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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   14th September Hindi Diwas 2023: Hindi is the pride of the country

हिंदी दिवस विशेष: हिंदी देश की शान है

Wed, 13 Sep 2023 04:50 PM IST
Shakeel Khan शकील खान
Updated Wed, 13 Sep 2023 04:50 PM IST
सार

स्कूली शिक्षा के दौरान हिंदी के प्रश्नपत्र में 'उपरोक्त' शब्द का प्रयोग होते खूब देखा है। सरकारी कार्यालयों में पत्राचार और आम बोलचाल में भी इसका धड़ल्ले से उपयोग होता है। जबकि यह शब्द गलत है। सही शब्द 'उपर्युक्त' है जिसका रूप बिगड़कर 'उपरोक्त' हो गया है।

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14th September Hindi Diwas 2023: Hindi is the pride of the country
हिंदी दिवस 2023 - फोटो : istock

विस्तार

देश में इस समय 'इंडिया' और 'भारत' शब्द पर बहस शबाब पर है। इस बीच हिंदी दिवस का आगमन हो गया। सो हिंदी भाषा पर बात करना तो बनता है। वैसे बात तो बिना इसके भी बनती है, लेकिन बता दें यहां न तो किसी राजनीतिक दृष्टि से बात होगी और न ही भारी भरकम हिंदी शब्दों पर। हां ये जरूर है कि मोटा-मोटी तकनीकी, रोचक और जरूरी जानकारी पर चर्चा जरूर होगी। हमारा फोकस उन शब्दों पर भी होगा जो रोजमर्रा की जिंदगी में उपयोग किए जाते हैं। जानना दिलचस्प होगा कि 57.1 प्रतिशत हिंदी बोलने वाले हम भारतीय कितनी सही हिंदी बोलते हैं।

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गौरतलब, है हिंदी के मानकीकृत रूप को मानक हिंदी कहा जाता है यह हिंदुस्तानी भाषा का एक मानकीकृत रूप है जिसमें संस्कृत के तत्सम और तद्भव शब्दों का बाहुल्य है। इसमें अंग्रेजी और उर्दू शब्दों का भी समावेश है लेकिन कम मात्रा में। हिंदी को भारत की राजभाषा का दर्जा प्राप्त है।
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स्कूली शिक्षा के दौरान हिंदी के प्रश्नपत्र में 'उपरोक्त' शब्द का प्रयोग होते खूब देखा है। सरकारी कार्यालयों में पत्राचार और आम बोलचाल में भी इसका धड़ल्ले से उपयोग होता है। जबकि यह शब्द गलत है। सही शब्द 'उपर्युक्त' है जिसका रूप बिगड़कर 'उपरोक्त' हो गया है। ऐसे शब्दों को अपभ्रंश कहा जाता है। ऊपर हमने 'तत्सम' और 'तद्भव' शब्दों का जिक्र किया था और अब अपभ्रंश शब्द की बात। ये क्या होते हैं?
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तत्सम वे शब्द होते हैं जो संस्कृत से हिंदी में आकर सीधे उच्चारित होते हैं। मोटे तौर पर कह सकते हैं कि ये शब्द संस्कृत के मूल शब्द हैं। तत् का अर्थ होता है उसके (यहां संस्कृत) और सम का मतलब समान। यानि ज्यों का त्यों। यहां ध्वनि परिवर्तन नहीं होता। उदाहरण के लिए आम्र, अग्नि, अमूल्य, क्षेत्र, चंद्र आदि। संस्कृत से निकल हिंदी में आने पर बदलने वाले शब्द तद्भव शब्द कहलाते हैं। तद्भव शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है। तत् का अर्थ होता है उससे (संस्कृत) तथा भव का अर्थ होता है - विकसित। शाब्दिक अर्थ हुआ उससे यानि संस्कृत से विकसित हुआ शब्द। हिंदी के क्रिया शब्द तद्भव होते हैं। उदाहरण के लिए आग, अनाज, आम, आलस, छाता, चॉंद आदि।  तत्सम के बिगड़े हुए रूप में सामने आने वाले शब्द अपभ्रंश कहलाते हैं।

हिंदी की सबसे बड़ी विशेषता ये है कि ये जैसी बोली जाती है वैसी ही लिखी जाती है। जैसे हमने बोला - 'उपयोग'। उ, प, य में ओ की मात्रा और ग खाली, बोलते समय ही स्पष्ट हो गया क्या लिखना है, कैसे लिखना है। अब हमने बोला 'उपयोगी' यानि बोलते समय ही साफ हो गया क्या लिखना है। अंग्रेजी की तरह नहीं कि 'पीयूटी पुट' है तो 'बीयूटी बट' है, लेकिन इतना होने के बावजूद हम हिंदी गलत लिखते हैं और बोलते भी हैं। वैसे इसमें कोई खास गलत बात नहीं है।

अंग्रेजी को ही ले लें। अंग्रेज शायद (या कोई और विदेशी भाषा-भाषी) आम बातचीत के दौरान व्याकरण पर उतना जोर नहीं देते होंगे जितना हम भारतीय यहां हिंदुस्तान में देते हैं। भाषा का काम हमारे अंदर के भावों को सम्प्रेषित करना भर है। वैसे ये अलग बात है कि कभी-कभी चीरफाड़ भी होते रहना चाहिए, हिंदी दिवस जैसे खास मौकों पर।

