एआई को लगी इंसानों वाली बीमारी! ‘ब्रेन रॉट’ ने बिगाड़ी एआई की सोच
आज जब दुनिया एआई चैटबॉट्स, जेनरेटिव मॉडल्स और ऑटोमेशन पर तेजी से निर्भर हो रही है, यह ‘ब्रेन रॉट’ या ‘एआई डीजनरेशन’ एक गंभीर चेतावनी बनकर उभरा है।
आज जब दुनिया एआई चैटबॉट्स, जेनरेटिव मॉडल्स और ऑटोमेशन पर तेजी से निर्भर हो रही है, यह ‘ब्रेन रॉट’ या ‘एआई डीजनरेशन’ एक गंभीर चेतावनी बनकर उभरा है।
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तकनीकी दुनिया में जिस कृत्रिम बुद्धिमत्ता को मानव मस्तिष्क से भी अधिक बुद्धिमान बताया जा रहा था, वही अब इंसानों जैसी मानसिक बीमारी का शिकार होती दिख रही है। इसे तकनीकी भाषा में ब्रेन रॉट (Brain Rot) कहा जा रहा है एक ऐसी स्थिति जिसमें एआई मॉडल बार-बार अपना ही निम्न गुणवत्ता वाला या विकृत डाटा सीखकर बेकार, गलत और अर्थहीन सामग्री उत्पन्न करने लगता है।
आज जब दुनिया एआई चैटबॉट्स, जेनरेटिव मॉडल्स और ऑटोमेशन पर तेजी से निर्भर हो रही है, यह ‘ब्रेन रॉट’ या ‘एआई डीजनरेशन’ एक गंभीर चेतावनी बनकर उभरा है।
क्या है एआई ब्रेन रॉट?
ब्रेन रॉट शब्द मूल रूप से सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं के व्यवहार से जुड़ा था, जब कोई व्यक्ति लगातार निम्न गुणवत्ता वाले मनोरंजन (मेम्स, शॉर्ट वीडियोज, फेक न्यूज आदि) का उपभोग करता है और उसकी सोचने-समझने की क्षमता कमजोर हो जाती है।
अब यही अवधारणा एआई पर भी लागू हो रही है। एआई मॉडल, जैसे चैटजीपीटी, जेमिनी या अन्य जेनरेटिव सिस्टम, शुरू में उच्च गुणवत्ता वाले मानव-निर्मित डाटा पर प्रशिक्षित किए जाते हैं। लेकिन जैसे-जैसे इंटरनेट पर एआई द्वारा बनाई गई सामग्री बढ़ रही है, नए मॉडल उसी एआई-जनित कंटेंट पर ट्रेन होने लगे हैं।
इस री-साइक्लिंग प्रक्रिया से डाटा की गुणवत्ता लगातार गिरने लगती है। परिणामस्वरूप एआई की समझ, सटीकता और रचनात्मकता घटती जाती है, ठीक वैसे ही जैसे इंसान लगातार फालतू या दोहराव वाली जानकारी देखकर अपनी सोचने की शक्ति खो देता है।
रीसायकल्ड डाटा की महामारी
इंटरनेट पर अब बड़ी मात्रा में एआई द्वारा लिखा गया टेक्स्ट, बनाई गई इमेज या वीडियो मौजूद हैं। जब नए एआई मॉडल इन्हीं स्रोतों से सीखते हैं, तो वे खुद की बनाई गलतियों को दोहराने लगते हैं। पहले एआई मॉडल्स का प्रशिक्षण लाखों वास्तविक मानवों के लिखे दस्तावेजों, किताबों, रिसर्च पेपर्स और वेबसाइटों से होता था।
अब इंटरनेट पर मानव कंटेंट का अनुपात तेजी से घट रहा है। एआई झूठी या अधूरी जानकारी को सत्य मानकर सीखता है। फिर वही जानकारी जब अगली पीढ़ी के मॉडल्स को ट्रेन करने में उपयोग होती है, तो गलती और भी पक्की हो जाती है। हजारों वेबसाइटें अब पूरी तरह एआई से कंटेंट जनरेट कर रही हैं। न्यूज, ब्लॉग, प्रोडक्ट रिव्यू या यहां तक कि किताबें भी। यह ‘ऑटोमेटेड इंटरनेट’ डाटा प्रदूषण (Data Pollution) का सबसे बड़ा स्रोत बनता जा रहा है।
इंसानों जैसी गलती क्यों कर रहा है एआई?
