फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Attacks in Tamil Nadu dialects dividing homes in UP Bihar

राजनीति की आंधी में कांपता हिंदी का दीया: तमिलनाडु में हमले, यूपी-बिहार में घर बांट रहीं बोलियां

Tue, 11 Mar 2025 10:45 AM IST
Kumar Dinesh कुमार दिनेश
Updated Tue, 11 Mar 2025 10:45 AM IST
सार

दक्षिण भारत , विशेषकर तमिलनाडु में नई शिक्षा नीति और त्रिभाषा नीति लागू करने के विरुद्ध राजनीतिक दुराग्रह का निशाना हिंदी को बनाया जा रहा है।

विज्ञापन
Attacks in Tamil Nadu dialects dividing homes in UP Bihar
एमके स्टालिन, सीएम, तमिलनाडु - फोटो : ANI

विस्तार

मार्च 2025 के पहले सप्ताह में जब तमिलनाडु की डीएमके सरकार हिंदी और हिंदीभाषियों पर भौतिक-राजनीतिक हमले तेज कर रही हो, तब हिंदीभाषी समुदाय का लगभग उदासीन और अन्तर्विभाजित पड़े  रहना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है।

विज्ञापन


दो साल पहले  तमिलनाडु में हिंदीभाषी मजदूरों-कामगारों पर राज्यभर में  चाकू-कुल्हाडी से जानलेवा हमले की घटनाएं हुई थीं। उसमें 50 से अधिक लोग घायल हुए थे, दो की हत्या हुई और इन घटनाओं से डरे हिंदीभाषी कई दिनों तक जहाँ रह रहे थे, वहाँ मकान से बाहर नहीं निकले थे।
विज्ञापन

बिहार-यूपी लौटने वाली ट्रेनों में दहशत भरी भीड़  उम्रड़ आई थी।

लोग देवी-देवता और छठी मइया से रिजर्वेशन नहीं, जीवित घर लौटने भर की मनौती मांग रहे थे। उस समय वहाँ सत्तारूढ़ दल के समर्थक तमिलों ने रोजगार छीनने का आरोप लगाकर बिहार-यूपी के हिंदीभाषी मजदूरों-कामगारों पर हमले किये थे। अब केद्र सरकार की नई शिक्षा नीति के जरिये तमिलों पर हिंदी थोपने का आरोप लगाकर माहौल बिगाड़ा जा रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन


क्या है नई शिक्षा नीति?

दक्षिण भारत , विशेषकर तमिलनाडु में नई शिक्षा नीति और त्रिभाषा नीति लागू करने के विरुद्ध राजनीतिक दुराग्रह का निशाना हिंदी को बनाया जा रहा है, जबकि भारत की 2.5 लाख ग्राम पंचायतों और 676 जिलों के जनप्रतिनिधियों के सुझाव पर विचार कर बनी नई शिक्षा नीति-2020 (एनईपी) में सभी 22 भारतीय भाषाओं को प्रोत्साहित करने का पूरा ध्यान रखा गया है।

नई शिक्षा नीति   1968-1986 की शिक्षा नीति की अपेक्षा अधिक समावेशी है, फिर भी हिंदी-संस्कृत को लेकर तमिलनाडु के सत्तारूढ़ दल का दुराग्रह कम नहीं हुआ है।

अब छात्र कोई भी दो भारतीय भाषाएं  पढ सकते हैं,  हिंदी, कन्नड़ या तमिल , यानी किसी भाषा को पढना किसी के लिए अनिवार्य नहीं है। यह उदारता तमिलनाडु के भाषाई चरमपंथियों  को चुभ रही है, वे इसे "हिंदी थोपना" बता रहे हैं। भाषा के इस प्रकरण को वहां की डीएमके  सरकार केंद्र की मोदी सरकार से टकराव का नया मुद्दा बना रही है।

हिंदी-विरोधी राजनीति पर चुप्पी

सवाल यह है कि जब डीएमके शासित तमिलनाडु में हिंदी और हिंदीभाषियों पर सीधे हमले हो हैं, तब कांग्रेस नेतृत्व वाले 26 दलीय इंडी गठबंधन में इस मुद्दे पर चुप्पी क्यों है? डीएमके प्रमुख स्टालिन के आपत्तिजनक बयानों की अनसुनी करना  हिंदीपट्टी में जनाधार का दावा करने वाले कांग्रेस, राजद, सपा जैसे दलों के लिए सुविधाजनक क्यों है? 

जाहिर है, कि जैसे हिंदू कोई वोट बैंक नहीं है, हिंदू आस्था का अपमान कोई कॉमेडियन भी कर सकता है, कोई नेता महाकुम्भ को 'फालतू' कह सकता है, वैसे ही भाषा के तौरपर हिंदी कोई वोट बैंक नहीं है, इसलिए इस वोट-दरिद्र भाषा का अपमान किया जा सकता है। तमिलनाडु को हिंदीभाषियों की वोट-दरिद्रता और भाषाई दर्पहीनता का पता है, इसलिए वहाँ बार-बार आघात हो रहे हैं।

परिवारवादी डीएमके में करुणानिधि की विरासत पाकर मुख्यमंत्री बने स्टालिन ने त्रिभाषा फार्मूले और नई शिक्षा नीति के विरुद्ध  जो सर्वदलीय बैठक बुलाई है, उसमें कांग्रेस सहित 45 दलों को आमंत्रित किया गया है, लेकिन केवल भाजपा ने इसके बहिष्कार की घोषणा की। क्या बाकी दलों को अपने हिंदीभाषी जनाधार के सम्मान की रक्षा में कुछ नहीं बोलना चाहिए?

