विधानसभा चुनाव परिणाम 2022: खुद को बचाना है तो और 'आप' की चतुर युक्तियों से लड़ना होगा कांग्रेस को
दो राज्यों में चुनाव हुए हैं और दोनों के परिणामों में काॅमन कुछ है तो गुजरात में भाजपा राज। जबकि आम आदमी पार्टी गुजरात में कांग्रेस का खेल बिगाड़ने में प्रमुख भूमिका में रही तो हिमाचल उसका हस्तक्षेप नगण्य रहा। जो हाल गुजरात में कांग्रेस का रहा कमोबेश हिमाचल में वही हाल भाजपा का हुआ।
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विस्तार
दिल्ली एमसीडी चुनाव में जीत हासिल करने के बाद अरविंद केजरीवाल ने एक सभा को संबोधित किया और जनता को धन्यवाद दिया साथ ही यह भी कहा- केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से आशीर्वाद चाहता हूं। आज सुबह गुजरात विधानसभा चुनाव के वोटों की गिनती शूरू हुई तब से अब यानि दोपहर बाद तक तस्वीर लगभग साफ हो चुकी है भाजपा विशाल बहुमत के साथ सत्ता अपने पास कायम रखेगी तो कांग्रेस बुरी तरह लड़खड़ाई है और 2017 में वह जहां खड़ी थी वहां से मीलों पीछे हो गई है।
दो राज्यों में चुनाव हुए हैं और दोनों के परिणामों में काॅमन कुछ है तो गुजरात में भाजपा राज। जबकि आम आदमी पार्टी गुजरात में कांग्रेस का खेल बिगाड़ने में प्रमुख भूमिका में रही तो हिमाचल उसका हस्तक्षेप नगण्य रहा। जो हाल गुजरात में कांग्रेस का रहा कमोबेश हिमाचल में वही हाल भाजपा का हुआ, लेकिन गुजरात में आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस का खेल बिगाड़ा और इस तरह से बिगाड़ा कि ठीक से विपक्ष बनने लायक भी नहीं रही।
क्या आप एक विकल्प?
वहीं 'आम आदमी पार्टी' जो स्वयं को एक विकल्प के तौर पर प्रस्तुत करना चाह रही है, हिमाचल में कुछ नहीं कर पाई। अरविंद केजरीवाल का वह बयान जिसमें वे प्रधामंत्री का आशीर्वाद चाह रहे हैं, उसका राजनीतिक संदेश गुजरात में साफ-साफ नजर आ रहा है।
आम आदमी पार्टी के ऊपर वैचारिक दरिद्रता का आरोप लगता रहा है और यह कहा गया कि इस पार्टी की कोई विचारधारा नहीं है, भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों को लेकर यह भारतीय राजनीति में लंबे समय तक नहीं बनी रह सकती। लेकिन गुजरात में 12.9 यानि लगभग 13% वोट शेयर है 'आप' पार्टी का। आंकड़े जो आ रहे हैं वो दिलचस्प हैं और तस्वीर भी साफ है कि कांग्रेस की वैचारिक जमीन और वोट दोनों पर धीरे- धीरे अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी हावी हो रही है।
आंकड़ों पर नजर
आंकड़ा देखिए- 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के 41.4 फीसद वोट प्रतिशत थे जो 2022 में घटकर 27. 29 प्रतिशत रह गए, सीटों की संख्या 2017 में 77 थी जो 2022 में घटकर 17 रह जाने वाली है यानि 13-14 फीसदी वोट शेयर घटे और सीटें सीधे-सीधे 60 कम हुईं। सवाल है कि ऐसा क्यों हुआ? ये जो वोट घटे वो कहां शिफ्ट हुए? क्या ये वोटर भाजपा में शिफ्ट कर गए?
आंकड़ों पर गौर करें तो भाजपा का वोट प्रतिशत बहुत नहीं बढ़ा है। 2017 के चुनाव में भाजपा को 49.1 फीसद वोट मिले थे जिससे उनके सीटों की संख्या बहुमत पार कर 99 तक पहुंची थी जबकि 2022 में यह वोट प्रतिशत बढ़कर 52.53% हो गई यानि 3-3.5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी है लेकिन इससे उनकी सीटें 99 से बढ़कर 157 तक पहुंच रही हैं यानि वोट प्रतिशत में इतना इजाफा नहीं हुआ जितना सीटों की संख्या में।
वोट प्रतिशत
अब तस्वीर और साफ होगी कि लगभग 35 सीटों पर आम आदमी पार्टी दूसरे नबंर पर है जबकि 12.91 फीसदी वोटों के साथ वह करीब 5 सीटें जीत रही है। ये सारे वोट कांग्रेस के वोट थे। 2017 में क्योंकि उनके वोट प्रतिशत में सीधे-सीधे 14% की कमी आई है और आम आदमी पार्टी के वोट प्रतिशत में 12 प्रतिशत का उछाल है। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के राष्ट्रीय अध्यक्ष असादुद्दीन ओवैसी को कांग्रेस के लिए वोटकटवा माना जा रहा था लेकिन गुजरात के मुसलमानों ने उन पर भरोसा नहीं किया और अभी तक उन्हें 0.29 फीसद वोट मिले हैं।
एक तरफ भाजपा पूरे देश के राजनीतिक दलों के लिए बहुत बड़ी चुनौती बनी हुई है, तो दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी भाजपा और कांग्रेस, दोनों के लिए चुनौती बन रही है। जब सारा देश प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की आंधी में बह चुका था, राजनीति के बड़े-बड़े किले ध्वस्त हो चुके थे और देश में भगवा रंग लहराने लगा था तब केजरीवाल और उनकी पार्टी ने दिल्ली में भाजपा को धूल चटा दी थी।
क्या बदल सकता है राजनीतिक समीकरण?
अब मामला धीरे-धीरे पलट रहा है गुजरात के विधनसभा चुनाव परिणाम और दिल्ली एमसीडी में 'आप' पार्टी की जीत के साथ राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं। अरविंद केजरीवाल किसी तरह से भाजपा को खतरा तो पहुंचा नहीं रहे हैं, वे सीधे-सीधे कांग्रेस की राजनीति में सेंध लगा रहे हैं। तो खतरे की घंटी चौतरफा कांग्रेस के लिए बज चुकी है।
कांग्रेस के पास न मोदी-योगी के मुकाबले कोई प्रभावशाली चेहरा है, न वह अपनी बात जनता को समझा पा रही है। कांग्रेस की एक साॅफ्ट हिंदुत्व की भी छवि रही है जो मोदी के उभार के साथ लगातार कम होती गई और अब तो ऐसा लगता है वह छवि बची भी नहीं। भ्रष्टाचार और नरम हिंदुत्व की छवि के साथ केजरीवाल जनता के बीच जाते हैं।
यह सही है कि आम आदमी पार्टी का राजनीति में प्रवेश किसी वैचारिक आंदोलन से नहीं हुआ बल्कि वह भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन से निकली हुई पार्टी है। भ्रष्टाचार एक मुद्दा है जो तात्कालिक भी हो सकता है और समय के साथ खत्म भी हो सकता है लेकिन राजनीतिक दल दीर्घकालिक विचारों की नींव पर ही टिके होते हैं। आम आदमी पार्टी घोषित रूप से कोई वैचारिक दल नहीं है लेकिन अघोषित रूप से वह लिबरलिज्म को अपनाती जा रही है, जो कि कांग्रेस की वैचारिक जमीन है।
भाजपा जब से सत्ता में आई है तब से वह कांग्रेस पर हमलावर रही है और एक तरह से यह कहें कि वह अपने मकसद में कामयाब भी रही। आम आदमी पार्टी का उभार वैसे तो भाजपा-कांग्रेस दोनों के लिए बड़ी चुनौती है लेकिन ज्यादा खतरा वह कांग्रेस के लिए है। कांग्रेस के लिए एक और बड़ी चुनौती है। अब उसे न सिर्फ भाजपा से लड़ना है बल्कि आम आदमी पार्टी के चतुर युक्तियों से भी ठीक से लड़ना है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।