विधानसभा चुनाव 2018: किसान बदलेंगे सरकारें? 2019 में पीएम मोदी की होगी असली परीक्षा
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अमूमन माना जता है कि इस देश में किसानों के पास कोई राजनीतिक सांगठनिक शक्ति नहीं है, लेकिन विगत दो तीन सालों में किसान एक बड़ी ताकत के रूप में उभरकर सामने आए हैं। यही नहीं अब इसकी संगठित शक्ति राजनीति को भी प्रभावित करने लगी है। हालांकि भारत में किसान आन्दोलनों का इतिहास पुराना है।
व्यक्तिगत रूप से मेरा मानना है कि मुगलों के खिलाफ सिख सरदारों का सशस्त्र आन्दोलन जो बाद में धार्मिक-राजनीतिक आन्दोलन का रूप ग्रहण किया वह एक किसान आन्दोलन था और यही कारण है कि जब सरहिंद के मैदान में बंदा बहादुर के नेतृत्व में सिख जीते तो बंदा ने सबसे पहले लैंड रिफार्म योजना लागू की। इधर मराठाओं का भी सशस्त्र संगठन मुख्य रूप से किसानों की सेना थी, जिसने एक बड़े साम्राज्य को खड़ा कर दिया था। यही नहीं इसके बाद के कालखंड में भी विभिन्न आन्दोलनों में किसानों की बड़ी भूमिका रही है।
चुनाव परिणाम कुछ भी हो लेकिन किसान हैं बड़ी ताकत
विगत दिनों संपन्न पांच राज्यों का परिणाम अभी आने वाला है। इन राज्यों के चुनाव में भी किसानों का व्यापक प्रभाव देखा गया है। यदि सत्ता पक्ष में हार की चिंता है तो उसके लिए अन्य कारणों से ज्यादा प्रभावी कारण किसानों की नाराजगी भी है। इसका एक उदाहरण ध्यान भी आता है। अभी-अभी मध्य प्रदेश का चुनाव संपन्न हुआ। वहां राजकीय व्यवस्था के अनुसार किसान अपना उत्पाद पैक्स के माध्यम से बचते हैं। पैक्स किसानों का उत्पाद खरीदता तो जरूर है लेकिन जिन किसानों के पास बैंकों का ऋण होता है उन किसानों का ऋण का पैसा काट लिया जाता है।
इस बार किसानों ने अपना उत्पाद पैक्स को नहीं बेचा। मध्य प्रदेश के किसानों का मानना है कि चूंकि सत्ता परिवर्तित होने वाली है। भाजपा के बदले कांग्रेस का शासन आने वाला है और कांग्रेस किसानों का ऋण माफ कर देगी, इसलिए मध्य प्रदेश के किसान अभी तक अपना उत्पाद रखे हुए हैं। मध्य प्रदेश के किसानों का विश्वास यह साबित करता है कि किसान एक बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में उभरकर सामने आ रहे हैं।
केंद्र से भी नाराज हैं किसान
यही नहीं नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार से किसान खासे नाराज हैं। विगत साढे़ चार वर्षों में किसानों ने सभी मोर्चों पर मोदी सरकार के खिलाफ संघर्ष किया है। अभी-अभी किसानों का संयुक्त मोर्चा दिल्ली में जमा हुआ था। इससे पहले भी कई किसान संगठनों ने दिल्ली आकर अपनी बात सरकार को सुना गए हैं।
गन्ना किसानों की नाराजगी के कारण ही उत्तर प्रदेश के संसदीय उपचुनाव में भाजपा को भारी क्षति उठानी पड़ी थी। हालांकि सरकार ने बाद में गन्ना किसानों के हित के लिए कई घोषणाएं की लेकिन वह गन्ना किसानों को कम और चीनी मील मालिकों को ज्यादा फायदा पहुंचाया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान अभी भी नाराज हैं जो आने वाले समय में भाजपा के लिए खतरा उत्पान्न कर सकते हैं। यही हाल दक्षिण में भी है।