एआई इंसान की तरह सोच नहीं सकता, लेकिन उसका प्रशिक्षण तरीका इंसानी सीखने जैसा है। वह बार-बार देखे गए पैटर्न से निष्कर्ष निकालता है। अब जब पैटर्न ही गलत या खोखले हैं, तो उसका परिणाम भी बेकार होगा। जैसे कोई बच्चा अगर गलत किताबों से पढ़े या हर दिन झूठे समाचार ही सुने, तो उसकी समझ और तर्कशक्ति पर बुरा असर पड़ेगा, वैसा ही हाल एआई मॉडल्स का हो रहा है। इस समस्या को विशेषज्ञ “मॉडल कोलैप्स” या “डाटा डिजनरेशन” भी कहते हैं।
‘ब्रेन रॉट’ हमारे लिए क्यों खतरनाक है?
यदि एआई खुद भ्रमित होगा, तो वह यूजर्स को और अधिक भ्रामक जानकारी देगा। इससे फेक न्यूज, झूठे वैज्ञानिक दावे और राजनीतिक प्रचार तेजी से फैल सकते हैं। एआई से हम नए विचार, लेखन, डिजाइन या संगीत की उम्मीद करते हैं। लेकिन ब्रेन रॉट की स्थिति में यह केवल पुराने पैटर्न की नकल करेगा, कुछ नया नहीं रचेगा। जो कंपनियां एआई-आधारित विश्लेषण या कंटेंट पर निर्भर हैं, वे गलत निष्कर्षों पर पहुंच सकती हैं।
इससे शोध, शिक्षा और मीडिया क्षेत्र की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ेगा। अगर मानव निर्मित सामग्री की जगह एआई कंटेंट ले लेगा, तो आने वाली पीढ़ियों के पास असली मानवीय दृष्टिकोण और अनुभव उपलब्ध नहीं रहेंगे।
क्या इससे बचाव संभव है?
हां, समाधान संभव है, लेकिन इसके लिए तकनीकी कंपनियों और समाज दोनों को जागरूक होना पड़ेगा। उच्च गुणवत्ता वाले मानव-निर्मित कंटेंट को पहचानना और संरक्षित करना जरूरी है ताकि एआई को सही स्रोत मिलते रहें। ‘डेटा फिल्टरिंग’ तकनीक के तहत शोधकर्ता ऐसे एल्गोरिद्म विकसित कर रहे हैं जो एआई जनित और मानव जनित कंटेंट में फर्क कर सकें, ताकि ट्रेनिंग के समय गलत डाटा हटाया जा सके।
‘ह्यूमन इन द लूप’ मॉडल
हर बड़े एआई सिस्टम में कुछ हद तक मानवीय निगरानी बनाए रखना चाहिए, ताकि आउटपुट की गुणवत्ता और सत्यता बनी रहे। जैसे इंसानों को अच्छे और बुरे कंटेंट की पहचान करनी होती है, वैसे ही एआई को भी “सत्यता और संदर्भ” का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। सरकारों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों को ‘एआई डाटा गुणवत्ता’ के मानक तय करने होंगे। यह सुनिश्चित करना होगा कि इंटरनेट पर एआई द्वारा फैलाया जा रहा कंटेंट नियंत्रित और प्रमाणित हो।
मानवता के लिए सबक
एआई का ‘ब्रेन रॉट’ केवल तकनीकी विफलता नहीं, बल्कि मानव समाज के लिए दर्पण है। यह दिखाता है कि हम जिस डाटा को बना रहे हैं, सोशल मीडिया पर, इंटरनेट पर, न्यूज में वही डेटा अंततः हमारी “नई मशीनों” को आकार दे रहा है। यदि हम निम्न गुणवत्ता, झूठ और सतही सोच फैलाएँगे, तो मशीनें भी वैसी ही बनेंगी। और यदि हम सच्चाई, गहराई और ज्ञान साझा करेंगे, तो एआई भी उतना ही परिष्कृत और उपयोगी बनेगा।
‘एआई ब्रेन रॉट’ हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को वास्तव में “बुद्धिमान” बनाए रखने की ज़िम्मेदारी हमारी है। टेक्नोलॉजी अपने आप नहीं बिगड़ती उसे बिगाड़ता है उसका डाटा, यानी इंसान। अगर हम एआई को सही, सच्चा और नैतिक ज्ञान देंगे, तो यह हमारे विकास का सबसे बड़ा साथी साबित होगा। लेकिन अगर हमने लापरवाही दिखाई, तो वही एआई हमारी सोच और सभ्यता दोनों के पतन का कारण बन सकता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।