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आदिपुरुष: औचक से भौचक्का कर देने वाली “वायरल” मंशा और एक फिल्म के बहाने बॉलीवुड की क्लास

Tue, 20 Jun 2023 06:58 PM IST
Sarang Upadhyay सारंग उपाध्याय
Updated Tue, 20 Jun 2023 06:58 PM IST
सार

घनघोर नैगेटिविटी भरे समय में भी पॉजिटिविटी ढूंढ लेने वाला दुस्साहसी कदम यही कहना है कि आदिपुरुष यकीनन एक "ऐतिहासिक" फिल्म है जिसे बॉलीवुड लंबे समय तक याद रखेगा। इस फिल्म से बॉलीवुड के सारे कैंप समझ जाएंगे कि मजाक करना और फिल्म बनाने में अंतर होता है।

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मनोज मुंतशिर, सैफ अली खान - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

इस दौर में गर येन-केन-प्रकारेण एक पल के अंदर दुनिया के दिलो-दिमाग पर छा जाने की चाहत संक्रामक ना होती और हाथ-पैर, नाक-कान, गला-मुंह और आंखें चेहरा तक “वायरल” हो जाने की इच्छा बीमारी होने तक जोर ना मारती तो कलात्मक रूप से ऐसा बहुत कुछ था जिसे ना केवल बचाया जा सकता था बल्कि जरा तरीके से इतिहास के मर्तबान में मुरब्बे की तरह संजोया जा सकता था। मगर अफसोस की इस जमाने में दोनों ही बातें बेमानी हैं और गर ना भी ईमान का मसला हो तो कम से कम बाबा आदम के जमाने की वकालत ही मान ली जाए।

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और अब चूंकि इस कमजर्फ दुनिया में इस वक्त बच्चों से लेकर बूढ़ों तक के दिलों पर इंस्टा की रीलें डोरे डाल रही हैं और हसीन लड़कियों से लेकर झुके कंधों वाले अधेड़ों तक की आंखों में एक पल में किसी अचंभे में कूद जाने की तड़फड़ाहट शोर मचा रही है तो फिर बॉलीवुड की हालिया रिलीज फिल्म आदिपुरुष का “ऐतिहासिक” हो जाना और किसी डायलॉग राइटर मनोज मुंतशिर का फिल्म के निर्माता-निर्देशक की तरह पेश आना कोई बड़ी बात नहीं है।
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बाहरहाल,  बातों वातों की बात छोड़िए, बातें हमारे यहां हजारों सालों से होती रही है, अलबत्ता गप्पबाजी गर हमारे गाम-चौपालों की बेचैनियों की अंतर्कथा ना बांचती और लफ्फाजी हमारी रगों में ना दौड़ती तो भला यूपी के अमेठी वाले मनोज मुंतशिर शुक्ला भैया भरे टेलीविजन बाजार ये बोलते से थोड़ा तो शरम खाते कि फिल्म में हनुमान जी के संवाद जानबूझकर लिखे गए हैं-
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इस तर्क के साथ कि-

“मैं एक छोटे से गांव से आया हूं और हमारे यहां दादियां-नानियां इसी भाषा में रामायण-महाभारत की कहानियां सुनाती रहीं हैं जैसी भाषा का प्रयोग फिल्म में किया गया है। 

सच्ची,  इतिहास ऐसे ही तो रचा जाता है-

खैर, दलीलों में जब पुरखों की ही बातों की गप्पबाजी का डेरिंग है तो फिर इस फानी दुनिया और खाक होते जमाने में याद रखे जाने के लिए उस जहां को ही याद किया जाए कि जो नहीं देखा गया और उस पर कुछ कहा जाए।


जैसे एक बड़ा निर्माता एक निर्देशक के हाथों राम-लक्ष्मण, सीता-हनुमान, रावण, मेघनाथ, विभीषण सहित कई किरदारों के साथ वह हो जाने देना चाहता था जो एक निर्देशक चाहता था और वह निर्देशक वह सबकुछ किरदारों से कहलवा देना चाहता था जो भोले-भाले शुक्ला चाहते रहे। 


एक फिल्म के पर्दे पर पहुंचने से पहले तक की यात्रा जितने पड़ावों से गुजरती है क्या उनमें से एक भी पड़ाव भला ऐसा ना होगा जहां निर्माता-निर्देशक और लेखक अपने किए पर कुछ सोच पातेे।


रामायण को गेम्स ऑफ थ्रोंस बना देना, रावण की लंका को काला कर उससे लोहा पिटवा देना और मेघनाथ को एलियन बनाकर वह सब दिखा देना जिसे रोकने के बारे में एक बार सेंसर बोर्ड नहीं सोच पाया। 

सेंसर बोर्ड सोया रहेगा, निर्माता चुप्पी साधेगा, निर्देशक भड़भड़ाएगा और एक संवाद लेखक अपनी विद्वता का परचम न्यूज चैनलों में लहराता फिरेगा

जाहिर है जब देश में हर अच्छे-बुरे में वायरल हो जाने की मंशाएं काम कर रही हों और ऊटपटांग वीडियो से दुनिया पर छा जाने की कामनाएं कपड़े उतार रही हों तो फिर हमारी ही रामायण के मर्यादापुरुषोत्तम को “आदिपुरुष” में ऐसे दर्शा देना का चुटकियों का ही तो खेल है।


अब भला सोचिए देश में सिनेमा किसी मोबाइल की विंडो में दिनरात 24 घंटे ऐसे ना फड़फड़ा रहा होता क्या इस देश के हद्य में धड़कने वाले कालजयी ग्रंथ रामायण की राम कथा भला “आदिपुरुष” जैसी ऐतिहासिक रचनात्मकता के साथ फिल्मी पर्दे पर उतर पाती? सेंसर बोर्ड फिल्मों की अथाह-अपार बारिश में ऐसी क्रिएटीविटी के लिए जगह बना देना राम पर अहसान का ही तो काम है।

दरअसल, घनघोर नैगेटिविटी भरे समय में भी पॉजिटिविटी ढूंढ लेने वाला दुस्साहसी कदम यही कहना है कि आदिपुरुष यकीनन एक "ऐतिहासिक" फिल्म है जिसे बॉलीवुड लंबे समय तक याद रखेगा। इस फिल्म से बॉलीवुड के सारे कैंप समझ जाएंगे कि मजाक करना और फिल्म बनाने में अंतर होता है। 



लाखों-करोड़ों जनमानस के मन में प्रवाहित होते इस कालजयी ग्रंथ पर फिल्म बनाते हुए स्टूडियों में, फोन के संवादों में सोचने लायक जो होगा वह केवल उफान मारती वही मंशाएं होंगी जिसके बूते यह फिल्म बनकर सामने आई है अन्यथा फिल्म के संवाद लिखते समय और देश के उसी गांव अंचल के मानस को समझते हुए वे ऐसे संवाद ना लिखते जहां से उनकी दादी-नानी आती है। 

खैर, बॉलीवुड एक सबक इस फिल्म के बहाने याद रखेगा। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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