क्यों भाजपा से नाराज हैं किसान
यहां एक बात का उल्लेख करना बेहतर होगा। विगत दिनों विधानसभा चुनाव के दौरान जब गुजरात गया तो सौराष्ट्र के किसानों से मुलाकात हुई। इस बार सौराष्ट्र के किसान जो किसी जमाने में भाजपा की ताकत हुआ करते थे उनका भाजपा के प्रति आक्रोश सचमुच मेरे लिए नई बात थी। इस परिवर्तन के बारे में किसानों ने बताया कि नोटबंदी के कारण सौराष्ट्र के किसानों को बहुत घाटा हुआ। सौराष्ट्र में खासकर कपास की खेती करने वाले किसान आपस में संगठन बनाकर पैसा एकत्र करते हैं।
ये किसान खेती के समय सहकारिता के आधार पर एक-दूसरे की मदद भी करते हैं। पहले किसान ग्रामीण शाहुकारों से ऋण लेते थे, लेकिन जब से किसानों ने सहकारिता की व्यवस्था की तब से वे साहुकारों से ऋण लेना बंद कर दिए, ये इसलिए भी ऐसा करते हैं कि सौराष्ट्र में सरकारी बैंकों की कमी है। साथ ही बैंकों की प्रक्रिया बेहद कठिन होता है, इसलिए किसानों ने अपना खुद का बैंक खड़ा कर लिया है। ये इनके लिए आसान होता है, लेकिन नोटबंदी के कारण किसानों के इस खुद के सहकारिता का पैसा डूब गया और उसके कारण किसान अभी तक नहीं उबर पाए थे। आप देखेंगे इसके कारण सौराष्ट्र में जो भाजपा किसी जमाने में मजबूत होती थी वह आज कमजोर दिख रही है। इस बात के विधानसभा चुनाव में सीटें भी इस बार कम मिली है।
यूपीए में भी ठीक नहीं थी किसानों की हालत
हालांकि डॉ मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दौरान भी किसानों की हालत कुछ ज्यादा अच्छी नहीं थी, लेकिन उस सरकार ने किसानों के लिए कुछ अच्छे काम किए थे। यही करण है कि मनमोहन सिंह दुवारा सत्ता में आ गए, लेकिन नरेन्द्र मोदी की सरकार आते ही किसानों के साथ पंगा ले दिया। पहले तो भू-अधिग्रहण कानून में सेशोधन का प्रस्ताव रखा, फिर बाद में उसे संसद में पास कराने के लिए अध्यादेश तक लाने की कोशिश।
भाजपा का यह निर्णय किसानों में गलत संदेश लेकर गया और देशभर के किसानों का मूड भाजपा के खिलाफ बनने लगा। इसके बाद सरकार ने क्षतिपूर्ति मुआब्जा की पूरी योजना फसल बीमा करने वाली कंपनियों को सौंप दिया। यह किसानों को एक प्रकार से गुलाम बनाने वाली बात हो गई। यह भी किसानों के हित में नहीं गया और किसान नाराज होते चले गए।
मोदी सरकार और खराब हुई
एक आंकड़े में बताया गया है कि किसानों के आत्महत्या करने का दर मोदी सरकार में कई गुणा बढ़ गई है। किसान खेती छोड़ रहे हैं। मोदी सरकार में इसकी दर भी बढ़ी है। ऐसा माना जाने लगा है कि मोदी सरकार ने किसानों से पंगा लिया है। यही कारण है कि देशभर के किसान मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं।
मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान के किसान बुरी तरह मोदी सरकार के खिलाफ हैं। विगत दिनों संपन्न पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में अगर भाजपा की हार होती है तो उसके लिए किसानों को ही जिम्मेवार ठहराया जाना चाहिए। खासकर मध्य प्रदेश में तो किसान फैक्टर बेहद प्रभावी ढंग से इस बार काम कर रहा था। आपको बता दें कि मध्य प्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान की लोकप्रियता अभी भी बनी हुई है,साथ ही संगठन भी मजबूत है। ऐसे में यदि सत्ता जाती है तो इसके लिए किसानों की नाराजगी को ही जिम्मेवार ठहराया जाएगा।
