आदिपुरुष विवाद: तथ्यों से लेकर संवाद तक सबकुछ तर्कहीन, 'सठ सुधरहिं सतसंगति पाई'
अगली सुनवाई पर फिल्म के निर्माता निर्देशक और पटकथा लेखक को भी तलब किया गया है। आपत्तियों के लिए एक समिति भी गठित की गई है। इसके साथ ही कोर्ट ने सूचना प्रसारण मंत्रालय और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को इस याचिका के जवाब में निजी हलफनामा दाखिल करने को कहा है।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
फिल्म आदिपुरुष के बड़बोले पटकथा लेखक मनोज मुंतशिर ने बिना शर्त माफी मांगी है। वहीं, 'बजरंग बली सबों पर कृपा करें और हमें अटूट रहकर देश-धर्म की सेवा करनी है', जैसे बयान भी दिए हैं। इससे पहले सेंसर बोर्ड चेयरमैन प्रसून जोशी इस्तीफे की पेशकश कर चुके हैं। दरसल आदिपुरुष का बखेड़ा थमता नहीं दिख रहा है, लोगों के रोष के नाते थियेटर खाली हैं। वहीं फिल्म के ओटीटी प्लेटफॉर्म रिलीज संभावना पर भी पानी फिर रहा है,क्योंकि रिलीज के साथ ही फिल्म इंटरनेट पर लीक हो चुकी है। ऐसे में ओटीटी प्लेटफॉर्म खिलाड़ियों ने हाथ खड़े कर दिए हैं।
इस बीच भारत से नेपाल तक आक्रोश और विरोध जारी है। एक ताजातरीन मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने इसे बेहद आपत्तिजनक मानते हुए कहा की रामायण जैसे धर्मग्रंथ को तो बख्स दीजिए। न्यायालय ने तल्ख़ टिप्पणी करते हुए कहा की आप कुरआन पर एक डॉक्यूमेंट्री बना दीजिए, फिर देखिए क्या होता है?
इस बीच अगली सुनवाई पर फिल्म के निर्माता निर्देशक और पटकथा लेखक को भी तलब किया गया है। आपत्तियों के लिए एक समिति भी गठित की गई है। इसके साथ ही कोर्ट ने सूचना प्रसारण मंत्रालय और केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड को इस याचिका के जवाब में निजी हलफनामा दाखिल करने को कहा है। आखिर ऐसी घटनाओं का कारण क्या हैं?
आदिपुरुष में कई अस्वीकार्य तथ्य
दरअसल रामायण भारत के घर-घर सुनी जाने वाली महागाथा है। वहीं सम्पूर्ण दक्षिण एवं पूर्व ऐशियाई देशों में यह जन अभिव्यक्ति का एक पुरातन माध्यम रहा है। इसके द्वारा जन शिक्षण का कार्य होता रहा है। यह मूल्यबोध से परिचित कराने आदर्श बताने और सुसंस्कृत बनाने के एक प्रभावी जरिया रहा है। इसको आप सर्वत्र महसूस कर सकते है। ऐसे में जहां हर भारतीय इस कथा से पूर्व परिचित है, वहीं रामायण के नाम पर आप कुछ भी नहीं परोस सकते है।
यहां रामायण से सम्बंधित पात्रों को लेकर भी एक पूर्व धारणा है। हर रामकथा, भगवती सीता के महान चरित्र का प्रतिपादन और रावण से आतंकियों के अंत की कहानी है ।यह प्रभु श्रीराम के मर्यादाओं की स्थापन संग अन्याय के प्रतिकार की गाथा है। ये भाव दुनियाभर में रचे गए हर रामायण के उद्गार है। इस फिल्म में ना तो कहानी का क्रम सही है और ना ही दृश्यांकन एवं संवाद।
ऐसे में रामायण के नाम पर कुछ भी स्वीकार्य नहीं किया जा सकता है। पहले इसे रामायण फिर आपत्तियों के बाद रामायण प्रेरित बता कर चलाया जा रहा है। जबकि फिल्म के शुरुआत में ही पर्दे पर इसे बाल्मीकि रामायण का स्क्रीन रूपांतरण बताया गया है। किंतु इस फिल्म में राम सीता जंगल में नाचते गाते दिखाए गए हैं।
बात रामायण की करें तो इनका वनवास पिता के वचनमान पूर्ति वाला एक राजदंड था। यहां फिल्म में शूर्पणखा राम से मिलती है और अपनी नाक कटा बैठती है। जबकि श्रीराम ने ताड़का के सिवा किसी अन्य स्त्री को कभी दंडित नहीं किया है। इस फिल्म में सीता हरण देखते हुए भी राम एक मूक दर्शक बने हैं। क्या वास्तव में कोई वीर पुरुष अपनी स्त्री का हरण आंखों के सामने देख मौन रहेगा? वहीं सीता यहां बिना विरोध के रावण द्वारा हर ली जाती हैं। यही नहीं हरण उपरांत भी कोई प्रतिकार नहीं करती हैं।
लंका में वो रावण संग वार्तालाप में प्रेम का मूल्य सोने में चुकाने की बात करती हैं। एक दूसरे संवाद में सीता द्वारा किसी मूल्यवान संग्रहणीय वस्तु के बदले प्रेम स्वीकृति की बात आती है। क्या देवी सीता का ऐसा चरित्र था? ऐसे ढेरों काल्पनिक दृश्य और आपत्तिजनक संवाद फिल्म में भरे पड़े हैं।
घटनाओं के काल से भी छेड़छाड़
आदिपुरुष की सीता जटायु से पूर्वपरिचित है और उन्हें मदद की जगह लौट जाने को कहती है। यहां राम जटायु से बिना मिले ही उसको मित्र मानते हैं। वहीं मृत जटायु को ढूंढ कर उनका शवदाह करते हैं। इन बातों का रामायण में वर्णित तथ्यों से कोई समानता नहीं है। यही नहीं राम बिना कबंध को मिले शबरी से मिलते हैं। इससे पूर्व ही राम हनुमान भेंट हो चुकी है।जबकि किसी भी राम कथा में ऐसा कोई जिक्र नहीं है।
पहले कबंध फिर शबरी और तब हनुमान जी संग रामजी के भेंट की चर्चा है। फिल्म में दिखाया गया राम हनुमान भेंट भी विश्वास योग्य नहीं है। वास्तव में यह एक अविस्मरणीय भेंट थी। यहां सुग्रीव के दूत हनुमान, राम की परीक्षा लेकर उनके प्रिय पात्र बन जाते हैं। यही नहीं वो इनके मैत्री के भी मध्यस्थ है। यहां बाली वध सुग्रीव का राज्यारोहण और विभीषण संग भेंट सब उलट-पुलट है।
रामायण कथानुसार वचनबद्ध सुग्रीव, सीता अन्वेषण हेतु हर दिशा में अपने दूत भेजते हैं। विभीषण संग प्रथम भेंट हनुमान की है। हनुमान सीधे लंका के अशोक वाटिका में प्रकट होते हैं। फिर वो रावण के वर्कशॉप मे पेश किए जाते हैं। आगे बिना योजना और अनुभव के रामसेतु बांध दिया जाता है। इतना ही नहीं विभीषण रावण के विरोध में सपरिवार राम के शिविर में चलकर आते हैं। वही रावण का एक गुप्तचर विभीषण का रूप धर श्रीराम के शिविर में आता है। यहां वो सीधे राम से मिलता और पकड़ लिया जाता है। ऐसे ही इस फिल्म में अंगद राम के संदेशवाहक नहीं अपितु पकड़े गए गुप्तचर को पहुंचाने वाले दूत है।जबकि अंगद की ये भूमिका अत्यंत प्रभावी थी।
आज भी अंगदी पांव की उपमायें दी जाती हैं। यह रामायण का एक प्रमुख दृष्टांत है। फिल्म में विभीषण की पत्नी मूर्छित लक्ष्मण की चिकित्सा करती है। जबकि यहां न उनके नाम और ना ही वैद्य होने की चर्चा आई है। यह फिल्म ऐसी ही तथ्यहीन बातों से पटी है। यहां युद्धभूमि में जंजीरों मे जकड़ी सीता को देख राम दौड़ते हैं। तभी रावण का पुत्र मेघनाथ आकर देवी सीता का गला काट देता है। राम की गोद में पड़ी सीता राम के शिविर से आए रावण के दूत रूप में परिणत हो जाती हैं।
यह फिल्म आरंभ से अंत तक वाहियात अवास्तविक तथ्यों से भरी पड़ी है। बात रामायण के अनुसार पात्रों के वेशभूषा की करें तो राम लक्ष्मण सीता भगवा योगी वेश मे होने चाहिए। जबकि हनुमान जी लाल देह लाल वस्त्रों वाले दिखने चाहिए थे। किंतु यहां इन्हें रामायण की कथा और मर्यादा से कहीं इतर दिखाया गया है।
फिल्म में सीता हरण को आया रावण कमंडल नही मुस्लिम फकीरों सा झोली फैलाता है। फिल्म के पात्रों का ये सब रूप हिंदू आस्थाओं पर चोट है। रामायण में वर्णित लंका सोने की थी तो अशोक वाटिका अशोक वृक्षों से भरा था। किंतु फिल्म में लंका काली और अशोक वृक्ष है ही नहीं। आदिपुरुष का रावण सीता हरण के लिए चमगादड़ पर सवार होकर पहुंचता है। जबकि रामायण में रथ और विमान का जिक्र है।
वहीं सनातन मान्यताओं में प्रभु राम को सदैव दाढ़ी मूंछ से रहित षोडष दिखाने की परंपरा है। यहा वें एक पराक्रमी धनुर्धारी और अवतारी पुरुष हैं। इसके उलट फिल्म में उन्हें अपने शत्रु से पिटते दिखाया गया है। फिल्म का नाम आदिपुरुष भी आपत्तिजनक है क्योंकि श्रीराम किसी आदिमानव समूह के प्रथम पुरुष नही थे। वे तो राजा इक्ष्वाकु के वंशज थे जिसका ज़िक्र रामायण एवं पुराणों में वर्णित है। भला ऐसे में आदिपुरुष का क्या मतलब है? वहीं फिल्म में पात्रों के नाम भी अजीब हैं राम राघव तो सीता जानकी पुकारी जा रही हैं। लक्ष्मण शेष तो हनुमान बजरंग बुलाए जा रहे हैं। जबकि वास्तव में ये नाम इनके परिवार,उपमा और पूर्वावतार से संबंधित है।
संवाद भी तर्कहीन
बात फिल्म के संवादों की करें तो इसके अनुसार सीता, लंका में भारत की बेटी हैं। इस मुद्दे पर जब नेपाल में फिल्म पर रोक लगी तो बदल कर इसे मिथिला की बेटी कर दिया गया। यही नहीं लगे हाथ फिल्म निर्माणकर्ताओं की ओर से एक पत्र भी काठमांडू के मेयर के नाम जारी किया गया। पत्र की भाषा के अनुसार सीता जी की जन्मभूमि नेपाल है। जबकि यह स्थल बिहार के सीतामढ़ी जिला अंतर्गत पुनौरा ग्राम है। इसकी चर्चा बाल्मीकि रामायण के बालकांड में वर्णित है।
बात इस संवाद की करें तो देवी सीता लंका किसी उपलब्धि के लिए नहीं अपितु बलात हरण नाते गई थीं। यहाँ अपने शील मर्यादाओं के रक्षण पालन के नाते वो पूजनीय हैं। ऐसे में बजाय बेटी के भारत की महान नारी के रूप में उन्हें बताया जाना उचित रहता। ऐसा ही एक संवाद लंका से लौटे हनुमान और राम का है। यहां दलीलें धर्मनिरपेक्ष की दी जा रही हैं जबकि व्यक्ति को सदैव न्याय एवं धर्म के पक्ष में होना चाहिए।
