विधायक और सत्ता का नशा: आखिर जनप्रतिनिधियों को यह व्यवहार क्या शोभा देता है?
सत्ता का नशा शायद सिर चढ़कर बोलता है। सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले असम के एक वीडियो ने एक बार फिर यह बात साबित कर दी है। यह मामला धुबड़ी जिले के पूर्व बिलासीपाड़ा के आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के विधायक शमसुल हुदा से संबंधित है।
सत्ता का नशा शायद सिर चढ़कर बोलता है। सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले असम के एक वीडियो ने एक बार फिर यह बात साबित कर दी है। यह मामला धुबड़ी जिले के पूर्व बिलासीपाड़ा के आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के विधायक शमसुल हुदा से संबंधित है।
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कहा जाता है कि कुर्सी यानी सत्ता का नशा सिर चढ़कर बोलता है। देश के विभिन्न राज्यों में कई सांसद और विधायक अपनी करनी से समय-समय पर इस बात का चरितार्थ करते रहे हैं। ऐसी घटनाएं अक्सर हिंदी पट्टी के राज्यों के अलावा पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों से भी सामने आती रही हैं। ताजा मामले में असम के एक विधायक ने एक मामूली बात पर एक व्यक्ति को सरेआम पीट दिया। धुबड़ी जिले के विधायक शमसुल हुदा का पारा इस बात से चढ़ गया था कि शिलान्यास समारोह में उनको जो फीता काटना था उसका रंग लाल की बजाय गुलाबी क्यों था।
असम में यह कोई पहली घटना नहीं है। इस साल फरवरी में इत्र कारोबारी और पूर्व सांसद बदरुद्दीन अजमल ने तो निर्दलीय विधायक अखिल गोगोई की पत्नी के खिलाफ ही अभद्र टिप्पणी कर दी थी। हालांकि, बाद में उन्होंने इसके लिए माफी मांग ली। बीते साल लोकसभा चुनाव के दौरान बराक घाटी के करीमगंज में स्थानीय वोटरों ने विधायक विजय मालाकार पर धमकाने का आरोप लगाया था। तब विधायक महोदय ने कहा था कि या तो बीजेपी को वोट दें या फिर बुलडोजर के लिए तैयार रहें। मैं जानता हूं कि आपका घर कहां है। उस समय इस पर काफी विवाद हुआ था। कांग्रेस ने पुलिस और चुनाव आयोग से इसकी शिकायत भी की थी, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई।
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इसी तरह करीब तीन साल पहले कछार जिले में बीजेपी विधायक कौशिक राय पर ड्यूटी पर तैनात सरकारी अधिकारियों के साथ दुर्व्यवहार का आरोप लगा था। तब इसकी शिकायत मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा तक से की गई थी। उस शिकायती पत्र पर 16 सरकारी अधिकारियों के हस्ताक्षर थे, लेकिन राय भी साफ बच निकले।
पश्चिम बंगाल भी ऐसे मामलों से अछूता नहीं है। बीते साल अक्तूबर में सीपीएम ने एक महिला पत्रकार के यौन उत्पीड़न के आरोपी अपने पूर्व विधायक तन्मय भट्टाचार्य को पार्टी से निलंबित कर दिया था। उससे पहले तृणमूल कांग्रेस ने एक महिला अधिकारी के साथ दुर्व्यवहार के आरोप में जेल मंत्री अखिल गिरि को माफी मांगने और मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने का निर्देश दिया था।
लेकिन आखिर जनप्रतिनिधियों को इतना गुस्सा क्यों आता है? राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इसकी जड़ें खुद को सबसे ताकतवर समझने वाली मानसिकता में छिपी हैं। निर्वाचित प्रतिनिधि खुद को तमाम कायदे कानूनों और सरकारी अधिकारियों से ऊपर मानते हैं। भले ही वो किसी अदनी सी नगरपालिका का पार्षद ही क्यों न हों।
कोलकाता में राजनीतिक विश्लेषक दीपंकर कर कहते हैं कि तमाम लोग ऐसे नहीं होते, लेकिन ऐसे कुछ लोग हर पार्टी में होते हैं। दरअसल, किसी को धमकी देकर या दो-चार थप्पड़ लगा कर वो साफ बच निकलते हैं। उनके खिलाफ पुलिस कार्रवाई से हिचकती है। कई मामलों में तो पिटने और अपमानित होने वाले लोग भी उनके खिलाफ शिकायत की हिम्मत नहीं जुटा पाते। उन लोगों को पता होता है कि पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं किया जा सकता।
विश्लेषकों का कहना है कि बंगाल और पूर्वोत्तर राज्यों में फिर भी गनीमत है। दूसरे राज्यों में तो कुछ जनप्रतिनिधियों पर अपराधियों को संरक्षण देने से लेकर बलात्कार और हत्या तक के आरोप लगते रहे हैं, लेकिन बहुत कम मामलों में ही उनके खिलाफ कोई कार्रवाई हो पाती है।
करीब चार दशक तक बंगाल में पत्रकारिता कर चुके तापस मुखर्जी ने तमाम राजनीतिक दलों और उनकी सरकार को कवर किया है। मुखर्जी कहते हैं कि खासकर कम उम्र में या पहली बार विधायक या सांसद बनने वाले लोगों में ऐसी प्रवृत्ति आम है।
ऐसे लोग कुर्सी की ताकत नहीं पचा पाते। उनका कहना है कि ऐसे ज्यादातर लोगों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होने के कारण उनका मनोबल बढ़ता रहता है। कानून तो सबके लिए समान है। जब तक ऐसी घटनाओं से निपटने के लिए ठोस तंत्र विकसित नहीं होता, असम जैसी घटनाएं दोहराई जाती रहेंगी।