की गुहार की थी।

उत्तराखण्ड में ही पौराणिक नगर जोशीमठ धंस रहा है और पिछले 17 महीनों से वहां न तो किसी का पुनर्वास हो सका और ना ही किसा का विस्थापन किया गया। जिसका खामियाजा सत्ताधारी दल ने हाल के बदरीनाथ उपचुनाव में भरा। इस साल की बरसात में अब तक उत्तराखण्ड में हजार से अधिक सड़कें क्षतिग्रस्त होने के साथ ही कृषि योग्य जमीन और सरकारी अवसंरचना क्षतिग्रस्त हो चुकी है। इस साल अब तक मानसूनी आपदा में उत्तराखण्ड में 27 लोग मारे जा चुके हैं और एक व्यक्ति लापता होने के साथ ही 16 घायल हुए हैं। जबकि 500 से अधिक घर क्षतिग्रस्त हुए हैं। आसमान ने अभी अपना विकराल रूप नहीं दिखाया। चारधाम यात्रा में ही अब तक 170 तीर्थ यात्री इस साल मर चुके हैं।

भूस्खलन आपदा मोचन के लिए मिलेगी मदद

इसरो द्वारा तैयार देश के 147 संवेदनशील जिलों भूस्खलन मानचित्र (लैंड स्लाइड जोनेशन मैप) में उत्तराखण्ड के सभी जिले शामिल किए गए हैं तथा उत्तराखण्ड का रुद्रप्रयाग जिला खतरे की दृष्टि से सबसे ऊपर नम्बर एक पर तथा टिहरी जिला नम्बर दो पर रखा गया है। उत्तराखण्ड में भूस्खलन त्रासदियों का लम्बा इतिहास है। राज्य के 400 से अधिक गांव भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील घोषित किए गए हैं। मगर आर्थिक कारणों के साथ ही जमीन की अनुपलब्धता के चलते उनका पुनर्वास नहीं हो पा रहा है।

जमीन के लिए राज्य सरकार वनभूमि के अधिग्रहण के लिए केन्द्र सरकार से अनुरोध करती रही है मगर उसे न तो स्वीकृति मिली और ना ही उतने संसाधन मिले। एटलस के भूस्खलन जोखिम विश्लेषण में 147 जिलों में हिमाचल के 11 जिले शामिल हैं जिनमें भूस्खलन से सबसे अधिक खतरा मंडी जिले को बताया गया है। खतरे के हिसाब से इस जिले की रैंक 16वीं है। इसी तरह हिमालयी राज्यों में से जम्मू और कश्मीर के 14 जिले जोखिम की सूची में शामिल हैं। इनमें राजौरी देश का चैथा और पुंछ छठा सबसे अधिक भूस्खलन संवेदनशील जिला है। संवेदनशील जिलों की सूची में केरल के कुल 10 जिले हैं जिनमें 3 जिलों को सर्वाधिक जोखिम में रखा गया है।

हिमाचल के लिए जगी उम्मीद की किरण

केन्द्रीय वित्त मंत्री की मदद की घोषणा ने पिछले साल की भयंकर मानसूनी आपदा से बुरी तरह आहत हिमाचल प्रदेश के लिए आशा की नयी किरण दिखा दी है। इस साल भी इस पहाड़ी राज्य में आपदाओं का दौर शुरू हो चुका है लेकिन राज्य सरकार पिछले साल हुए भारी नुकसान से ही नहीं उबर पाया है। जानकारों के अनुसार पिछले साल की हिमाचल की आपदाओं के जख्म भरने में अभी कई साल लगेंगे।

वर्ष 2023 में हिमाचल प्रदेश में अचानक बाढ़ और बादल फटने और उससे जुड़े भूस्खलन, भूमि का धंसना या खिसकना और आबादी वाले पहाड़ी ढलानों का पूरी तरह से ढह जाना जैसी चरम घटनाओं ने पूरे राज्य में जन जीवन को तबाह कर दिया था। लगाए गए अनुमानों के अनुसार राज्य भर में विभिन्न घटनाओं में 404 लोगों की जानें चली गई, 38 लोग अभी भी लापता हैं और 377 लोग घायल हुए थे। मानव जीवन के इस बड़े नुकसान के अलावा, 10,140 पशुधन मारे गए और 5,644 गौशालाएं भी नष्ट हो गईं। इमारतों को भारी नुकसान हुआ है।

यही नहीं प्रदेश में 2546 घर और 317 दुकानें पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गई थी और 10,853 घर आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो गए जिससे बड़ी आबादी को रहने के लिए वैकल्पिक स्थानों की तलाश करनी पड़ी। इस विनाश के लिए गत वर्ष तीन चरम दौर (8 से 11 जुलाई, 14 से 15 अगस्त और 22 से 23 अगस्त) और 163 भूस्खलन और 72 अचानक आई बाढ़ को जिम्मेदार माना गया।

उस समय कुल्लू, मंडी, शिमला, सिरमौर, सोलन और चंबा जिले सबसे ज्यादा प्रभावित हुए। कई सिंचाई और जलापूर्ति योजनाएं भी बह गईं। महत्वपूर्ण इमारतें और स्कूल जैसी सार्वजनिक उपयोगिता वाली इमारतें भी क्षतिग्रस्त हो गईं। राज्य सरकार द्वारा फिलहाल 12,000 करोड़ रुपये से अधिक के कुल आर्थिक नुकसान का अनुमान लगाया गया था।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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