Ayodhya : क्या भव्यता और स्वच्छता को कायम रख पाएंगे हम?
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श्री राम, जय श्री राम, प्रभु श्री राम.... जाने कितने कितने नाम... हर नाम के साथ मन को मिलती है शांति और आराम....22 जनवरी 2024 को अयोध्या में श्री राम की शुभ प्रतिमा का प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान होने जा रहा है। करोड़ों-अरबों की लागत से अयोध्या नगरी की काया पलट कर दी गई है। दूर-दूर से लोग चले आ रहे हैं। देश-विदेश के मीडियाकर्मी वहीं डेरा डाले हैं। आम श्रद्धालु जनता से लेकर साधु-संत, नेता-अभिनेता, उद्योगपति, इंजीनियर, वास्तुविद, ज्योतिषाचार्य हर वर्ग से हर उम्र के लोग बस अयोध्या की तरफ ही रुख कर रहे हैं।
यह वाकई अद्भुत क्षण है, होना भी चाहिए, लेकिन श्री राम मंदिर के नाम पर एक तरफ मंदिर की प्रतिकृति बेचने की होड़ लगी है। वहीं सोशल मीडिया पर चमत्कार की भरमार है। कहीं गिद्ध आ रहे हैं, कहीं वानर दौड़े चले जा रहे हैं कहीं नाग देवता अवतरित हो रहे हैं, तो कहीं सीधे पुष्पक विमान ही देखे जाने के वीडियो और खबरें परोसी जा रही हैं। राम जी के भजन सुनने-सुनाने के साथ काव्य और गद्य रचने की भी प्रतिस्पर्धा चल पड़ी है। विरोध और विपक्ष के अपने खेल और बयान जारी है।
मन श्री राम की सादगी के पाठ याद करता है और सोचता है 2024 तक आते-आते हम क्या हो गए हैं और अपने आराध्य के साथ हम किस सीमा तक जा रहे हैं। लाइक, कमेंट और शेयर की दुहाई अब डराने और भक्ति की परीक्षा लेने पर भी उतर आई है। यहां तक कि प्रतिकृति लाने से ही खुशखबरी मिलने के विज्ञापन भी मार्केट में आ गए हैं। यकीनन 22 जनवरी का दिन आस्था और भक्ति का विलक्षण संगम है। कुछ साल पहले अयोध्या प्रवास के दौरान सरयू नदी का मीठा छल छल करता जल जब अंजुरी में लिया था तो आंख के आंसू उस जल में मिल गए थे।
भक्ति के अतिरेक में हमने भी प्रभु श्री राम और माता सीता के दर्शन उस जल में किए थे। मगर हम फिर भी होश में थे जबकि आज सोशल मीडिया हर परिधि को लांघ रहा है। एक तरफ सजी धजी अयोध्या नगरी और दूसरी तरफ भक्ति से सराबोर लोगों की भीड़ के वीडियो देख कर बार बार सवाल यही आता है कि क्या यह सब यूं ही कायम रह पाएगा।
महाकाल लोक की दशा देखने के बाद इस सवाल को और अधिक बल मिला है कि आप सुंदरता तो थोप सकते हैं लेकिन स्वच्छता तो आदत और व्यवहार से लानी होती है। इतने बड़े जनसमुदाय के साथ स्वच्छता और रखरखाव के दायित्वों को बखूबी निभा पाना क्या आसान होगा?
क्या वहां के निर्वासित जन का असंतोष न सुनने से वह भीतर ही भीतर पनप तो नहीं रहा होगा। अयोध्या का युवा, अयोध्या का छोटा-बड़ा व्यापारी वर्ग, अयोध्या के संतों के भीतर चल रही उद्विग्नता को अनदेखा करना कहीं भारी तो नहीं पड़ेगा? आम जनता तो मासूम होती है, भोली होती है, डरती भी है और धर्म, आस्था व भक्ति को अपनी परेशानियों से ऊपर रखती है।
जब जब खुद के रोटी-रोजगार का प्रश्न उठेगा वह पहले अपनी धरती के गौरव गान को सुनकर देखकर मुग्ध होगी। देश भर के रोमांच और चमत्कार में शामिल हो जाएगी लेकिन कब तक? भीड़ बढ़ेगी तो हर दिन समस्या भी बदलेगी मन तो राममय है, तन भी भगवा है, धन भी आ रहा है पर जो नहीं है वह कैसे भूल जाए।
भीड़ में शामिल हो जाए या भीड़ से भाग जाए। अयोध्या के स्थानीय निवासी कहां है? कौन हैं? क्या सोच रहे हैं? कैसे निपट रहे हैं? उन्हें कब सुना जाएगा? उन्हें कौन देखेगा? क्या उनके घर और जमीन के बदले मिला मुआवजा उनके मन को खुश कर पा रहा है? रामराज्य की स्थापना ''लोक'' को भूलकर कैसे होगी? श्री राम के जयकारे में शामिल होकर भी कुछ अनचाहे सवाल टकराते हैं। ढेर सारे सवालों के बीच बड़ा सवाल फिर यही कि क्या इस भव्यता और स्वच्छता को लम्बे समय तक कायम रख पाएंगे हम?
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।