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बिहार विशेष: चुनाव कोई भी जीते, नीतीश कुमार अपरिहार्य हैं...

Sat, 25 Oct 2025 11:19 AM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Sat, 25 Oct 2025 11:19 AM IST
सार

फिर नीतीश को राज्य में ईबीसी का समर्थन मिलता रहा है। यूं अब विपक्षी राजद नीत महागठबंधन ने भी ईबीसी दांव चलते हुए मल्लाह जाति के मुकेश सहनी को उपमुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया है।

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Bihar Vidhan Sabha Election 2025: Whoever wins the election Nitish Kumar is indispensable
बिहार में भाजपा-नीतीश के गठबंधन की कहानी। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बिहार में विधानसभा चुनाव प्रचार जैसे जैसे परवान चढ़ रहा है, वैसे-वैसे राजनीतिक समीकरण ईबीसी (अति पिछड़ा वर्ग) और घोषणाओं की रेवड़ी के इर्द-गिर्द सिमटते जा रहे हैं। यूं भी बिहार देश में जातिवादी राजनीति का सबसे बुरा उदाहरण है। यानी बात भले ही विकास, रोजगार,शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, सामाजिक भेदभाव आदि तमाम मुद्दों से शुरू हो, लेकिन अंतत: जाति पर ही आ टिकती है। वही इस बार भी रहा है।

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सभी पार्टियों ने टिकट इसी आधार पर बांटे हैं। इसके अलावा बीते 20 वर्षों से राज्य  की राजनीति में नीतीश कुमार एक जरूरी फैक्टर हैं। सरकार किसी की भी हो, मुख्यमंत्री वही रहते हैं। हालांकि महागठबंधन ने राजद नेता तेजस्वी यादव को अपना सीएम पद का उम्मीदवार घोषित कर एनडीए से अपने नेता घोषित करने की चुनौती दी है, लेकिन यह कांच की तरह साफ है कि गठबंधन कोई-सा भी जीते, सीएम नीतीश ही होंगे।
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यह बात उस भाजपा की भी समझ आ गई है, जो कुछ समय पहले तक पिछले दरवाजे से नीतीश की जगह किसी भाजपा के चेहरे को सीएम बनाने का सपना देख रही थी। कारण साफ है, नीतीश उसी पाले में रहेंगे, जो उन्हें सीएम बनाएगा और नीतीश की पार्टी के बगैर कोई गठबंधन सरकार बना ले, यह लगभग नामुमकिन है।
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फिर नीतीश को राज्य में ईबीसी का समर्थन मिलता रहा है। यूं अब विपक्षी राजद नीत महागठबंधन ने भी ईबीसी दांव चलते हुए मल्लाह जाति के मुकेश सहनी को उपमुख्यमंत्री पद का दावेदार घोषित कर दिया है। जिसके जवाब में भाजपा और एनडीए ने बिहार के कद्दावर ईबीसी नेता रहे कर्पूरी ठाकुर का नाम जपना शुरू कर दिया है।

इससे ऐसा लगता है कि बिहार में बाकी जातियों की पार्टी प्रतिबद्धता लगभग तय है कि अब ईबीसी वोट बैंक को जो अपनी तरफ ज्यादा खींच लेगा, वह सरकार बनाने में सफल होगा।

गौरतलब, है कि राज्य में नीतीश की ईबीसी राजनीति की काट के तौर पर ईबीसी से मुकेश सहनी को डिप्टी सीएम पद का दावेदार घोषित किया है। भाजपा के पास कोई बड़ा ईबीसी चेहरा नहीं है। हालांकि, यह मान लेना कि मुकेश सहनी के चलते सभी ईबीसी जातियां महागठबंधन के साथ हो जाएंगी, केवल अतिआशावाद है।

गौरतलब, है कि बिहार में ओबीसी की कुल 146 जातियां हैं। इनमे से अति पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) की संख्या 113 है। इनमें 23 मुस्लिम जातियां भी शामिल हैं। यह राज्य में कुल ओबीसी आबादी का करीब 60 प्रतिशत है। इसी से इस वर्ग की वोट महत्ता को समझा जा सकता है।

