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टोक्यो ओलंपिक: हॉकी में यह हरियाली अब बनी रहे, हम इस श्रावण को याद रखेंगे

Amitabh Srivastava अमिताभ श्रीवास्तव
Updated Thu, 05 Aug 2021 12:48 PM IST

सार

41 वर्ष से सूखी धरती पर श्रावण की बारिश हुई और बीज पड़ गए। भारत ने हॉकी में जर्मनी को हराकर कांस्य पदक पर कब्जा जमाया। ये कोई बहुत आसान सफर नहीं है,  बल्कि कहना चाहिए कि कांटो के बीच में नुकीली कीलें भी बिछी हुई थीं।

भारतीय हॉकी टीम की इस उपलब्धि पर पढ़ें वरिष्ठ खेल पत्रकार अमिताभ श्रीवास्तव का ये लेख..! 
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भारतीय ह़़ॉकी टीम की यह उपलब्धि इतिहास में दर्ज की जाएगी।
भारतीय ह़़ॉकी टीम की यह उपलब्धि इतिहास में दर्ज की जाएगी। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार

41 वर्ष से सूखी धरती पर श्रावण की बारिश हुई और बीज पड़ गए। भारत ने हॉकी में जर्मनी को हराकर कांस्य पदक पर कब्जा जमाया। ये कोई बहुत आसान सफर नहीं है, बल्कि कहना चाहिए कि कांटो के बीच में नुकीली कीलें भी बिछी हुई थीं। हर बार लहूलुहान होकर भारतीय हॉकी लौट रही थी।
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यूरोपियन लॉबी ने उसके जख्मों को अधिक से अधिक हरा किया और वो वेंटिलेटर तक जा पहुंची थी, मगर वो दुष्यंत कुमार जी का शेर है न कि - ' मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।' 


टोक्यो ओलम्पिक और भारत की उपलब्धि 

दरअसल, ये आग जलनी चाहिए थी। टोक्यो ओलम्पिक में सबकुछ भारत के पक्ष में था। अच्छा वातावरण, अच्छा अभ्यास, अच्छा खेल, अच्छी तकनीक, अच्छी सुविधाएं। जो पक्ष में नहीं था तो वो बस यूरोपियन लॉबी की मानसिकता जो अंपायरिंग जैसे ब्रह्मास्त्र से भारतीय हॉकी की उम्मीदों को निरन्तर चकनाचूर करती आ रही थी। ऐसे में आवाज़ उठाने वाला भी कोई नहीं था। किंतु मेरे सीने में न सही तेरे सीने में ही सही...ये आग अब बुझनी नहीं चाहिए। 

देखिए ये भी कोई ताल ठोंक कर कही जाने वाली बात नहीं है कि मैंने इस मामले को उठाया और दूसरे दिन ही नतीजा देखने को मिला। ऐसा होता भी नहीं। किन्तु आग यदि आप सुलगाने की कोशिश करेंगे तो उसकी आंच भले तेज न हो किंतु गर्म हवा उन कानों तक गाहे-बगाहे छू ही जाती हैं जिसके लिए आपका प्रयत्न करते हो। किसी का भी प्रयत्न हो, किसी भी तरह से हो और कोई भी हो यदि जरा सी भी हलचल हो जाए तो साजिशकर्ताओं के खेमे में कम्पन अवश्य पड़ जाता है। 

ब्रिटेन और बेल्जियम के खिलाफ जो जम के पक्षपाती अंपायरिंग कर भारत को पीछे धकेलने की सफल कोशिशें हुई थी उसने भारतीय जनमानस के माथे पर एक आक्रोश की, रोष की लकीरें अवश्य खींच दी थी। सोशल मीडिया हो या घर-घर बातें हों खराब अंपायरिंग को लेकर फुफुसाहट शुरू हो चुकी थी। फिर कुछ मीडिया ने भी इसे हवा दी और इस बात को वातावरण में छोड़ दिया कि भारतीय हॉकी को बचाना है तो सबसे पहले पक्षपाती अंपायरिंग पर नकेल कसनी होगी। 
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