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Crime Literature Festival: 'क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल' के मायने और कुछ जरूरी सवाल; विस्तार से समझिए
सार
अपराध, विज्ञान और बाल साहित्य को हमेशा से ही साहित्य की मुख्य धारा से कुछ अलग माना जाता रहा है। बाल साहित्य पर तो कभी कभार कुछ आयोजन या चर्चा हो भी जाती है, लेकिन अपराध और विज्ञान जैसे विषय हमेशा हाशिये पर ही रहते हैं।
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Literature
- फोटो : Istock
विस्तार
देश भर के तमाम शहरों में पुस्तक मेलों और साहित्य उत्सवों का जो सिलसिला पिछले एक दशक में तेजी से आगे बढ़ा है, उससे आम लोगों में साहित्य को लेकर रुचि बढ़ी है। इन आयोजनों में साहित्य के तमाम पहलुओं पर चर्चा होती है, लेकिन एक जो बेहद अहम पहलू छूट जाता है, वह है अपराध साहित्य।
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दरअसल, अपराध, विज्ञान और बाल साहित्य को हमेशा से ही साहित्य की मुख्य धारा से कुछ अलग माना जाता रहा है। बाल साहित्य पर तो कभी कभार कुछ आयोजन या चर्चा हो भी जाती है, लेकिन अपराध और विज्ञान जैसे विषय हमेशा हाशिये पर ही रहते हैं। अगर गहराई से देखें तो ये दोनों ही बेहद अहम हैं और हमारी रोजमर्रा की जिंदगी को गहराई से प्रभावित करते हैं। खासकर अपराध की बात करें तो हमारा पूरा पुलिस तंत्र ही इसी पर टिका है और इसके रोजनामचों में हर तरह और हर दर्जे के अपराध का एक पूरा मनोविज्ञान झलकता है।
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अपराध पर साहित्य बेशक कम लिखा जाता हो, लेकिन अपराध की खबरें मीडिया में भरी रहती हैं, इसके पाठक और दर्शक बहुत ज्यादा हैं। फिल्मों की बात करें तो क्राइम थ्रिलर सबसे ज्यादा देखे जाते हैं। और अब तो ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर अपराध से जुड़ी तमाम कहानियां आप अलग अलग अंदाज में देख सकते हैं। फिल्मों की ही बात करें तो शुरुआती दौर से ही फिल्मों में खलनायक के किरदार के बगैर कहानी पूरी नहीं होती। यानी अपराध वो प्रवृत्ति है जो हमेशा से रही है और शायद हमेशा रहेगी भी। अगर अपराध न हों तो पुलिस और कानून या अदालतों की जरूरत न हो।
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तो आखिर अपराध साहित्य की चर्चा क्यों नहीं होती? क्यों अपराध साहित्य लिखने से तथाकथित मुख्य धारा के लेखक परहेज़ करते हैं? क्यों साहित्य सिर्फ कहानी, कविता, उपन्यास, आलोचना जैसी विधाओं के इर्द गिर्द बुना जाता है? अगर कोई फिल्मकार अपराध कथाओं पर फिल्म बनाता है तो उसके लेखक को साहित्यकार का दर्जा क्यों नहीं मिल पाता, क्यों वह सिर्फ पटकथा लेखक के दायरे से बाहर नहीं आ पाता?
ऐसे बहुत सारे सवाल हैं जिसे लेकर हमारे कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी गंभीरता से सोचते हैं। अपराध के विभिन्न पहलुओं, इसके मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और आर्थिक कारणों को नजदीक से समझने वाले इन संवेदनशील पुलिस अफसरों की यह कोशिश रहती है कि इसे वह अपने अनुभवों के आधार पर सामने लाएं। कई पुलिस अफसरों के भीतर एक साहित्यकार और लेखक रहा है और उन्होंने इसे अपने अपने तरीके से सामने लाने की कोशिश भी की है। इन्हीं में से एक हैं उत्तराखंड के पूर्व पुलिस महानिदेशक आलोक लाल।
उन्होंने अंग्रेजी में द बाराबंकी नारकोज और मर्डर इन द वाइलेंस जैसी महत्वपूर्ण किताबें लिखीं और नशे के व्यापार, कारोबार और अपराधियों के पूरे तंत्र का खुलासा किया, साथ ही हत्याओ के पीछे के कई सच सामने लाने की कोशिश की। अपनी पेंटिंग के जरिये भी आलोक अपनी अभिव्यक्ति को रंगों में उतारते हैं।
वहीं, अगर उत्तराखंड के मौजूदा पुलिस महानिदेशक अशोक कुमार की बात करें तो उनकी लिखी तीनों किताबें- ह्यूमन इन खाकी, क्रैकिंग सिविल द सिविल सर्वेसेज एग्जामिनेशन और चैलेंजेस टू इंचरनल सिक्यूरिटी ऑफ इंडियन, अपने आप में ऐतिहासिक दस्तावेज की तरह हैं।
उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विभूति नारायण राय को ही लें तो उन्होंने अपने उपन्यासों और अहम लेखों के जरिये हिन्दी साहित्य को बहुत कुछ दिया है। अपने पुलिसिया अनुभव और सांप्रदायिक दंगों के दौरान पुलिस की भूमिका पर उन्होंने काफी काम किया है। खासकर 1987 के मेरठ दंगों के दौरान हाशिपुरा कांड की सच्चाइयों को तलाशती हुई उनकी पुस्तक ‘हाशिमपुरा 22 मई’ तो खासी चर्चित हुई। ‘सांप्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस’ नाम की उनकी किताब हो या फिर ‘शहर में कर्फ्यू’ यह सब एक संवेदनशील पुलिस अफसर के महसूस किए गए उनके अनुभवों की उपज हैं।
बेशक विभूति जी की किस्सागोई और भाषा आपको एक दूसरी दुनिया में ले जाती है जिसके पात्र आपके ईर्द गिर्द होते हैं। प्रेम की भूतकथा पढ़ लीजिए या फिर उनका हाल ही में आया उपन्यास रामगढ़ में हत्या, यहां आपको एक पुलिसिया तफ्तीश का एक खास साहित्यिक अंदाज मिलेगा।
अच्छी बात यह है कि हमारे पुलिस तंत्र के भीतर इतने बेहतरीन साहित्यकार, लेखक और कलाकार पूरी संवेदनशीलता के साथ मौजूद हैं, इसके बावजूद पुलिस का वह चेहरा ही आम लोगों के दिमाग में क्यों बैठा है जो उसे क्रूर, अमानवीय, भ्रष्ट और अपराधियों-राजनेताओं के साथ सांठगांठ वाला है? इस सवाल को तलाशना जरूरी है।
अपराध कथाओं, क्राइम थ्रिलर, पुलिस की भूमिका और अपराध के मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर सार्थक चर्चा करने की एक बेहतरीन और जरूरी कोशिश की है उत्तराखंड के पूर्व डीजीपी आलोक लाल और मौजूदा डीजीपी अशोक कुमार ने। देहरादून में 3 से 5 नवंबर को पहली बार क्राइम लिटरेचर फेस्टिवल हो रहा है जिसमें देश भर से उन नामचीन लोगों को एक मंच पर लाने की कोशिश की गई है जिनसे इन सवालों के जवाब सामने आएं। इस फेस्टिवल के मुख्य आयोजक आलोक लाल बताते हैं कि क्राइम लिटरेचर या अपराध साहित्य पर केंद्रित यह देश का पहला ऐसा साहित्य समारोह है जिसमें सिर्फ अपराध से जुड़े साहित्य, अपराध पर केन्द्रित फिल्मों और पुलिस की तफ्तीशों के अलावा पुलिस की जिम्मेदारियों और भूमिका पर भी बात होगी।
कहानी, जानेजान, बदला, अहल्या और टाइपराइटर जैसी फिल्में और थ्रिलर सीरीज़ लिखने और बनाने वाले सुजॉय घोष हों, शूटआउट एट लोखंडवाला, कांटे और आतिश बनाने वाले संजय गुप्ता हों, अविनाश तिवारी, राजश्री देशपांडे, अनिर्बान भट्टाचार्य, एस हुसैन जैदी और किरन मनराल जैसे फिल्मकार और कलाकार हों या फिर नीरज कुमार, नवनीत सिकेरा, अमित लोढ़ा जैसे वो तमाम बेहद मशहूर आईपीएस और लेखक इस आयोजन में शिरकत कर रहे हैं। बेशक इनके काम को तथाकथित मुख्य धारा के साहित्य में न शामिल किया जाए, लेकिन इन्होंने जो कुछ भी लिखा वह कहीं न कहीं उनके अनुभवों की दास्तान तो है ही। जाहिर है क्राइम लिटरेचर के तौर पर इन पुस्तकों और इनके लेखकों की भूमिका को आम लोगों को समझना, जानना भी जरूरी है।
आलोक लाल बताते हैं कि इस आयोजन की परिकल्पना उनके दिमाग में काफी समय से रही और उसे ज़मीन पर उतारने में उनके तमाम सहयोगियों ने बड़ी भूमिका निभाई है। इसका मकसद है कि लोग यह समझ सकें कि किस तरह कोई अन्वेषण या तहकीकात किसी मुकाम तक पहुंचती है, सारे तथ्य कितनी मेहनत के बाद सामने आते हैं, अपराध हमारे लिए कितनी बड़ी चुनौती है और दूसरी तरफ समाज हमें किस तरह मदद कर सकती है जिससे हम अपना काम अच्छी तरह कर सकें।
जाहिर है साहित्य के इस अनोखे उत्सव में जब अपराध के तमाम पहलू सामने आएंगे, पुलिस की भूमिका से लेकर उसपर रहने वाले राजनीतिक दबावों का खुलासा होगा और बेशक इस आयोजन से कई ऐसे सवालों और रहस्यों के परदे भी खुल सकते हैं जो आने वाले वक्त में अपराध साहित्य लिखने वालों के लिए मददगार साबित हो सकेगा।