हिंदी समर्थकों का मौन!

यदि  राजनीतिक हलके में  स्टालिन के हिंदी-विरोधी बयानों पर राहुल गांधी , लालू प्रसाद, अखिलेश यादव आदि चुप हैं, तो कोई आश्चर्य नहीं, लेकिन भाषा -शिक्षा , पत्रकारिता और साहित्य के उत्तर भारतीय क्षितिज से भी हिंदी की अस्मिता के पक्ष में कोई स्वर नहीं फूटना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है ।

दरअसल, इस अराजनीतिक दिखते सन्नाटे के पीछे है हिंदी की बोलियों को भाषा का दर्जा दिलाने की मीठी राजनीति ( साफ्ट पालिटिक्स)  करने में लगे समूह या संगठन। जैसे , जातीय जनगणना की राजनीति हिंदू अस्मिता को विरल करती है, उसी तरह बोलियों की सियासत  55 करोड़ लोगों के विशाल हिंदीभाषी समुदाय को बाँट-छांट कर छोटा करने पर तुली है।

जब हिंदी की मीठी आंचलिक बोलियों ( डायलेक्ट) को अलग भाषा ( लैंग्वेज) या मातृभाषा बताने का आग्रह सुनियोजित तरीके से बढाया जाएगा, तब हिंदी किसी की भाषा नहीं रहेगी, हिंदीभाषी अल्पसंख्यक हो जाएँगे। हिंदी को राष्ट्र भाषा बनाने का सपना धरा रह जाएगा। तमिलनाडु यही चाहता है, इसलिए स्टालिन आरोप लगा रहे हैं कि हिंदी दक्षिण भारत की भाषाओं के लिए ही नहीं, उत्तर भारत की भोजपुरी, मगही, अंगिका, मैथिली, अवधी, बुंदेलखंडी जैसी "भाषाओं" के लिए खतरा है।

इधर यूपी-बिहार में लोग अपनी आंचलिक बोलियों को मातृभाषा बताने की मुहिम चला कर स्टालिन का परोक्ष समर्थन ही कर रहे हैं। ऐसे में हिंदी किसी की मातृभाषा नहीं रह जाएगी। भाषा राजनीति की आंधी में कांप रहा है हिंदी का दीया ।

लगभग 200 हिंदीभाषी सांसदों, हिंदी के विकास में लगे दर्जनों संगठनों, हिंदी साहित्य सम्मेलन, अन्तरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय या राष्ट्रभाषा परिषद जैसे किसी संगठन -संस्थान ने तमिलनाडु के हिंदी-संस्कृत विरोधी नरेटिव के विरुद्ध कोई टिप्पणी नहीं कर जो उदासीनता दिखाई, वह आत्मघाती है। विचलित करने वाली यह स्थिति बदलनी चाहिए।

एक मोमबत्ती भी न जली

तमिलनाडु की भाषाई असहिष्णुता  और हिंसक घटनाओं के विरुद्ध दिल्ली के जंतर-मंतर पर या हिंदीभाषी प्रदेशों की राजधानी में हिंदी समर्थक महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने भी कोई मोमबत्ती जलाने नहीं आया!  हिंदी वालों ने हर काम सरकारों और नेताओं के भरोसे छोड़ दिया है। हिंदी दिवस मनाने वाले भी पूरे परिदृश्य से गायब हैं।

बाहर हिंदीभाषी, घर में भोजपुरिया! 

विडम्बना देखिये कि असम , केरल, महाराष्ट्र या तमिलनाडु में जो लोग हिंदीभाषी पहचान के कारण मारपीट का शिकार होते हैं, उन्हें बिहार-यूपी लौटने पर अपने घर में भोजपुरी,  मगही, मैथिली, अंगिका भाषी पहचान प्रिय है। हिंदीभाषी राज्यों में भाषा-बोली के विकास    के लिए नहीं, बल्कि केवल  वोट की राजनीति के लिए बोलियों को भाषा मानकर जो अकादमियाँ बनायी गईं, वे आज हिंदीविरोधी राजनीति की ही धार तेज कर रही हैं।

आज वह  हिंदी संकट में है, जिसे भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनकी परम्परा के साहित्यकारों-पत्रकारों ने गांव-देहात से उठा कर विमर्श ,आलोचना, विज्ञान, न्याय , विधेयन , अनुसंधान, जनसंचार और शासन की भाषा बनने की शक्ति प्रदान की। क्या इस राजपथ से  हम हिंदीभाषियों को खेत की मेड़ और चौपालों में लौट जाना चाहिए? इस पूरे प्रकरण पर व्यापक विमर्श होना चाहिए।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed