राजस्थान से गहरा रहा है आडवाणी का नाता, चौड़ा रास्ता में दस साल नानाजी की हवेली में बिताया समय
राजस्थान में जनसंघ की जड़ों को गहरा करने और आगे चलकर जब जनसंघ भारतीय जनता पार्टी बना तो उसे राजस्थान में स्थापित करने में आडवाणी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर सबको चौंकाते हुए भारतीय जनता पार्टी के वयोवृद्ध नेता और पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न देने की घोषणा की। आडवाणी दस साल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में पूर्णकालिक प्रचारक रहे हैं और बाद में संघ की राजनीतिक शाखा जनसंघ में उन्होंने तीन दशक से अधिक कार्य किया। आडवाणी भारतीय जनता पार्टी के संस्थापक सदस्य भी हैं। उनका राजस्थान से बेहद गहरा नाता रहा है और उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत यही से की थी।
लालकृष्ण आडवाणी जब मात्र 14 साल थे, तब वर्ष 1941 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बन गए थे। देश के बंटवारे से पहले वो वर्ष 1947 तक कराची (अब पाकिस्तान में) में संघ की शाखाएं लगाते थे। देश के बंटवारे के बाद वो प्रचारक बनकर राजस्थान आ गए। यहां अलवर, भरतपुर, कोटा, बूंदी और झालावाड़ जिलों में उन्होंने वर्ष 1952 तक कार्य किया।
आरएसएस पर जब वर्ष 1948 में प्रतिबंध लगा तो संघ ने महसूस किया कि उसका अपना कोई राजनीतिक संगठन होना चाहिए, तब जनसंघ की स्थापना हुई। संघ ने आडवाणी को राजस्थान में जनसंघ को स्थापित करने के लिए वर्ष 1952 में भेजा। राजस्थान में जनसंघ की जड़ों को गहरा करने और आगे चलकर जब जनसंघ भारतीय जनता पार्टी बना तो उसे राजस्थान में स्थापित करने में आडवाणी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
वर्ष 1952 में जनसंघ का कार्यालय जयपुर में प्रसिद्ध हवा महल के करीब पुरानी राजस्थान विधानसभा के सामने धाभाई जी की हवेली में था। आडवाणी यही से जनसंघ की गतिविधियों को चलाते थे। इस हवेली में आडवाणी कुछ समय तक रहे भी। उसके बाद संघ का कार्यालय जयपुर के पुराने शहर में चौड़ा रास्ता में नानाजी की हवेली में खुल गया। यह हवेली बाद में संघ का मुख्यालय भी बनी थी। नानाजी स्वयं जागीरदार थे और संघ से उनका गहरा जुड़ाव था। आडवाणी नानाजी की हवेली में करीब 10 साल तक रहे और जनसंघ को राजस्थान में जमाया। जनसंघ के नेताओं का नानाजी की हवेली में आना-जाना था।
राजस्थान विधानसभा के वर्ष 1952 में हुए पहले चुनाव में आडवाणी ने ही भैरोंसिंह शेखावत को टिकट दिया था। इस चुनाव में भैरोंसिंह शेखावत समेत 8 विधायक जनसंघ के चुनकर आए थे। एक तरह से आडवाणी ही भैरोंसिंह शेखावत को राजनीति में लाए थे। शेखावत बाद में राजस्थान के मुख्यमंत्री और देश के उप राष्ट्रपति भी रहे। फिर जब वर्ष 1952 में लोकसभा का चुनाव आया तो आडवाणी ने भानु कुमार शास्त्री को टिकट दिया था। शास्त्री बाद में राजस्थान में विधायक और यहां से सांसद भी रहे।
आडवाणी के रहते ही जनसंघ ने राजस्थान में जागीर प्रथा को समाप्त करने वाले राजस्थान भूमि सुधार एवं जागीर पुनर्भरण अधिनियम 1952 का समर्थन किया था, जिसके बाद भैरोंसिंह शेखावत और जगत सिंह झाला को छोड़कर शेष 6 जनसंघ विधायकों ने विरोध में पार्टी छोड़ दी थी। तब यूं लगा था कि राजस्थान में जनसंघ समाप्त हो जाएगा, लेकिन आडवाणी और भैरों सिंह शेखावत की राजनीतिक कुशलता ने पार्टी को गिरने नहीं दिया।
लालकृष्ण आडवाणी को खिचड़ी खाना बहुत पसंद था। वो जयपुर में नानाजी की हवेली पर कोयले की सिगड़ी रखते थे, जिस पर अक्सर खिचड़ी बनाकर खाया करते थे। आडवाणी को चाय पीने का भी शौक था। संघ कार्यालय के पास एक सिंधी की चाय नाम की दुकान थी, जहां वो अक्सर चाय पिया करते थे।
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