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बाबा रामदेव का बयान और समाज: इलाज़ प्रणालियों की निंदा से साख़ नहीं बढ़ती 

Tue, 25 May 2021 11:15 AM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Tue, 25 May 2021 11:15 AM IST
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baba ramdev statement on allopathic medicine and politics
आजकल दुनिया भर में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति एक तरह से स्वीकार कर ली गई है। - फोटो : Twitter

बाबा रामदेव को बयान वापस लेना ही था। उनके पास कोई विकल्प भी नहीं था। जिस चिकित्सा पद्धति के सहारे सारा संसार कोरोना जैसी भयावह महामारी पर नियंत्रण पाने का प्रयास कर रहा है,उसकी ऐसे नाजुक वक्त में बेवजह निंदा करने का कोई कारण समझ में नहीं आता।सिवाय इसके कि एलोपैथिक पद्धति को ख़ारिज करके अपनी कंपनी की आयुर्वेदिक दवाओं की बिक्री बढ़ाई जाए। यदि इसे सच मान लिया जाए तो समूचा पेशेवर चिकित्सा तंत्र इस आधार पर बाबा रामदेव की निंदा ही करेगा ।

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चिकित्सा की किन्हीं दो मान्य प्रणालियों पर भरोसा रखने वालों के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं,लेकिन इस वजह से कोई एक प्रणाली बेकार नहीं ठहराई जा सकती। यह भी स्वीकार करना होगा कि मेडिकल कौंसिल ऑफ इंडिया के सख़्त रवैए और केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री की चिट्ठी से अचानक बाबा का हृदय परिवर्तन नहीं हो गया है। असल वजह तो यह है कि अगर उनके बयान के बाद हिंदुस्तान का समूचा चिकित्सा तंत्र बाबा के खिलाफ़ खड़ा हो जाता तो दुनिया भर में भारत का उपहास होता। कोरोना से दिन रात लड़ रहे भारतीय डॉक्टर और उनके सहयोगी यदि बयान के विरोध में सड़कों पर उतर आते तो सरकार की कितनी फजीहत होती। इससे बाबा और उन्हें संरक्षण देने वालों का तो कुछ नहीं बिगड़ता अलबत्ता मुल्क की जगहंसाई होती।
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वैसे तो आजकल दुनिया भर में आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति एक तरह से स्वीकार कर ली गई है। इलाज की एक प्रणाली के रूप में उसकी मान्यता में कोई संदेह नहीं है।लेकिन एलोपैथिक पद्धति सर्वाधिक लोकप्रिय और विश्वसनीय है। ऐसी स्थिति में आप अपने उत्पादों का विक्रय बढ़ाने के लिए किसी अन्य पद्धति को ख़ारिज नहीं कर सकते। क्या बाबा रामदेव का कोई समर्थक अपने परिवार के किसी सदस्य को कोरोना होने पर यह कह सकता है कि वह एलोपैथिक प्रणाली से इलाज नहीं कराएगा ।
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तो फिर हिंदुस्तान के ये चुनिंदा प्रतीक पुरुष अपने बयानों से संसार के सामने भारत की छबि एक विदूषक जैसी क्यों बनने दे रहे हैं ? बीते दिनों बीजेपी की एक तेज़ तर्राट महिला सांसद ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वे अब तक कोरोना से बची हैं तो उसका एकमात्र कारण गौमूत्र सेवन है।
 

baba ramdev statement on allopathic medicine and politics
गौमूत्र पीने से कोविड19 महामारी नहीं होती। इसका क्या किया जाए। - फोटो : अमर उजाला

गौमूत्र पीने से कोविड19 महामारी नहीं होती। इसका क्या किया जाए। संविधान की शपथ लेने वाले सांसद जब इस तरह के बयान देते हैं तो क्या वे संविधान का मखौल नहीं उड़ाते। उसी संविधान का,जिसमें भारत के लोगों के बीच आधुनिक सोच और साइंटिफिक टेंपर विकसित करने का संकल्प लिया गया है। जो लोग शरीरक्रिया विज्ञान की मामूली समझ भी रखते हैं,वे जानते हैं कि हर व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता और बीमारियों का मुक़ाबला करने का एक व्यावहारिक चरित्र होता है।

