26 जनवरी विशेष: जन-गण-मन और नन्हें ‘नेताजी ’
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प्रकाश स्तंभ समान राष्ट्रगान की प्रिय आवाज़ जब भी हमारे कानों में कहीं पड़ती है, तो कदम वहीं ठहर जाते हैं, शरीर सावधान मुद्रा में चला जाता है और रोमांचवश आंखों से अश्रु रूपी दो मोती स्वतः ही गिर जाते हैं।
फेसबुक पर एक बहुत ही पुराने सहपाठी ने इस संदेश के साथ अपनी फ्रेंड रिकवेस्ट भेजी – “ जमीन सलाम करे, असमान सलाम करे, करो वो काम कि सारा जहां सलाम करे। “ उन सज्जन की तस्वीर देखकर तो मैं समझ गया कि कक्षा पांच तक हम एक ही विद्यालय में साथ पढ़ चुके हैं, पर इसके बावजूद भी मैं उनके फेसबुक मैसेज का संदर्भ समझने में असमर्थ था।
पुराने साथी को इतने दिनों बाद (फेसबुक पर ही सही) देखकर अत्यंत प्रसन्नता हुई। मैसेंजर पर उनका फोन नंबर लिया और तुरंत उनको कॉल करके पहला सवाल यह पूछा कि उसने अपने संदेश में ‘ जमीन सलाम करे..’ क्यों लिखा? मित्र ने हंसते हुए उत्तर दिया, “अरे तुम्हें याद नहीं ! यह कव्वाली हम दोनों ने सफेद कुरता और काली सदरी पहन कर स्कूल के मैदान में बने रंगमंच पर बैठकर 26 जनवरी के अवसर पर गाई थी।”
यह बात सन् 1986 अथवा 87 के आस-पास की होगी, जब हम कक्षा चार अथवा पांच में पढ़ा करते रहे होंगे। मैं चकित रह गया कि उसे इतनी पुरानी बात भी अब तक याद थी। 'टाइम मशीन ' के समान छोटी सी इस कॉल ने जैसे बचपन में राष्ट्रीय पर्वों से पूर्व मेरी व्यस्तता और उत्साह को जीवंत और साकार कर दिया था। विद्यार्थी जीवन के आरंभ की स्मृतियां उथल-पुथल करती हुई कई दिशाओं से झांक उठीं।
नर्सरी स्कूल में प्रतिदिन छुट्टी की घंटी बजने से ठीक पहले हम सभी बच्चों को अपनी कक्षा में एक साथ राष्ट्रगान गाना होता था। राष्ट्रगान की अंतिम पंक्ति ‘जय जय जय जय हे ’ के तुरंत बाद ‘गुड आफ्टरनून ’ कहते हुए सभी बच्चे बस्ता उठाकर अपने घरों की ओर भाग जाते थे। जनाब! नर्सरी के बच्चे को कितनी समझ? मुझे बहुत दिनों तक यह लगा कि ‘गुड आफ्टरनून ’ हमारे राष्ट्रगान के ही अंतिम बोल हैं!
स्मृतियों में एक तस्वीर और उभरती है--उसी विद्यालय में हम बच्चों को प्रार्थना के समय देश भक्ति की ऊर्जा से ओतप्रोत गीत ' नन्हा मुन्ना राही हूं, देश का सिपाही हूँं' भी अभ्यास कराया जाता था। इस गीत को मेरे चाचा जी ने मेरी आवाज में अपने टेप रिकॉर्डर में रिकॉर्ड भी कर लिया था और वह ऑडियो कैसेट आज भी उनके पास सुरक्षित है।
उस जमाने में हम प्रशासनिक कर्मचारियों की एक कॉलोनी में रहा करते थे, जो कि कार्यालय परिसर में ही बनी हुई थी। हमारे पिताजी वहीं उसी कार्यालय में पोस्टेड भी थे। क्या बड़े और क्या छोटे। मैं अक्सर सभी को उस कॉलोनी में ‘राष्ट्रगान और नन्हा मुन्ना राही ’ बड़े आनंद से गाकर सुनाया करता था। एक नर्सरी में पढ़ने वाले बच्चे की इतनी सक्रियता देख कर कॉलोनी के लोगों ने मुझे ‘नेताजी ' के नाम से पुकारना आरंभ कर दिया।
फिर क्या था ! वहां पर रहने वाले हमारे पिताजी के अधिकतर सहकर्मियों ने एक मत होकर कार्यालय के प्रबंधक ' नाजिर जी ' को यह सुझाव दिया कि आगामी गणतंत्र दिवस पर ध्वजारोहण के तुरंत बाद राष्ट्रगान डिस्क पर प्ले करने के बजाय, ‘ नेताजी ’ को माइक के सामने खड़ा करके लाइव गवाया जाए। नाजिर जी के पास संस्तुति के अलावा कोई दूसरा विकल्प न था, सलाह देने वालों में उनके सीनियर, एक नायब तहसीलदार अंकल भी जो शामिल थे।
ध्वजारोहण के उपरांत समारोह में उपस्थित सभी लोग कार्यालय परिसर के भीतर बने...
