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सूर्यास्त एक सम्पूर्ण एहसास: एक थकान भरे दिन के बाद सूर्यास्त का आनंद लेना, इससे अच्छा पल शायद ही कोई है

Tue, 05 Oct 2021 05:21 PM IST
Aditya Mandloi आदित्य मंडलोई
Updated Tue, 05 Oct 2021 05:21 PM IST
सार

बचपन में सूर्यास्त बड़े ही सादे लगते थे। जब घरवालों के साथ कहीं घूमने जाते, "सनसेट प्वाइंट" पर जाना बोर होने के बराबर था। उस स्थान पर मौजूद कोई फैंसी गतिविधियाँ और स्टाल नहीं होते थे। बस एक साधारण सेटिंग और सूर्यास्त देखने के लिए आने वाले लोग। उस समय मेरी माँ ने मुझे सूर्यास्त से प्यार करना सिखाया। जैसे ही सूरज डूबता, वह वर्णन करने लगती, कि कैसे रंग पीले से नारंगी में बदल रहा है।

जब वह सूर्योदय से सूर्यास्त तक सूर्य की यात्रा का वर्णन करती और चमकती आंखों के बीच मेरी नादान जिज्ञासाओं को शांत करती जाती। वह विशेष रूप से सूर्यास्त के साथ अपनी विशिष्ट तस्वीरें फोटोग्राफरों से खिंचवाती।

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A complete feeling of sunset wonderful moment of enjoying sunset on a tiring day
सूर्यास्त - फोटो : Aditya Mandloi

विस्तार

बचपन में सूर्यास्त बड़े ही सादे लगते थे। जब घरवालों के साथ कहीं घूमने जाते, "सनसेट प्वाइंट" पर जाना बोर होने के बराबर था। उस स्थान पर मौजूद कोई फैंसी गतिविधियाँ और स्टाल नहीं होते थे। बस एक साधारण सेटिंग और सूर्यास्त देखने के लिए आने वाले लोग। उस समय मेरी माँ ने मुझे सूर्यास्त से प्यार करना सिखाया। जैसे ही सूरज डूबता, वह वर्णन करने लगती, कि कैसे रंग पीले से नारंगी में बदल रहा है। जब वह सूर्योदय से सूर्यास्त तक सूर्य की यात्रा का वर्णन करती और चमकती आंखों के बीच मेरी नादान जिज्ञासाओं को शांत करती जाती। वह विशेष रूप से सूर्यास्त के साथ अपनी विशिष्ट तस्वीरें फोटोग्राफरों से खिंचवाती।
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यह मेरे लिए भी एक संस्कार बन गया। जब भी मैं कहीं यात्रा करता हूं, तो सबसे पहले मैं "सनसेट प्वाइंट" के बारे में पता करता हूं। डूबते हुए सूरज में शांति से बैठना, सतरंगी आसमान को देखना, विभिन्न स्थानों के सूर्यास्त के साथ उनकी तुलना करना तब से एक अनुष्ठान बन गया है । मेरा मानना है कि "जिस जगह का सूर्यास्त नहीं देखा, वह जगह पूरी नहीं देखी।"
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जब मैं मुंबई में काम करता था, तो उन गगनचुंबी इमारतों के बीच, मुझे एक जगह मिली थी जहाँ मैं डूबते सूरज की एक झलक पा सकता था। मैं रोज शाम को उस स्थान पर चल पड़ता, वहाँ चुपचाप अपना फोन बंद करके बैठ जाता और थोड़ा ध्यान करता। मेरे विचार शांत हो जाते, मेरा मन प्रसन्न हो जाता और मेरी थकान मिट जाती।
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A complete feeling of sunset wonderful moment of enjoying sunset on a tiring day
सूर्यास्त - फोटो : Aditya Mandloi
लॉकडाउन के दौरान, भारत में कॉलेज बंद हो गए और हमें अपने घरों को लौटना पड़ा। एक चीज जो मुझे सबसे ज्यादा याद आती रही वह था मेरे संस्थान में सूर्यास्त। उन पलों में पक्षियों को चहचहाहट और चाय कि भीनी सी खुशबू थी। कई मौकों पर, बिना किसी कारण के , अगर सूर्यास्त देखना रह जाए, तो बड़ा बेकार लगता था। इसलिए, मैंने बिना नागा के, अपनी छत से सूर्यास्त देखने का एक नियम बना लिया। वे मेरे खूबसूरत संस्थान जितने रोमांचक तो नहीं थे, पर सुकून पूरा देते थे।

लॉकडाउन के सुस्त दिनों में, मुझे एक सहारा मिल गया था। सुंदर चीज़ को निहारना, जो अनन्त थी और काफी हद तक सम्पूर्ण थी। मैं उनका पीछा करने लगा। मुझे याद है कि कैसे फरवरी से मई तक सूर्यास्त पश्चिम से उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ने लगा और शाम 6:00 बजे से 6.55 की हो गई।

यह ऐसा था जैसे मुझे दिन कि मेहनत का एक सुंदर समापन और इनाम मिला है। जब मैं सूर्यास्त की मन ही मन सराहना करता हूं, तो जीवन की तुच्छताएं और छोटे-छोटे तनाव गायब हो जाते हैं। मैं जीवन में प्राकृतिक चीजों की सूक्ष्मता और सरलता को महत्व देने की कोशिश करता हूं। और क्या हम यही नहीं चाहते हैं?

आदित्य मंडलोई एक वानिकी प्रबंधन स्नातक हैं जो डेवलपमेंट इनोवेशन फाउंडेशन, भोपाल में प्रोग्राम एसोसिएट के रूप में कार्यरत हैं। उन्हें अपने खाली समय में छोटे लेख लिखने में मज़ा आता है और जब वह भावुक होते हैं तो कविताएँ लिखते हैं। उनका मानना है कि थोड़ी सी सहानुभूति दुनिया को और बेहतर बना सकती है।

यह श्रृंखला 'नेचर कन्ज़र्वेशन फाउंडेशन' द्वारा चलाए गए 'नेचर कम्युनिकेशन्स' कार्यक्रम की एक पहल है। पक्षियों और प्रकृति के बारे में अधिक जानने के लिए, हमारे मुफ़्त न्यूज़लेटर द फ़्लोक में शामिल हों।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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