ऐसे में संभव है गौमूत्र का यूरिया किसी के लिए मुफीद हो,पर वह डेढ़ सौ करोड़ नागरिकों पर लागू होगा,इसकी गारंटी कौन ले सकता है।सांसद के बयान की कड़ी निंदा हुई और देश के जाने माने चिकित्सा विशेषज्ञों ने गहरी हताशा जताई। सांसद की तो छोड़िए।क्या आज भारत का कोई आयुर्वेदिक डॉक्टर गारंटी ले सकता है कि वह गौमूत्र से किसी कोविड पॉजिटिव को ठीक कर सकता है। ज़ाहिर है कि कोई ऐसा दावा नहीं कर सकता।फिर एक लोकसभा सदस्य ऐसी बेतुकी बात कैसे कह सकता है ? 

चंद रोज़ पहले एक अंतरराष्ट्रीय चैनल ने भारत की एक ख़बर दिखाई थी।ख़बर में दिखाया गया था कि गाय का गोबर शरीर पर मलने से कोरोना नहीं होता।रिपोर्ट में भारत के एक राज्य के कुछ लोग सामूहिक रूप से मंत्रोच्चार के बीच बदन पर गोबर का लेप कर रहे थे।उस वीडियो में उनका प्रवक्ता दावा कर रहा था कि गोबर लेप से कोरोना दूर भागता है।इसी रिपोर्ट में एक डॉक्टर और इंडियन मेडिकल कौंसिल के हवाले से इस दावे को खारिज़ किया गया था।सरकारी प्रवक्ता ने कहा था कि इसका कोई सुबूत नहीं है कि गोबर के लेप से कोरोना का संक्रमण दूर होता है।

सवाल पूछा जा सकता है कि क्या गोबर का लेप करने वाले अपने परिवार के सदस्यों को भी इस इलाज के लिए राज़ी कर सकते हैं ?ज़ाहिर है कि इस तरह के बेबुनियाद कथनों से हिंदुस्तान की प्रतिष्ठा पर आंच आती है।पश्चिम और यूरोप के लोग यक़ीनन पूछना चाहेंगे कि अगर भारत के पास कोरोना से मुक्ति के लिए गोबर और गौमूत्र जैसी अचूक दवाएं प्रचुर मात्रा में हैं तो फिर तमाम देशों से दवाएं,रॉ मैटेरियल,इंजेक्शन और ऑक्सीजन की भीख हम क्यों मांग रहे हैं।

यदि एलोपैथिक चिकित्सा प्रणाली बेकार है और किसी काम की नहीं है तो भारत सरकार हर प्रांत में ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज याने एम्स क्यों खोल रही है ?जहां भी एम्स काम कर रहे हैं,उनमें भरती के लिए मरीजों को आसमानी ताक़त क्यों लगानी पड़ती है।

भारतीय संसद हर साल एलोपैथिक चिकित्सा पद्धति से डॉक्टर तैयार करने पर अरबों रुपए क्यों खर्च कर रही है। हमें याद है कि इस देश के एक सिद्धांतवादी प्रधानमंत्री प्रतिदिन स्वमूत्र पान करते थे और उन्होंने लंबी उमर पाई। मगर उन्होंने अपनी आस्था का न तो कभी ढिंढोरा पीटा और न अपनी थैरेपी के कारण अन्य चिकिसा प्रणालियों को खारिज़ किया।उनके कार्यकाल में भी एलोपैथिक इलाज चलता रहा।राष्ट्रपिता महात्मा गांधी स्वयं प्राकृतिक और देसी इलाज में भरोसा करते थे,पर उन्होंने एलोपैथी को कभी नहीं दुत्कारा ।प्रश्न मीडिया पर भी है कि वह ऐसे फिज़ूल के बयानों को स्थान क्यों देता है ?

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 

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