फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Assam: How effective will the latest effort to stop infiltration be

असमः कितनी कारगर होगी घुसपैठ रोकने की ताजा कवायद?

Prabhakar Mani Tewari प्रभाकर मणि तिवारी
Updated Fri, 29 Aug 2025 02:37 PM IST
सार

इस आंदोलन के दौरान ही वर्ष 1983 में हुए नेल्ली नरसंहार ने पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थीं। उस दौरान अल्पसंख्यकों के कई गांव साफ हो गए थे और एक ही रात में दो हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे।

विज्ञापन
Assam: How effective will the latest effort to stop infiltration be
हिमंत बिस्वा सरमा, सीएम, असम। - फोटो : ANI

विस्तार

असम में घुसपैठ की समस्या देश की आजादी जितनी ही पुरानी है।   तमाम आंदोलनों और सरकारी कवायद के बावजूद अब तक इस पर पूरी तरह अंकुश नहीं लगाया जा सका है। अब राज्य की हिमंता बिस्वा सरमा सरकार ने इसी कवायद के तहत एक अक्तूबर से 18 साल पूरे करने वाले युवाओं को आधार कार्ड जारी नहीं करने का फैसला किया है।   लेकिन इस फैसले पर सवाल उठ रहे हैं।  

विज्ञापन


सीमा पार बांग्लादेश से बड़े पैमाने पर होने वाली घुसपैठ के विरोध में ही अस्सी के दशक में अखिल असम छात्र संघ (आसू) के नेतृत्व में करीब छह साल असम आंदोलन चला था। उसके बाद पूरा राज्य छह साल तक हिंसा की आग में जलता रहा। इस दौरान नौ सौ से ज्यादा युवकों ने अपनी जान गंवाई थी और संपत्ति का जो नुकसान हुआ वह तो अनुमान से परे है। 
विज्ञापन


इस आंदोलन के दौरान ही वर्ष 1983 में हुए नेल्ली नरसंहार ने पूरी दुनिया में सुर्खियां बटोरी थीं। उस दौरान अल्पसंख्यकों के कई गांव साफ हो गए थे और एक ही रात में दो हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे।  
विज्ञापन
विज्ञापन


वर्ष 1985 में असम समझौते के बाद यह आंदोलन तो खत्म हो गया।   लेकिन यह विवाद अक्सर भड़कता रहा है।   नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजंस (एनआरसी) की कवायद के दौरान यह विवाद चरम पर पहुंचा था। यही वजह है कि उस दौरान एनआरसी के विरोध में राज्य में बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी। बाद में एनआरसी की ड्राफ्ट रिपोर्ट को नामालूम वजहों से ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था।  

असम समझौते में कहा गया था कि सीमा पार से अवैध तरीके से राज्य में आने वाले 'विदेशी' नागरिकों को सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) की ओर से उनके देश नहीं भेजे जाने तक उनको डिटेंशन सेंटर में रखा जाएगा, लेकिन उसके बाद भी बरसों तक इस प्रावधान पर अमल नहीं किया गया था।  

राज्य में बांग्लादेश से घुसपैठ के खिलाफ आसू की अगुवाई में अस्सी के दशक में हुए आंदोलन की कोख से असम गण परिषद (अगप) का जन्म हुआ था। उस आंदोलन के बाद हुए चुनावों में अगप को भारी बहुमत मिला था और प्रफुल्ल कुमार महंत राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने थे। उसके बाद से ही रह-रह कर यह मुद्दा उठता रहा है। दरअसल, इस समस्या की जड़ें दूर तक तक फैली हैं।

असम के प्रमुख इतिहासकार अमलेंदु दत्त कहते हैं कि वर्ष 1911 में ब्रिटिश जनगणना आयुक्तों ने अपनी रिपोर्ट में तत्कालीन पूर्वी बंगाल से राज्य में बड़े पैमाने पर लोगों के आने का जिक्र किया था। उसके एक साल बाद सिलहट डिवीजन को बंगाल से काट कर असम का हिस्सा बना दिया गया। उसके बाद मुस्लिम आबादी तेजी से बढ़ने लगी।   उसी समय से हिंदू और मुस्लिम तबके के बीच झड़पों की शुरूआत हो गई।  

वर्ष 1937 में कांग्रेस नेता जवाहरलाल नेहरू ने असम के विकास व समृद्धि के लिए पूर्वी बंगाल से लोगों के आने को सही ठहराया था।   लेकिन देश के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने यह कहते हुए इस दलील का विरोध किया कि ब्रह्मपुत्र घाटी में बिहार के हिंदुओं को बसाना मैमनसिंह के मुस्लिमों को बसाने से बेहतर है।

उसके दशकों बाद बांग्लादेश से आने वालों के लिए कटऑफ की तारीख 24 मार्च, 1971 तय की गई। उसके कुछ दिनों पहले ही वहां मुक्ति युद्ध शुरू हुआ था। आजादी के बाद कांग्रेस ने बड़े पैमाने पर घुसपैठियों को खदेड़ा था।   बाद में गोपीनाथ बोरदोलोई सरकार ने इस नीति पर धीरे चलने का फैसला किया।  