पिछले कई वर्षों से यह वोट बैंक मोटे तौर नीतीश कुमार के साथ रहा है, लेकिन उनके बार-बार पाला बदलने से इसमें कुछ सेंध लगी है। फिर भी यह वोट बैंक नीतीश से छिटक जाएगा, इसकी संभावना कम है।

हालांकि, खुद नीतीश उस कुर्मी समाज से आते हैं, जो ओबीसी कृषक जाति है। लेकिन नीतीश ने कुर्मियों के साथ कुशवाह जाति का भी एक लव-कुश समीकरण बनाया हुआ है। दूसरे, इसी जाति के एक और नेता उपेन्द्र कुशवाहा भी इस बार एनडीए के साथ हैं। अगर वोटों के जातीय समीकरण के हिसाब से देखें तो एनडीए में ज्यादा पुख्ता स्थिति दिखती है।

दूसरे, इस बार एनडीए में नीतीश की जद-यू और भाजपा बराबर सीटों पर लड़ रही हैं। साथ ही पिछले विस चुनाव में नीतीश की पार्टी को बुरी तरह नुकसान पहुंचाने वाले चिराग पासवान की पार्टी इस बार एनडीए में है। ऐसे में जद-यू का स्ट्राइक रेट इस बार बेहतर रहने की उम्मीद है।

ऐसे में कोई भी गठबंधन नीतीश को माइनस कर सरकार नहीं बना पाएगा। उधर महागठबंधन में राजद के बाद सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस है। जिस तरह वह हर मामले में वह तेजस्वी के आगे सरेंडर होती दिख रही है और जिस तरह पिछले माह वोट चोरी के खिलाफ माहौल खड़ा करने के बाद पार्टी के नेता राहुल गांधी ने बिहार से दूरी बना ली है, उससे यही लगता है कि कांग्रेस को बिहार से ज्यादा उम्मीदें नहीं हैं। हालांकि राहुल चुनाव प्रचार करेंगे।

वैसे राहुल गांधी ने पिछले दिनो एक विशेष घोषणा पत्र जारी कर कहा था कि अगर वह सत्ता में आई तो स्थानीय निकायों में ईबीसी आरक्षण को 20 से बढ़ाकर 30 प्रतिशत करेगी। कुछ लोगों को भी भी  शंका है कि नीतीश चुनाव बाद फिर पाला बदल सकते हैं, लेकिन तब भी सीएम वही रहेंगे, समझौता इसी शर्त पर होगा।

वैसे पिछले साल से नीतीश लगातार यह कहते रहे हैं कि वो अब ‘इधर-उधर’ कहीं नहीं जाएंगे। लेकिन उनका मन राजनीतिक रूप से चंचल रहता है। अगर चुनाव में एनडीए सत्ता में लौटता है तो भी नीतीश को ही सीएम बनाना मजबूरी होगी, क्योंकि जद-यू किसी और के नाम पर शायद ही राजी हो।

तेजस्वी यादव को महागठबंधन द्वारा अपना सीएम दावेदार घोषित करने और एनडीए पर भी अपना दावेदार घोषित करने का दबाव बनाने के बाद भाजपा की भी मजबूरी हो गई है कि वह नीतीश का बचाव करे। पार्टी प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने हाल में कहा कि ‘एनडीए में सीएम पद की कोई वैकेंसी नहीं है।’

इसका सीधा अर्थ यह है कि एनडीए जीता तो सीएम नीतीश ही होंगे। भले ही उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर कई सवाल उठाए जाते रहे हों। नीतीश की फिटनेस को लेकर दूसरों को भले शंका हो, लेकिन नीतीश अपनी राजनीतिक चालें बहुत सोच-समझ कर चल रहे हैं और आगे भी चलेंगे। लिहाजा उन्हें साइड लाइन करना टेढ़ी खीर है।

राजनीतिक हल्कों में यह चर्चा तेज है कि चुनाव में एनडीए की जीत के बाद फिलहाल तो नीतीश ही सीएम बनेंगे। लेकिन बाद में भाजपा उन्हें किसी तरह हटाकर अपना सीएम बनाना चाहेगी। लेकिन यह भी टेढ़ी खीर है। क्योंकि अव्वल तो नीतीश पद छोड़ेंगे ही क्यों? दूसरे, अगर वो किसी तरह तैयार भी हो जाएं तो उनका समुचित पुनर्वास भाजपा कहां और कैसे करेगी?

