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अजान पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला महत्वपूर्ण क्यों है?

Fri, 29 May 2020 12:56 PM IST
Riyaz Khan रियाज खान
Updated Fri, 29 May 2020 12:56 PM IST
सार

  • इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में अजान को धार्मिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ मामला माना।
  • अजान से कोविड-19 की गाइडलाइन का कोई उल्लंघन नहीं होता है।
  • पैगंबर मोहम्मद साहब ने कई जगहों पर लोगों को चिल्लाने और शोर मचाने से मना किया है।

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allahabad high court decision on azaan on loudspeaker only human voice allowed importance significance of azaan in muslim community
अजान पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला - फोटो : social media

विस्तार

हाल ही में उत्तर प्रदेश के गाजीपुर समेत तीन जिलों की मस्जिदों में अजान पर लगी रोक के मामले में दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने मस्जिदों से मौखिक अजान की अनुमति दी, लेकिन लाउडस्पीकर से अजान की इजाजत नहीं दी हैI

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इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में अजान को धार्मिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ मामला माना, लेकिन लाउडस्पीकर से अजान को इस्लाम का हिस्सा नहीं बताया, साथ ही यह भी कहा की अजान से कोविड-19 की गाइडलाइन का कोई उल्लंघन नहीं होता हैI

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इलाहाबाद उच्च न्यायालय में ही वकालत करने वाले मेरे एक अधिवक्ता मित्र ने भी यह न्यूज मुझसे साझा की और इसको लेकर मेरे विचार जानने चाहे। मैंने उनसे यही कहा कि बहैसियत एक नागरिक और मुसलमान, मैं माननीय हाईकोर्ट के इस फैसले का स्वागत करता हूं और इससे सहमत हूं।

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उन्होंने अजान के बारे में विस्तार से जानने की इच्छा जताई तो मैंने उन्हें बताया कि इस्लाम में अजान एक बहुत ही महत्वपूर्ण अमल (प्रथा) हैI अजान स्वयं एक इबादत है, इसमें खैर और बरकत है और जिस इलाके में भी अजान दी जाती है, वहां अल्लाह की विशेष कृपा होती हैI   

साथ ही अजान का दूसरा उद्देश्य, खुदा के बंदों को आमतौर पर दिन में पांच बार निश्चित समय पर नमाज की पूर्व-सूचना देना, समय पर नमाज अदा करने की दावत और स्मरण कराना हैI साधारण तौर पर लोग अपनी दिनचर्या में व्यस्त होते हैं, अजान की आवाज सुनकर वे सावधान हो जाते हैं कि अमुक नमाज का समय हो गया है, इसलिए अजान एक प्रकार से मानव-अलार्म का भी कार्य अंजाम देती हैI 

अजान के इन दो मूल कारणों पर विचार करें तो शायद ही कोई ऐसा हो, जिसे अजान पर आपत्ति हो। अक्सर विमर्श इस बात पर होता है कि अजान कहने के लिए लाउडस्पीकर, माइक्रोफोन या किसी भी प्रकार की ‘साउंड-एम्पलीफाइंग डिवाइस’ का प्रयोग होना चाहिए या नहीं? तो इस बाबत हमको पहले कुछ बातें समझनी होंगीI

तेज और ऊंची आवाज में बात करने की तुलना ‘गधे की आवाज’ से की गई है...

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कुरान मजीद में ध्वनि प्रदूषण की खुले तौर पर निंदा की गई है। - फोटो : Social Media (सांकेतिक)

पहली, इस्लाम के साथ ही साथ अजान और नमाज का सिलसिला निरंतर चलता चला आ रहा है और इसका इतिहास बहुत पुराना हैI माइक्रोफोन की उत्पत्ति तो उन्नीसवीं शताब्दी में ही हुई हैI लाउडस्पीकर और माइक्रोफोन का जब नाम व निशान भी नहीं था, तब भी अजान हमेशा से इन उपकरणों के बगैर ही कही जाती रही हैI

दूसरी, इस्लाम किसी भी प्रकार के प्रदूषण की इजाजत बिलकुल नहीं देताI कुरान मजीद में ध्वनि प्रदूषण की खुले तौर पर निंदा की गई हैI हजरत लुकमान की हिकायत है कि जब वह अपने पुत्र को अच्छे कामों की हिदायत देते हुए कुछ बातों की नसीहत करते हैं, तब वह इस बात पर विशेष बल देते हैं कि लोगों के साथ अच्छा व्यवहार करो और उनसे पस्त (धीमी) आवाज में बातचीत करो I

तेज और ऊंची आवाज में बात करने की तुलना ‘गधे की आवाज’ से की गई है I संभवत: इस आलोचना का मुख्य कारण उसकी आवाज का ‘हाई डेसीबल लेवल’ है, क्योंकि जब वह चिल्लाता है तो हमारे कानों और यहां तक कि दूसरे जानवरों को भी इससे तकलीफ होती है I 

तीसरी, पैगंबर मोहम्मद साहब ने कई जगहों पर लोगों को चिल्लाने से मना किया है और धीमी आवाज में बात करने की हिदायत दी हैI यह भी कहा गया है कि जब पैगंबर के पास जाओ तो धीमी आवाज में बात करो।