असम की 263 लंबी सीमा बांग्लादेश से सटी है। इसमें से 119. 1 किमी इलाका नदियों से जुड़ा है। भौगोलिक परिस्थितियों की वजह से कुछ इलाकों में सीमा पर कंटीले तारों की बाड़ भी नहीं लगाई जा सकी है। ऐसे में घुसपैठ बेहद आसान है। खासकर बराक घाटी के करीमगंज इलाके में कुशियारा नदी ही बांग्लादेश के सिलहट इलाके को भारत से अलग करती है।

उस पतली-सी नदी में आम लोग नावों के सहारे आसानी से उधर से इधर आ सकते हैं। सीमावर्ती इलाकों में शादी-ब्याह, सार्वजनिक उत्सवों और रिश्तेदारियों में सीमा रेखा गायब हो जाती है। यह कानूनी नहीं बल्कि सदियों से जारी परंपरा है।

देश के विभाजन के बावजूद यह सिलसिला जस का तस जारी रहा।   स्थिति यह है कि करीमगंज इलाके में जाने पर यह पता ही नहीं चलता कि आप भारत में हैं या बांग्लादेश में।

पोशाक, बोली, संस्कृत औऱ रीति-रिवाजों में काफी समानता है।   ऐसे में उधर से सीमा पार कर यहां पहुंचने के बाद घुसपैठियों की पहचान करना असंभव है।   वह लोग स्थानीय आबादी के साथ एकदम घुलमिल जाते हैं।  

हिमंता बिस्वा सरमा ने सत्ता संभालने के बाद सीमा पार से आकर राज्य में बसने वाले अल्पसंख्यकों के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान शुरू किया था। इसके तहत बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं। बाल विवाह के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया गया और मियां मुसलमानों के खिलाफ कार्रवाई तेज की गई।

असम में बंगाली मूल के मुस्लिमों के लिए मिया (मियां) शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। इसे ज्यादा अच्छा शब्द नहीं मानते और कुछ लोग इसे अपमान के रूप में भी देखते है। तत्कालीन ब्रिटिश शासकों ने इस तबके के लोगों को 1890 के दशक के उत्तरार्ध में असम में ब्रह्मपुत्र नदी के दोनों किनारों पर खेती और दूसरे कामों के लिए बसाया था।  

राज्य में इस तबके के लोगों को सम्मान की निगाह से नहीं देखा जाता।   हिमंता कई बार कह चुके हैं कि उनको मिया मुसलमानों के वोट नहीं चाहिए।   उनका कहना था कि भाजपा को असम में बंगाली मूल के मुस्लिम समुदाय के वोटों की जरूरत नहीं है। मुझे मिया मुस्लिमों का वोट नहीं चाहिए।

राज्य के बहुत से लोगों का मानना है कि प्रवासी मुस्लिमों की वजह से असम ने अपनी पहचान, संस्कृति और भूमि खो दी है। सरकार ने सत्ता में आने के बाद कई विवादास्पद कानून तो बनाए ही, बड़े पैमाने पर अवैध अतिक्रमण हटाने का अभियान भी चलाया। यह अभियान कई मौकों पर काफी हिंसक साबित हुआ, लेकिन सरकार अपने रुख पर अडिग रही।  

अब घुसपैठ रोकने की ताजा कवायद के तहत सरकार ने 18 साल से ज्यादा उम्र वाले युवाओं को आधार कार्ड जारी करने पर एक साल के लिए रोक लगाने का फैसला किया है। सरकार की दलील है कि राज्य में आबादी से ज्यादा आधार कार्ड बन गए हैं।   लेकिन आदिवासियों और चाय बागान मजदूरों के मामले में यह आंकड़ा 96 फीसदी ही है।

इसी वजह से इस समुदाय के लोगों को एक साल की छूट दी गई है।   यानी यह लोग अगले साल सितंबर के आखिर तक अपना आधार कार्ड बनवा सकते हैं।   सरकार की ओर से जारी अधिसूचना में उन लोगों से 30 सितंबर तक आधार कार्ड बनवाने को कहा गया है जो भारतीय नागरिक हैं।  

लेकिन सरकार के इस फैसले पर सवाल भी उठ रहे हैं। आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट ने इस तुगलकी फैसला करार दिया है।   पार्टी के विधायक रफीकुल इस्लाम का कहना था कि सरकार राज्य के लोगों को मतदान से वंचित करना चाहती है। इसी वजह से अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले आधार कार्ड पर रोक लगा दी गई है।  

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि हिमंता बिस्वा सरकार ने सत्ता संभालने के बाद से ही राज्य में बांग्लाभाषी अल्पसंख्यकों के खिलाफ बड़े पैमाने पर अभियान चला रखा है। लेकिन सरकारी अभियान में कई बार गेहूं के साथ घुन के भी पिसने का खतरा है। विदेशी चिन्हिंत होने वाले सैकड़ों लोगों की नागरिकता बाद में साबित होने के कई मामले सामने आ चुके हैं।  

राजनीतिक विश्लेषक शिखा मुखर्जी कहती हैं कि सरकार घुसपैठ रोकने के प्रति गंभीर तो नजर आती है, लेकिन इसके तरीके पर सवाल भी उठते रहे हैं। ताजा फैसले पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर आबादी से ज्यादा लोगों को आधार कार्ड कैसे मिल गया?

जाहिर है इसके लिए सरकारी अधिकारी ही दोषी हैं।   ऐसे में इस फैसले को सोच-समझ कर लागू किया जाना चाहिए ताकि कोई भारतीय नागरिक अपने मताधिकार से वंचित नहीं हो।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed