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ईरान के साथ रिश्तों की नई इबारत

Wed, 25 May 2016 03:26 PM IST
मनोज जोशी
मनोज जोशी Updated Wed, 25 May 2016 03:26 PM IST
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 A new chapter of relations with Iran
मनोज जोशी

सोमवार को भारत एवं ईरान ने चाबहार बंदरगाह और उससे जुड़े इन्फ्रास्ट्रक्चर के विकास के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किया। इसके लिए भारत ने 50 करोड़ डॉलर के निवेश की पेशकश की है। उसी दिन बाद में भारत ने परिवहन और पारगमन मार्गों के विकास के लिए ईरान और अफगानिस्तान के साथ एक त्रिपक्षीय समझौते पर हस्ताक्षर किया। यह लंबे समय से देरी से चल रही प्रक्रिया की शुरुआत भर है, जिसके चलते भारत और ईरान के बीच सामरिक भागीदारी के साथ-साथ व्यापार, निवेश और संपर्क पर आधारित आर्थिक संबंधों का विकास होगा। भारत का महत्वाकांक्षी लक्ष्य बांदर अब्बास और चाबहार जैसे ईरानी बंदरगाहों के जरिये संपर्क मार्ग विकसित करने से लेकर रूस द्वारा प्रस्तावित उत्तर-दक्षिण परिवहन कॉरीडोर को उसके बाल्टिक बंदरगाह से जोड़कर हिंद महासागर में मिलाना है। इस तरह से भारत चाबहार एवं बांदर अब्बास को एक मुक्त व्यापार क्षेत्र के रूप में स्थापित करना चाहता है, ताकि भारतीय उद्योगपति और व्यवसायी सीधे ईरान और आसपास के अन्य बाजारों तक पहुंच बनाने में सक्षम हो सकें।

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ईरान एक विस्तृत भूराजनीतिक और आर्थिक अवसर प्रदान कर रहा है। पिछले एक दशक से अमेरिकी नेतृत्व में प्रतिबंधों का मारा ईरान विकास कार्यों में निवेश करने के लिए कंपनियों की तलाश कर रहा है। कई भारतीय कंपनियां वहां पहले ही हैं, लेकिन वे प्रतिबंधों के हटने की प्रतीक्षा कर रही थीं। चीन की कंपनियां साहसी रही हैं और उन्होंने प्रतिबंध के दौरान वहां व्यवसाय किया और वे चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की यात्रा के दौरान विकसित हुई बेहतर भावनाओं का लाभ उठाने की उम्मीद कर रहे हैं, जब दोनों देशों ने 'एक क्षेत्र-एक मार्ग' पहल के तहत विकास और संपर्क मार्गों के व्यापक समझौतों पर हस्ताक्षर किया था। इसी वर्ष की शुरुआत में चीन से पहली ट्रेन तेहरान पहुंची, जिसने बंदरगाह के जरिये सामान के पहुंचने की अवधि में चौदह दिनों की कटौती की।
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भारत का सबसे महत्वपूर्ण उद्यम चाबहार बंदरगाह के जरिये संपर्क मार्ग के क्षेत्र में है, जिससे मुंबई एवं कांदला के बंदरगाहों को जोड़ने की उम्मीद है। भारत ईरानी रेल एवं सड़क ढांचों के विकास के लिए भी निवेश करेगा, ताकि जाहेदान को अफगान सीमा और फिर अफगान से जोड़ा जा सके। अफगानी शहर जारंज चाबहार से 883 किलोमीटर दूर है और वहां से भारत द्वारा निर्मित डेलारम के लिए एक सड़क है, जो अफगानिस्तान के चार बड़े शहरों-हेरात, कांधार, काबुल और मजार-ए-शरीफ को जोड़ने वाली सर्कुलर रोड से मिलती है। इस तरह से भारत को अफगानिस्तान तक पहुंच बनाने के लिए इस्लामाबाद के साथ संपर्क की जरूरत नहीं पड़ेगी। इससे ईरान के दक्षिण-पूर्वी अविकसित क्षेत्र के विकास को तो बढ़ावा मिलेगा ही, मध्य एशियाई गणराज्यों के साथ भारत के संपर्क की संभावनाएं पैदा होंगी। जाहिर है, इसके लिए भारी निवेश की जरूरत पड़ेगी। एक अनुमान के मुताबिक, इसके लिए आठ अरब डॉलर की जरूरत होगी, लेकिन इसमें भारत, रूस और ईरान की साझेदारी हो सकती है।
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हमें नहीं भूलना चाहिए कि दक्षिण एशिया और यूरोप के बीच सेतु का काम करने वाले बेहतर भौगोलिक स्थिति के अलावा ईरान एक बड़ा तेल निर्यातक देश है। निर्यात के अलावा ईरान को अपने जर्जर तेल उद्योग के उन्नयन के लिए निवेश की भी तलाश है। भारतीय कंपनी ओएनजीसी विदेश इस क्षेत्र में सक्रिय है, लेकिन प्रतिबंध के कारण कुछ खास नहीं कर पाई है। लेकिन अब, जबकि प्रतिबंध हट गया है, उम्मीद करनी चाहिए कि चतुर ईरानी भारत को व्यावहारिक विकल्प दे और चीन के खिलाफ हमारा इस्तेमाल न करे।