26 जनवरी को ठीक आठ बजे परिसर में ही नियुक्त सिपाहियों की ‘सलामी शस्त्र’ के बीच वहां के तत्कालीन उपजिलाधिकारी (एस. डी. एम) द्वारा ध्वजारोहण किया गया और मैंने पहली बार सैकड़ों लोगों के सामने खड़े होकर माइक पर अपने स्कूल यूनिफार्म में राष्ट्रगान गाया।
ध्वजारोहण के उपरांत समारोह में उपस्थित सभी लोग कार्यालय परिसर के भीतर बने झंडियों से आच्छादित एक वृहत हॉल में दरी के ऊपर बिछी साफ-सफेद चादर पर जाकर बैठ गए। धीर-गंभीर एस. डी. एम. साहब ने सभा को संबोधित किया और फिर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का शुभारंभ एक प्रतिभागी समूह के कीर्तन द्वारा किया गया। कीर्तन समाप्त होने के तुरंत बाद कार्यक्रम के संचालक ने घोषणा की, “अब आप सबको हमारे कैंपस के ‘नेताजी ’ एक गीत सुनाएंगे।“
फिर तालियों के बीच उठकर मैं मंच तक पहुंचा। मेरे लिए माइक की हाईट एडजस्ट की गई और मैंने एक्शन के साथ ‘नन्हा मुन्ना राही हूं ’ गीत सबको ‘ दाहिने बाएं दाहिने बाएं ’ बुलंद आवाज में कहते हुए कदम- ताल करते हुए सुनाया।
गीत जैसे ही खत्म हुआ, मंच पर बैठे उपजिलाधिकारी महोदय ने बड़े प्यार से मुझे अपनी ओर बुलाया और बोले, “ भई नेताजी ! आप तो बहुत ही सुंदर और मधुर गाते हैं, पर आपने राष्ट्रगान गाते समय लगता है एक छोटी सी गलती कर दी। ‘जन गण मन’ के अंत में ‘गुड आफ्टरनून’ भला क्यों? ” फिर उन्होंने मुझे समझाया कि राष्ट्रगान तो बस ‘ जय जय हे ’ पर ही समाप्त हो जाता है और ‘ गुड आफ्टरनून ’ विद्यालय से छुट्टी के समय अध्यापक को अलविदा कहने के लिए कहा जाता है।
इसके बाद उन्होंने अपनी उंगली से इशारा करते हुए नाजिर जी को बुलाया और उनको हिदायत दी कि आइंदा जितने भी राष्ट्रीय पर्व उनके यहां होंगे, राष्ट्रगान ‘नेताजी’ ही गाएंगे। फिर उन्होंने मुझे इनाम के तौर पर कुछ रुपये और लड्डू भी दिए। मैं बेहद प्रसन्न था।
उस समारोह के बाद कई वर्षों तक 26 जनवरी और 15 अगस्त का कार्यक्रम आरंभ होने से पूर्व नाजिर जी हमेशा राष्ट्रगान के लिए मुझे बुलाने आते थे और मैं एक विशिष्ठ अतिथि के रूप में वहां पर जाया करता था। इसलिए पूरे वर्ष मुझे इन दो दिनों का बेसब्री से इंतजार रहता था।
बचपन से ही इस प्रकार के कार्यक्रमों में रुचि और नियमित हाजिरी के कारण शुरू से ही अपने राष्ट्रगान के साथ ऐसा जुड़ाव पैदा हुआ कि आज भी जब इस प्यारे गीत की आवाज कानों में कहीं पड़ती है, तो कदम वहीं ठहर जाते हैं, शरीर सावधान मुद्रा में चला जाता है और रोमांचवश आंखों से अश्रु रूपी दो मोती स्वतः ही गिर जाते हैं।
हमारे महान गणतंत्र और प्रेरणादायी संविधान का सम्मान कायम रहे और हम नई ऊंचाईयों को छुएं, इस कामना के साथ भारत के भाग्य विधाता- बच्चों और आप सभी को गणतंत्र दिवस की ढेरों बधाइयां।
(लेखक हैदराबाद स्थित एक आई.टी. व इंजीनियरिंग सर्विसेज कम्पनी में निदेशक व स्तम्भकार हैं )
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