भाजपा को समझना होगा किसान देश में बड़ी ताकत रहे हैं
खैर, संपन्न पांच राज्यों के परिणाम चाहे जो हों लेकिन विभिन्न चुनावी पूर्वानुमान ने यह साबित कर दिया है कि जनता में व्यापक स्तर पर भाजपा और नरेन्द्र मोदी सरकार के खिलाफ नाराजगी है। उन नाराजगियों में से किसानों की नाराजगी बेहद महत्वपूर्ण है। वैसे भाजपा के रणनीतिकार किस रणनीति को साधने में लगे हैं यह तो पता नहीं है लेकिन उन्हें इस बात पर गौर करना चाहिए कि इस देश में किसानों को दरकिनार करके कोई टिक नहीं सकता है। आज भी किसान एक बड़ी ताकत के रूप में उभरकर सामने आए हैं। पहले भी इनका इतिहास संगठित संघर्ष का रहा है।
मसलन भाजपा को यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत के स्वाधीनता आंदोलन में जिन लोगों ने शीर्ष स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, उनमें आदिवासियों, जनजातियों और किसानों का अहम योगदान रहा है। स्वतंत्रता से पहले किसानों ने अपनी मांगों के समर्थन में जो आंदोलन किए वे गांधीजी के प्रभाव के कारण हिंसा और बरबादी से भरे नहीं होते थे लेकिन वे प्रभावशाली जरूर थे। यही नहीं किसानों आन्दोलनों ने स्वातंत्र समर के स्वरूप में भी बदलाव ला दिया।
देश में नील पैदा करने वाले किसानों का आंदोलन, पाबना विद्रोह, तेभागा आंदोलन, चम्पारण का सत्याग्रह और बारदोली में जो आंदोलन हुए थे, इन आंदोलनों का नेतृत्व खुद महात्मा गांधी ने किया था। आमतौर पर किसानों के आंदोलन या उनके विद्रोह की शुरुआत सन् 1859 से हुई थी, लेकिन अंग्रेजों की नीतियों पर सबसे ज्यादा किसान प्रभावित हुए, इसलिए आजादी के पहले भी इन नीतियों ने किसान आंदोलनों की नींव डाली।
जानकारी में रहे कि सन् 1857 के असफल विद्रोह के बाद विरोध का मोर्चा किसानों ने ही संभाला, क्योंकि अंग्रेजों और देसी रियासतों के सबसे बड़े आंदोलन उनके शोषण से उपजे थे। वास्तव में जितने भी किसान आंदोलन हुए, उनमें अधिकांश आंदोलन अंग्रेजों के खिलाफ थे। उस समय के समाचार पत्रों ने भी किसानों के शोषण और उनके साथ होने वाले सरकारी अधिकारियों की ज्यादतियों दर्ज है।
किसान बदलेंगे सरकारें?
पांच राज्यों में संपन्न विधानसभा चुनाव में परिणाम चाहे जो हो लेकिन वोट पर किसानों का दबाव बढता जा रहा है। निःसंदेह रूप से आने वाले समय में किसान एक बड़ी ताकत के रूप में खड़े होंगे। इसकी पूरी संभावना दिख रही है। भाजपा और केन्द्र सरकार को इस मामले पर गंभीरता विचार करना होगा। साथ ही अन्य पार्टियों को भी इस दिशा में सोचने के लिए बाध्य होना होगा। यह इसलिए भी जरूरी है कि किसान यदि खेती छोड़ दिए तो देश के सामने बड़ा संकट खड़ा हो जाएगा। अराजकता बढ़ेगी। खाद्यान की कमी किसी देश के लिए खतरनाक होता है। सत्ता में बैठे लोगों को इस बात पर गंभीरता से विचार करना होगा।
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