14th September Hindi Diwas 2023: Hindi is the pride of the country
हिंदी भाषा का जन्म कहां हुआ था? - फोटो : amar ujala

हर भाषा में वर्तनी को लिखने का एक खास तरीका होता है। इन्हें लिखते समय गलतियां होने की संभावना बनी रहती है, बोलते समय भी। इनमें से कई त्रुटियां तो ऐसी होती हैं कि हमें सही शब्द गलत लगने लगता है और गलत शब्द सही। इन शब्दों पर ग़ौर कीजिए। सहस्त्रों, मानवीयकरण, इंद्रा, ईर्षा, एक्य या एक्यता, कालिदास, आद्र आदि। ये सभी गलत शब्द हैं। सहस्त्र है सहस्त्रों नहीं, मानवीकरण सही है, मानवीयकरण नहीं।

इंदिरा है इंद्रा नहीं, ईर्ष्या है ईर्षा नहीं, ऐक्य है एक्य या एक्यता नहीं, आर्द्र है आद्र नहीं। कालिदास गलत है कालीदास सही। अहिल्या नहीं अहल्या कहिए। अकांक्षा नहीं आकांक्षा, तिथी नहीं तिथि, उज्वल नहीं उज्जवल, उधम नहीं ऊधम, उपजाउ नहीं उपजाऊ, उपलक्ष नहीं उपलक्ष्य, उष्मा नहीं ऊष्मा, करिएगा नहीं कहिए, कीजिएगा बोलिए। कवियत्री नहीं चलेगा कवयित्री लिखें-बोलें। काराग्रह नहीं कारागृह। कूबत नहीं होती कूवत होती है।

गंठजोड़ नहीं गठजोड़, गैरसम्मानजनक नहीं असम्मानजनक कहिए, चिन्ह नहीं चिह्न (ह आधा है न नहीं), ज्योत्सना नहीं ज्योत्स्ना, ब्रम्ह नहीं ब्रह्म, वापिस नहीं वापस, वेषभूषा नहीं वेशभूषा, सदृश्य नहीं सदृश, अनाधिकार नहीं अनधिकार, अनेकों नहीं अनेक, पूज्यनीय नहीं पूजनीय। ऐसे बहुत उदाहरण मिल जाएंगे। वैसे इन्हें सही बोलने और लिखने की कोशिश करें तो बेहतर है, अनिवार्य नहीं। हमारी अपनी भाषा है थोड़ा इधर-उधर हो जाए तो क्या फर्क पड़ता है। वैसे बता दें ये हमारा व्यक्तिगत मत है एक सामान्य नागरिक की हैसियत से। हिंदी के प्रकांड और विद्वान लोगों का सोच अलग संभव है।

हिंदी भाषा का जन्म कहां हुआ था? कहा जाता है कि हिंदी भाषा का इतिहास लगभग एक हजार साल पुराना है। संस्कृत भारत की प्राचीन भाषा है, जिसे आर्य या देवभाषा भी कहा जाता है। यह भी कहा जाता है हिंदी का जन्म संस्कृत की कोख से ही हुआ है।

हिंदी दिवस कहां से आया और क्यों ?  हिंदी दिवस हर साल 14 सितम्बर को इसलिए मनाया जाता है क्योंकि 14 सितम्बर, 1949 को संविधान सभा ने यह निर्णय लिया था कि हिंदी केन्द्र की आधिकारिक भाषा होगी। भारत के अधिकांश भागों में हिंदी बोली जाती है इसलिए यह निर्णय लिया गया था। हिंदी के विस्तार के लिए 1953 से पूरे भारत में 14 सितम्बर को हर साल हिंदी दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। 

इससे पहले 1918 में ही हिंदी को राजभाषा बनाने का मुद्दा उठ चुका था। तब गांधी जी ने हिंदी साहित्य सम्मेलन में यह कहते हुए इस मुद्दे को उठाया था कि हिंदी जनमानस की भाषा है इसलिए इसे राजभाषा बनाया जाए। भारतीय संविधान के भाग 17 के अनुच्छेद 343(1) में कहा गया है कि संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी होगी। संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतरराष्ट्रीय होगा।

बात अंकों की निकली है तो एक दिलचस्प जानकारी शेयर करते चलें। आपने देखा होगा कि कुछ लोग अपनी टू व्हीलर और फोर व्हीलर गाडि़यों की नंबर प्लेट में हिंदी अंकों का प्रयोग करते हैं। यह मान्य नहीं है। चलते-चलते यह भी बताते चलें कि इण्डिया नाम कहां से आया ? इसकी उत्पत्ति इण्डस (सिंधु) शब्द से हुई है जो यूनानियों द्वारा चौथी सदी ईसा पूर्व से प्रचलन में है।

बहरहाल हिंदी के बारे में इतना ही कह सकते हैं, 'एकता की जान है, हिदी देश की शान है...'

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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