केन्द्र सरकार में कोई ऐसा शीर्ष पद खाली नहीं है। नीतीश राज्यपाल बनकर राजनीतिक वनवास में जाने के लिए शायद ही तैयार हों, क्योंकि बिहार की सियासत में उन्हें अपनी हैसियत का पूरा अंदाजा है। कई बार उनके असहज करने वाले आचरण को छोड़ दें तो नीतीश राजनीतिक रूप से सौ फीसदी सचेत और सक्रिय हैं।

उन्हें किसी तरह सीएम पद से हटा दिया भी जाए तो उनका विकल्प क्या है? इस मायने में ‘राजनीति की नीतीश शैली’ अपने आप में अनोखी है। उन्हें न तो किसी से परहेज है और न ही किसी के वो बंधुआ हैं। वैचारिक प्रतिबद्धताएं उनके लिए बेमानी हैं। अपनी शर्तों पर जोड़ तोड़  राजनीति की नीतीश थ्योरी का बुनियादी उसूल है।

उनका सिद्धांत यही है कि सत्ता हाथ में हो तो कुछ भी किया जा सकता है। कुर्सी वैध और अवैध की दुविधा को बेरहमी से कुचल देती है। यही नहीं, नीतीश ने खुद अपनी पार्टी तो दूर, सहयोगी पार्टियों में भी अपना कोई विकल्प खड़ा होने नहीं दिया है। बीच में उनके इकलौते बेटे निशांत को चुनाव लड़वाने की बात चली थी। लेकिन नीतीश ऐसी गलती नहीं करेंगे।

चुनाव प्रचार शुरू होते ही उन्होंने पहला हमला लालू के परिवारवाद पर किया। जाहिर है कि बिहार के राजनीतिक फलक से नीतीश तभी हटेंगे, जब वो खुद चाहेंगे या फिर ईश्वर की वैसी इच्छा रही तो। वरना बिहार की राजनीति में नीतीश अपरिहार्य हैं और आगे भी रहेंगे। क्योंकि नीतीश बहुत विनम्रता और ठंडे दिमाग के साथ सियासी पांसे चलते और प्रतिद्वंद्वी को मात देते हैं।

इस मुकाबले तेजस्वी अभी ‘बच्चे’ हैं। यद्यपि बिहार में हर परिवार में से एक को सरकारी नौकरी देने और जीविका दीदियों का मानदेय  तीन गुना बढ़ाने जैसी सनसनीखेज लेकिन अव्यावहारिक घोषणाएं करके तेजस्वी ने बड़ा दांव चला है। इससे कुछ युवा प्रभावित हो सकते हैं।

अव्यावहारिक इसलिए कि जानकारों के अनुसार तेजस्वी ने अकेले जो वादे कर डाले हैं, उसे पूरा करने के लिए बिहार सरकार के दो वार्षिक बजटों की राशि भी कम पड़ेगी। अगर सचमुच ढाई करोड़ लोग अकेले बिहार में  सरकारी नौकरी में रख भी लिए तो वो करेंगे क्या? क्योंकि पूरे देश में केन्द्र, राज्य के सरकारी और अर्द्ध सरकारी कर्मचारियों की कुल संख्या भी ढाई करोड़ नहीं होती।

दूसरी तरफ नीतीश की कितनी ही आलोचना की जाए, लेकिन उनके पीछे बहुत बड़ा प्रतिबद्ध वोट महिलाओं का है, जो कुल वोटरों की संख्या का आधा है। मोटे पर महिला, ईबीसी और भाजपा के कारण अगड़ी जातियों का वोट अगर तय गणित के हिसाब से पड़ गया तो एनडीए की सरकार बनने में ज्यादा कठिनाई नहीं होगी।

नीतीश हटे भी तो केवल एक स्थिति में कि जब बिहार में उन्हें हटाने की आंधी चल जाए। ऐसा कोई अंडर करेंट है, लग नहीं रहा। वैसे सत्ता के खेल में दो और घटक अहम हैं। ये हैं असदुद्दीन औवेसी की एआईएमआईएम और प्रशांत किशोर की जन सुराज की पार्टी। यह किसका खेल बिगाड़ेंगे, अभी कहना मुश्किल है। लेकिन नीतीश का तोड़ वो भी नहीं हो सकते।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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