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ठहराव हार नहीं, जीत है: उम्र का सबसे अनमोल सबक; सुकून बाहर नहीं, भीतर मिलता है

Fri, 24 Jul 2026 07:11 AM IST
Devesh Tripathi ऐनी लैमॉट
ऐनी लैमॉट Published by: Devesh Tripathi Updated Fri, 24 Jul 2026 07:11 AM IST
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सार
बढ़ती उम्र धीमे चलने का सौंदर्य सिखाती है। जीवन के इस पड़ाव पर आकर हर चीज को पाने की अधीरता और बेचैनी स्वतः कम होने लगती है। तब एहसास होता है कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि लगातार भागते रहना नहीं, बल्कि ठहरकर जीना है।
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बढ़ती उम्र बहुत कुछ सिखाती है - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

मैं अब 67 साल की हूं और 60 की उम्र के आसपास मुझे महसूस हुआ कि अब जीवन को आधा-अधूरा नहीं जीना है। अब  किसी भी काम को बार-बार टालने का समय नहीं है। अब पूरी जागरूकता, उपस्थिति व कृतज्ञता के साथ जीना है। अतीत की गलतियों, अपमानों और निराशाओं में उलझे रहने के बजाय वर्तमान क्षण को पूरी तरह स्वीकार करना है। बढ़ती उम्र ने मुझे धीमे चलने का सौंदर्य सिखाया। पहले मैं हमेशा किसी उपलब्धि के पीछे भागती रहती थी। ऐसा लगता था, जैसे रेस के मैदान में दौड़ता हुआ कोई जानवर हूं, जिसे हर हाल में अगला लक्ष्य हासिल करना है।


पर, अब शरीर पहले जैसा नहीं रहा। पैरों में दर्द रहता है, दोपहर में थोड़ी देर आराम करने की जरूरत महसूस होती है। तब समझ में आया कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि लगातार भागते रहना नहीं, बल्कि ठहरकर जीना है। उम्र ने मुझे एक और अनमोल उपहार दिया। जैसे-जैसे समय बीतता चला गया, वैसे-वैसे दूसरों की कमियां खोजने की आदत भी कम होती चली गई। पहले मैं हर समय यह देखती रहती थी कि कौन क्या कर रहा है, कौन कहां गलत है और लोग वैसा क्यों नहीं करते, जैसा मैं चाहती हूं। अब वह अधीरता और बेचैनी समाप्त हो गई। अब मैं दूसरों को बदलने की कोशिश नहीं करती। इससे मन में एक गहरी शांति आई। यहीं से मेरे जीवन और लेखन, दोनों की दिशा बदल गई। अब मेरा लेखन महत्वाकांक्षा से नहीं, बल्कि हृदय की गहराइयों से निकलता है।


पहले लिखने के पीछे कहीं न कहीं सम्मान, पुरस्कार और पहचान पाने की इच्छा छिपी रहती थी। पर, आज वैसी कोई बेचैनी नहीं है। आज जो संतोष मुझे मिलता है, वह शायद किसी पुरस्कार या प्रशंसा से नहीं मिल सकता। मैंने पूरी उम्र जिस तृप्ति को बाहर खोजा, वह अंततः मेरे भीतर मिली। वास्तविक सुख, सम्मान या उपलब्धि बाहर की दुनिया नहीं दे सकती। वे क्षणिक होते हैं। संतोष भीतर से जन्म लेता है। वृद्धावस्था हमें सिखाती है कि जीवन का सबसे मूल्यवान खजाना बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर छिपा होता है।
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