आधुनिक समाजशास्त्र के पिता कहे जाने वाले प्रसिद्ध मुस्लिम वेत्ता तथा इतिहासकार इब्ने ख़ल्दून ने भी चौदहवीं शताब्दी में अपनी प्रमुख किताब ‘मुकदमा’ (विश्व इतिहास की प्रस्तावना ) में सभ्यताओं के विकास का तर्कपूर्ण विवरण देते हुए शांतिमय वातावरण के महत्व का विशेष उल्लेख किया हैI

उपर्युक्त तीनों दलीलों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि इस्लाम में अधिक शोर-शराबे को पसंद नहीं किया गया हैI 

आगे बढ़ते हुए, मैंने अपने अधिवक्ता मित्र को इसी संदर्भ में हाल ही में, मुस्लिम बुद्धिजीवी व प्रोफेसर डॉ. सैय्यद अलीम अशरफ ( डीन व विभागाध्यक्ष - अरबी, मौलाना आजाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद ) से हुई मेरी बातचीत का भी हवाला दिया I प्रोफेसर अलीम अशरफ के अनुसार इस मसले का बहुत ही आसान हल है। हमारे यहां आबादी के लिहाज से दो सूरतें हैं। 

हमारे मुस्लिम समाज को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए....

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इलाहाबाद उच्च न्यायालय का अजान पर 15 मई का फैसला - फोटो : Pixabay

पहली, ऐसे इलाके जहां मुस्लिम आबादी अधिक है, वहां अजान कैसे दी जाए? इस पर वह कहते हैं कि लोग अपने-अपने कामों में व्यस्त होते हैं, इसलिए उनको नमाज समय से अदा करने की याद दिलाने के लिए, अगर वहां के लोग चाहें तो लाउडस्पीकर से अजान दी जा सकती है (यह ध्यान रखते हुए कि इस संदर्भ में कोर्ट के किसी संबंधित आदेश की अव्हेलना न हो रही हो)। 

लेकिन यहां पर भी प्रोफेसर अलीम अशरफ की राय यह है कि यदि उस मुस्लिम बाहुल्य इलाके में कई मस्जिदें हैं और किसी एक मस्जिद की अजान की आवाज माइक से पूरी आबादी के लोगों तक पहुंच सकती है तो वहां की अन्य मस्जिदों से बिना माइक के ही अजान कहना ज्यागा बेहतर हैI

उनके अनुसार, विभिन्न मस्जिदों से एक साथ अजान की आवाज माइक पर कई ओर से आने के कारण, उसके कलेमात (शब्द) आपस में खल्त -मल्त हो जाते हैं। इससे अजान का जवाब देने की सुन्नत (पैगंंबर मुहम्मद साहब का तरीका) का अदा करना भी लोगों के लिए मुश्किल हो जाता है।

इसी प्रकार, रात की ‘ईशा’ और सुबह की ‘फजर’ की नमाज की अजान के समय भी इन आबादियों में माइक / लाउडस्पीकर का ‘डेसीबल लेवल’ कम करके अजान कही जानी चाहिए, ताकि उस आबादी में रहने वाले हमारे गैर-मुस्लिम भाई, बीमार, बुज़ुर्ग, या बच्चे जिन पर नमाज़ फर्ज नहीं है, उनको तकलीफ न हो और वे बिना किसी बाधा के अपनी नींद पूरी कर सकें।

दूसरी सूरत, ऐसे स्थान जहां पर मिली-जुली आबादी है अथवा जहां मस्जिद के बिलकुल पास अस्पताल या विद्यालय आदि हों, वहां पर अजान के लिए माइक का इस्तेमाल बिलकुल न किया जाए तो बेहतर है। प्रोफेसर अलीम अशरफ बताते हैं कि इस्लाम में पड़ोसियों की बड़ी अहमियत बताई गई है। उनके साथ अच्छे व्यवहार और हमदर्दी का हुक्म दिया गया हैI पड़ोसियों को अपने किसी भी कृत्य से परेशान करने पर कड़ाई से माना किया गया हैI

पैगंबर मोहम्मद साहब का कथन है, ‘ जो व्यक्ति अल्लाह पर यकीन रखता है, उसे अपने पड़ोसी को तकलीफ नहीं पहुंचानी चाहिएI’  इसलिए ऐसे इलाके जहां मिली-जुली आबादी हो, वहां अपने गैर मुस्लिम भाइयों तथा अन्य (अजान से) असंबंधित लोगों का लिहाज करते हुए माइक से अजान न देने का फैसला करते हुए हमें एक मिसाल कायम करनी चाहिए। इससे पारस्परिक स्नेह व प्रेम बढ़ेगा। हमारे मुस्लिम समाज को इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।

इसलिए माननीय इलाहाबाद उच्च न्यायालय का अजान पर 15 मई का फैसला, हमें अपने मजहब की एक और अच्छी तस्वीर पेश करने का अवसर भी प्रदान करता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 


 

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