हरिवंश ने नीतीश को जता दिया, पार्टी से ऊपर है राष्ट्रधर्म
हरिवंश को जदयू ने साल 2014 में अपने कोटे से राज्यसभा भेजा था। हरिवंश अपनी काबिलियत के बल पर उपसभापति की कुर्सी पर बैठे। उस वक्त जदयू ने इसे अपनी पार्टी के लिए गर्व और सम्मान के रूप में देखा था।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
राज्यसभा के उपसभापति और वरिष्ठ पत्रकार हरिवंश नारायण सिंह को लेकर हलचल है। हरिवंश इसलिए चर्चा में हैं क्योंकि उन्होंने पार्टी लाइन को दरकिनार करते हुए अपने पद के सम्मान को बरकरार रखने की ठानी। मामला नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह से जुड़ा है। हरिवंश नारायण सिंह जनता दल यूनाइटेड (जदयू) के कोटे से राज्यसभा सांसद हैं। उनकी पार्टी ने इस समारोह का बहिष्कार कर रखा था।
पार्टी ने उम्मीद पाल रखी थी कि राज्यसभा के उपसभापति भी पार्टी का कहना मानें और समारोह का बहिष्कार करें।
पर हरिवंश नारायण सिंह ने न केवल अपने पद की लाज रखी, बल्कि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति का संदेश भी पढ़ा। उन्होंने कर्तव्यपथ पर सही और गलत का फैसला लेते हुए राष्ट्रधर्म का पालन किया। निश्चित तौर पर हरिवंश नारायण सिंह का यह कदम नीतीश कुमार और उनकी पार्टी को नागवार और अरुचिकर लगा होगा।
जदयू के कोटे से गए थे राज्यसभा
हरिवंश को जदयू ने साल 2014 में अपने कोटे से राज्यसभा भेजा था। हरिवंश अपनी काबिलियत के बल पर उपसभापति की कुर्सी पर बैठे। उस वक्त जदयू ने इसे अपनी पार्टी के लिए गर्व और सम्मान के रूप में देखा था। पर आज जब उसी पद का गरिमा का सम्मान करते हुए हरिवंश ने संसद भवन समारोह में शिरकत की तो पार्टी इसे गद्दारी का नाम दे रही है।
जदयू के मुख्य प्रवक्ता ने यह बयान तक दे डाला कि हरिवंश ने अपनी लेखनी और जमीर को बेच डाला। बात जब राष्ट्रधर्म की आती है तो कई नेताओं ने अपने दल के वसूलों और नीतियों के खिलाफ मोर्चा लिया है। खासकर संवैधानिक पद पर बैठे राजनेताओं ने इस तरह का निर्णय लेने में जरा भी देरी नहीं दिखाई है।
सोमनाथ चटर्जी भी कर चुके हैं पहले ये काम
हरिवंश कोई अपवाद नहीं हैं। इससे पहले लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने पार्टी से अधिक अपने संवैधानिक पद को सम्मान दिया था। यह जुलाई 2008 की बात है। इस दौरान मनमोहन सिंह सरकार ने अमेरिका से महत्वपूर्ण परमाणु समझौता किया था। वामपंथी दल इस समझौते से नाराज थे।
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने परमाणु समझौते से नाराजगी दिखाते हुए सरकार से समर्थन वापस लेने की घोषणा कर दी। 22 जुलाई को संसद में मनमोहन सरकार के लिए परीक्षा का दिन था। पार्टी ने सरकार से समर्थन वापस ले लिया था। उस वक्त पार्टी के सभी सदस्यों को अपना पद छोड़ने और अविश्वास प्रस्ताव में सरकार के विरोध में मत डालना था।
तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया था। उन्हें अपने पद की गरिमा और प्रतिष्ठा का पता था। माकपा के वरिष्ठ नेता प्रकाश करात ने राष्ट्रपति को पत्र सौंपकर अपने सभी सांसदों द्वारा सरकार से समर्थन वापस लेने की बात कही थी।
इस पत्र में सोमनाथ चटर्जी का नाम भी दर्ज था। पर सोमनाथ चटर्जी ने स्पष्ट तौर पर संदेश दे दिया था कि वे जिस पद पर बैठे हैं वह पद पार्टी से काफी ऊपर है। सोमनाथ चटर्जी का यह निर्णय पार्टी को चुभ गया। दस बार के सांसद रहे सोमनाथ चटर्जी को निलंबित करने में पार्टी ने देरी नहीं की।
कई दशकों तक पार्टी की सेवा में लगे रहे सोमनाथ चटर्जी के निष्कासन से उनकी सेहत पर तो कोई असर नहीं हुआ, उल्टा माकपा नीतियों की थू-थू जरूर हुई। हालांकि, इस घटना से सोमनाथ चटर्जी बेहद आहत हुए थे। उन्होंने उस वक्त कहा था कि भविष्य में जो भी लोकसभा का अध्यक्ष बने उसे सबसे पहले अपनी पार्टी से इस्तीफा दे देना चाहिए ताकि वह अपनी इच्छा के अनुसार कार्य कर सके। उनका बयान यह बताने के लिए काफी है कि राष्ट्रहित से ऊपर कुछ नहीं है।
हरिवंश नारायण सिंह के साथ क्या एक बार फिर वही इतिहास दोहराया जाएगा? जिस तरह जदयू के नेता बयानबाजी कर रहे हैं वह अनायास ही नहीं है। निश्चित तौर पर पार्टी की तरफ से संकेत मिल चुके होंगे। पर सवाल यह है कि पार्टी से निकाले जाने के बाद क्या हरिवंश नारायण सिंह की सेहत पर असर पड़ेगा? तो इसका जवाब न में है।
पार्टी से निकाले जाने के बाद भी बने रह सकते हैं पद पर
संविधान विशेषज्ञ और सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता अंभोज कुमार सिन्हा कहते हैं हरिवंश नारायण सिंह जिस संवैधानिक पद पर बैठे हैं, उसी संविधान में इस तरह के प्रावधान हैं कि पार्टी से निकाले जाने के बावजूद भी वे उस पद पर बने रह सकते हैं। संविधान की दसवीं अनुसूची में इसके स्पष्ट प्रावधान दिए गए हैं। इस अनुसूची में दल बदल विरोधी कानून से जुड़े तमाम प्रावधानों का स्पष्ट उल्लेख है।
अंभोज कुमार सिन्हा कहते हैं पार्टी में नहीं रहना और किसी सदस्य के अयोग्य करार दिए जाने में अंतर है। दसवीं अनुसूची में किसी संसद सदस्य के अयोग्य करार दिए जाने के तमाम आधार बताए गए हैं। उन तमाम आधारों के अलावा एक अपवाद भी शामिल है, जिसमें कहा गया है कि कोई सदस्य अगर अध्यक्ष के पद पर चुना जाता है तो वह पार्टी छोड़ सकता है। पद छोड़ने के बाद दोबारा पार्टी में शामिल भी हो सकता है। एक बार स्पीकर या डिप्टी स्पीकर हो जाने के बाद व्हीप का भी कोई असर स्वतः खारिज हो जाता है।
वैसे भी जदयू ने कोई व्हीप तो जारी किया नहीं था। निश्चित तौर पर अगर जदयू हरिवंश नारायण सिंह को भी पार्टी से निकाल देती है तो उनकी सेहत पर भी सोमनाथ चटर्जी की तरह असर नहीं पड़ेगा। पर जदयू का यह संदेश लोगों के बीच जरूर जाएगा कि एक संवैधानिक पद पर बैठे सम्मानित व्यक्ति के साथ नीतीश कुमार और उनकी पार्टी ने क्या हरकत की है। दल आते जाते रहेंगे। सदन में नए चेहरे आते जाते रहेंगे। पर हरिवंश ने बता दिया कि दलों की आरोप प्रत्यारोप की राजनीति राष्ट्रहित से कहीं ऊपर है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।