अखोनी: भारतीय जातिवादी व्यवस्था की जड़ों के प्रति पूर्वोत्तर की दृष्टि
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भारत में पूर्वोत्तर क्षेत्रों के लोगों के खिलाफ हमेशा से एक विभेद का भाव रहा है। वे हमेशा नस्लवाद के शिकार रहें हैं। रातों रात मकान मालिकों द्वारा घर से बेघर करना, चेहरे की बुनावट को लेकर भद्दे गालियों के साथ-साथ थूक फेंकना, मारपीट करना, मॉल में समान खरीदते वक्त अपमान करना, अलग अलग नाम से पुकारना यह आम है।
यह तो दैनिक सामाजिक व्यवहार है जो भारत के बड़े शहरों में जहां तहां सुनाई और दिखाई पड़ता ही है। ऐसे में पूर्वोत्तर के लोगों की दुर्दशा, जिसके जिम्मेदार हम सब हैं, ‘अखोनी’ के माध्यम से निकोलस खरकोंगोर ने नेटफ्लिक्स पर दिखाया है।
कहानी चणबी (लाईशराम) और उपासना (सयानी) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने दोस्त मीनम (जमीर) की शादी में एक पोर्क से बना विशेष डिश पकाने की कोशिश कर रही है। चूंकि इसे बनाने के दौरान तीखा गंध फैलता है तो सबने इसे पकाने के ऐसे तरीके अपनाते हैं कि सबको लगे कि ये गंध कहीं और से आ रहा है। पर ऐसा होता नहीं है। चीजें हाथ से निकल जाती हैं और अचानक से भारत का जाति आधारित दिल धड़कने लगता है।
अड़ोस-पड़ोस और मकान मालिक उन सबके फूड कल्चर को न ही समझते हैं, न ही उस उत्साह और लगाव को जो अमूमन पकाने की तैयारी से शुरू होता है। किसी ने ये भी समझने की जरूरत नहीं समझी कि सभी पूर्वोत्तर वासी इस बात को जानते हुये कि सबको दिक्कत होगी तो उन्होंने कितना एहतियात बरता है। वे सभी दूसरों की भी चिंता के साथ साथ ख्याल रखते हैं इसे दिल्ली का दिल नहीं समझ पाया।
अखुनी कोई बड़ा प्रोपगेंडा न रचते हुए सभी किरदारों को मानवीय पक्ष में जीते हुए दिखाता है। उपासना, चणबी, और जोरम उस सामाजिक रूप से बहिष्कृत डिश का समान इकट्ठा करने दिल्ली की तंग गलियारों से गुजरते हुए खरीदती हैं। हाथ में लेते हुए मानों उनका चेहरा ऐसा होता है जैसे वे कोई अवैध काम कर रही हो। ये भाव हमने ही उनके अंदर भरा है जो उनको अपनी ही संस्कृतियों और परंपराओं को जीने में डर सा दे गया है।
चणबी के सब्जी खरीदने के दौरान पीछे बैठे, समय काटते दो लड़के की अश्लील बातचीत के विरोध करने पर चणबी के ऊपर उठाए थप्पड़ की चांटे दर्शकों के कानों में गूंज ला देती है। ये थप्पड़ उठाने की ताकत वहाँ के लोगों के दिये घटिया और पूर्वाग्रहित बयान भरते हुए दिखाई पड़ते हैं। उनकी संस्कृतियों और परंपराओं को समस्याग्रस्त कर दिया है, उन्हें गौरव शर्मा के लिखे संवादों ने काफी सामान्य लहजे में सबके सामने लाने की कोशिश की गई है।
हमें हमेशा से अपने पाठ्यक्रम और पढ़ाई-लिखाई में सिखाया जाता रहा है कि भारत में विविधता है, कई तरह के लोगों का देश है, सिर्फ एक का नहीं है। तो इस अभिजात्य वर्ग को क्या दिक्कत है? जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, साफ स्पष्ट होता जाएगा कि अभिजात्यवाद किसी की असंवेदनशीलता को ढंकने में माहिर होते हैं। वे हमेशा अपनी असुरक्षा का भाव लिए जीते हैं। ठीक वैसे जब कैमरे चालू होते हैं तो वे सहज और सहनशील होने की बात कर सकते हैं। लेकिन जब कैमरे बंद हो जाते हैं, तो हम अपना असली रंग दिखाते हैं।
पिछले कुछ महीनों से कोरोना महामारी के दौरान पूर्वोत्तर के लोगों को किस तरह से परेशान किया गया ये किसी से छिपा नहीं है। उनपर आरोप लगाया गया कि वे कोरोना वायरस के वाहक हैं क्योंकि उनके चेहरे चीनी के समान हैं। इस पर रुक कर सोचने को विवश किया है, लानुकुम एओ ने ‘बेंडैंग’ के अपने किरदार में। हम सबने कितने स्तरों पर इन सबों के लिए समस्या पैदा की है, यह सही और साफ दिखाई पड़ता है।
बेंडैंग के जीवन को हम सबने अपने तिरस्कार और अपमान से झुंझलाहट से भर दिया है। इसके अलावा, खरकॉन्गर नस्लवाद को सामान्य रूप से स्वीकारते हुए ‘हिंदी-चीनी भाई-भाई’ के चुटकुलों के माध्यम से टिप्पणी करती दिखाई पड़ती है। इनके साथ किए गए तिरस्कार को वे लोग अपराध भी घोषित नहीं कर सकते।
आप क्या पहन रहें हैं, क्या खा रहें हैं, कैसे बात कर रहें हैं, कैसे दिखते हैं, कैसे रहते हैं– इन सब पर लगातार आंखों, जुबान और बॉडी-लैंगवेज से प्रहार किए जाते हैं। कमतर आंके जाते हैं। पूर्वोत्तर के लोगों को मौन रहना पड़ता है और उन्हें अपने ही तरीकों में विकलांग बनना पड़ता है। घुटन और दबाब के बीच अखुनी पकता है।
निरंतर नस्लवाद और उत्पीड़न आपको अंदर से मिटा देते हैं। यहां तक कि अगर आप इसके अधीन नहीं हैं, तो आप अपने चारों ओर दीवारें बनाते हैं और उन हाथों को देखना बंद कर देते हैं जो आपकी मदद करने के लिए पहुंच रहे हैं। यह मिनाम की शादी के माध्यम से दिखाया गया है। नस्लवाद के जहर का ऐसा असर होता है कि 12 घंटे के भीतर एक व्यक्ति सबसे बहुत दूर चला जाता है, जिसकी शुरुआत दिन से था। लिन और चणबी इसे अपनी बॉडी लैंग्वेज और अपनी आवाज में घटती मात्रा के माध्यम से दिखाते हैं।
निकोलश ने विनम्रता पूर्वक यह फिल्म बनाई है, जिसमें संस्कृति, परंपरा और आधुनिकता सभी भरे हुए हैं। वे सभी लोगों को आमंत्रित करते हुए उन्हें बिना किसी उपदेश के अप्रवासी के साथ हो रहे नस्लवाद को दिखा पाएं। ये अप्रवासी जिन छवियों को लेकर बड़े शहरों की ओर रुख करते हैं उनकी आंखों में हम कैसी छवि बना रहें हैं ये अखुनी के पकते–पकते तक दिख जाता है। अखुनी के बनते–बनते हम सामने रखे आईने में भी अपना चेहरा गौर से देख रहें हैं जिस चेहरे को हमने खुद ही मैला किया हुआ है।
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