फिल्म निर्माणकर्ता इतने पर भी नही रुके। इन्होंने भावनाओं को आहत करण का सिलसिला लगातार जारी रखा। मीडिया के विभिन्न माध्यम उनके ऐसे उन्मादपूर्ण वक्तव्यों से पटे हैं। फिल्म के स्वनामधन्य संवाद पटकथा लेखक मनोज मुंतशिर लगातार कुछ न कुछ कहते रहे। इन्होंने मीडिया में भारत नेपाल विभाजन की तारीख बताई और लगे हाथ हनुमान जी पर भी दम भर अटपटा उत्तेजनक बोला।
खुद को भक्तकवि तुलसीदास के समतुल्य आंकते हुए अपनी इस लेखनी को रामचरित मानस सा प्रयोग बताया। जबकि ये अपने कथा और संवादों का संदर्भ तक बता पाने में अक्षम हैं। इनके नई पीढ़ी के लिए गढ़े गए संवाद और दादी नानी वाली कहानी लोगों के गले नही उतरी। युवा पीढ़ी भी थियेटर से दूर है। यहां तक की फिल्म को रामायण प्रेरित बता कर आक्रोश शमन का प्रयास भी निरर्थक रहा। यह महज पल्ला झाड़ने का प्रयास भर लगा।
अगर यह वास्तव में ये रामायण प्रेरित होता तो अवश्य प्रशंसनीय होता। क्योंकि ऐसे साहित्य और लेखक सदैव स्वीकारे गए हैं।लाओस का महाग्रंथ राम जातक, फादर कामिन बुल्के की एक ईसाई की रामकथा और करपात्री महाराज के रामायण मीमांसा ऐसे ही साहित्य हैं। इनकी उपमाएं अब भी दी जाती हैॆ। नरेंद्र कोहली लिखित उपन्यास अभ्युदय के मानवीय चरित्र राम को भी स्वीकारा गया है। ऐसा आदिपुरुष को लेकर क्यों नहीं है, यह एक सवाल बनता है।
दरअसल फिल्म और सीरियल केवल मनोरंजन का एक व्यापक एवं सर्वसुलभ माध्यम नहीं हैं ।ये वास्तव में विचारों के सम्प्रेषण का एक सशक्त जरिया हैं। ऐसे में यह भावनाओं के चोटिल करने और धारणाओं को ध्वस्त करने का भी एक उपक्रम हो सकता है। वैसे भी आप जब ऐसे विषय पर इतना अधिक खर्च कर फिल्म बना रहे है तो फिर संवादों के बदलाव की जरूरत क्यों है?वहीं अब खेद व्यक्त करने का क्या मतलब है।
दरसल पिछले वर्ष फिल्म के आए प्रोमो पर भी आपत्ति हुई थी। तबसे बजाय बदलाव की जगह पूरा जोर फिल्म को चर्चा में बनाए रखते हुए भावनाओं को भुनाने की थी जो असफल सिद्ध हो चुकी है। ऐसे में न्यायालय से लेकर आम जन तक का फिल्म के प्रति दिख रहा रवैया निश्चित ही एक सबक है। आने वाले वक्त में ऐसी सिनेमा के लिए शुभेच्छा देने के पहले राजनेता और संत भी सोचेंगे।
इसके अलावा ये समय राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के छद्म पैरोकार कवि, कलाकार और फिल्मकारों के दिन ढलने का भी है। अब जनभावनाओं से खिलवाड़ संभव नहीं होगा। दरअसल देश मनोरंजन के नाम पर कुछ भी स्वीकारने के पक्ष में नहीं है। ऐसे में हर फिल्मकार को ऐसे किसी ऐतिहासिक घटना या दैवीय चरित्र के चित्रण पूर्व निश्चित ही सोचना होगा। फिलहाल ये परिस्थितियां और स्वीकारोक्ति बदलाव के पक्ष में है। वहीं ये बदलाव सठ सुधरहिं सतसंगति पाई से ही सार्थक होगा।
-----------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।