 असली चुनौती परियोजनाओं के क्रियान्वयन की है। जैसा कि हम जानते हैं, घरेलू स्तर पर भारत का रिकॉर्ड बहुत खराब है। इस बात को काफी अरसा बीत गया, जब एनबीसीसी, इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट ऑफ इंडिया, इंजीनियर्स इंडिया जैसे सार्वजनिक उपक्रम बेहतर काम करते थे। अब सरकार राज्य के स्वामित्व वाले जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट और कांदला पोर्ट ट्रस्ट से इक्विटी भागीदारी के साथ विशेष प्रयोजन संस्था बनाने पर विचार कर रही है। भारत को इस परियोजना की तात्कालिकता और इसके सामरिक महत्व को समझने की जरूरत है। इसे उदासीनता से प्रबंधित दो सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के ऊपर छोड़ देना अच्छा नहीं होगा। इसे तेजी से पूरा करने के लिए बेहतर होगा कि भारत दक्षिण कोरिया जैसी कुछ अंतरराष्ट्रीय महाशक्ति के साथ अनुबंध करे। लेकिन इसके लिए पीएमओ स्तर पर विशेष परियोजना प्रबंधन की स्थापना करनी होगी, ताकि यह सुनिश्चित हो कि सबकुछ ठीक-ठाक चल रहा है।

चाबहार सिर्फ संपर्क मार्ग के लिए ही नहीं, बल्कि सामरिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। यह पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से काफी नजदीक है, जिसका प्रबंधन चीन करता है। फारस की खाड़ी के ठीक बाहर स्थित यह बंदरगाह उन पोतों की निगरानी कर सकता है, जो भारत के तेल आयात का साठ फीसदी इस क्षेत्र से लाता है। सागर के पार भारत से करीब एक और देश है- ओमान।

लंबे समय से भारत इस क्षेत्र में कई समस्याओं (अरब-इस्राइल समस्या, सऊदी-ईरान टकराव, ईरान-इराक झगड़ा) के भय से सावधानी से कदम उठाता रहा है। लेकिन अब समय आ गया है कि नई दिल्ली ज्यादा मुखर रवैया अपनाए, क्योंकि हमारे व्यापक हित इससे अभी जुड़े हैं और उनकी संभावनाएं हैं। जैसे, तेल और गैस के अलावा 70 लाख भारतीय नागरिक भी इस क्षेत्र में हैं, जो 40 अरब डॉलर भारत भेजते हैं।


जिन संभावनाओं के दोहन की हमें जरूरत है और जिन्हें प्रधानमंत्री मोदी कर रहे हैं, वे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर और ईरान जैसे देशों के साथ करीबी रिश्ता बनाना हैं। इन देशों के पास भारी मात्रा में राज्य स्वामित्व वाले निवेश कोष हैं, जिनका फायदा भारत अपने इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के लिए उठा सकता है। भारतीय व्यवसायी, आईटी प्रोफेशनल्स, कंपनियां और श्रमिक इन देशों की अर्थव्यवस्था को तेल पर निर्भरता खत्म करने में मदद कर सकते हैं।

-ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के प्रतिष्ठित रिसर्च फैलो

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