जैव विविधता पार्क से हवा और जल होंगे प्रदूषण मुक्त, दो पार्क तैयार, पांच पर चल रहा काम
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जैव विविधता पार्क की श्रृंखला के सहारे दिल्ली के वायु व जल प्रदूषण का बेहतर समाधान हो सकता है। नम भूमियां ही एक ऐसा ठोस विकल्प है, जिससे यमुना दिल्ली के नालों से बंधन मुक्त हो जाएगी। दक्षिणी दिल्ली की नीला हौज झील को इस मॉडल पर प्रदूषण मुक्त भी किया गया है। एनजीटी ने भी कुछ माह पूर्व आदेश दिया था कि यमुना जैव विविधता पार्क के मॉडल पर काम करते हुए गंगा, यमुना व हिंडन सहित पांच नदियों को निर्मल-अविरल बनाया जाए। इस दिशा में नजफगढ़ ड्रेन के लिए योजना भी तैयार हो रही है। वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार भी हिंडन नदी पर इस मॉडल आजमाएगी।
दिल्ली में दो तरह का लाइफ सर्पोटिंग सिस्टम काम करता है। पहला है यमुना नदी, जिसका महज 2 फीसदी हिस्सा दिल्ली में बहता है, लेकिन पूरी यमुना का करीब 70 फीसदी प्रदूषण इसी क्षेत्र में होता है। दूसरा है दिल्ली रिज, जिसके 7,777 एकड़ क्षेत्र पर जैव विविधता बेहद कम है। इसके 60 फीसदी हिस्से पर एक ही प्रजाति के विलायती कीकर का कब्जा है, जिसने रिज के पारिस्थितिकी तंत्र के स्तर पर मिलने वाली सारी सुविधाओं को कमजोर किया है।
एक याचिका की सुनवाई में कुछ महीने पहले एनजीटी ने आदेश दिया था कि गंगा, यमुना, हिंडन, काली व कृष्णा नदी का पुनर्जीवित करने के लिए यमुना जैव विविधता पार्क के मॉडल पर काम किया जाए। इसका सीधा मतलब था कि नदियों को प्रदूषित करने वाले स्रोतों को रचनात्मक नम भूमियों के सहारे शोधित किया जाए। यमुना जैव विविधता पार्क के इंचार्ज फैय्याज खुदसर बताते हैं कि नम भूमियां नदियों की नर्सरी के तौर पर काम करती हैं। बाढ़ के अतिरिक्त पानी को यह अपने पास बचाकर रखती हैं। सूखा होने पर इसका पानी नदी के स्तर को सामान्य रखने में मददगार होता है। साथ ही, नम भूमियां जल की गंदगी को भी साफ करती हैं।
रचनात्मक नम भूमियां प्राकृतिक तौर पर साफ करती गंदा पानी
विशेषज्ञ बताते हैं कि नालों के पानी को साफ करने के लिए लगने वाले वाटर ट्रीटमेंट प्लांट पर करीब 1 करोड़ रुपये खर्च होता है, जबकि नम भूमियों का निर्माण ढाई से 3 लाख रुपये में हो जाता है। इसके लिए सबसे पहले नाले के पानी के लिए ऑक्सीडेशन टैंक बनाते हैं। यहां सारी पानी जमा होता है, जिससे जल प्रदूषण के स्तर में सुधार होता है। आगे इस पानी को एक चैनल से गुजारते हैं। इसमें पत्थरों के बड़े-बड़े टुकड़े होते हैं। पानी पत्थरों से टकराता हुआ आगे बढ़ता है, जिससे उसके टीडीएस आदि में सुधार आता है। फिर नदी की तलहटी जैसी एक बड़ी नम भूमि बनाई जाती है। इसमें नरकट, बेशरम, पटेरा जैसी करीब 40 प्रजातियों के पौधे लगे होते हैं। आगे जरूरत के हिसाब से पांच-सात नम भूमियां तैयार होती हैं। इसमें से गुजरता हुआ पानी नदी में मिलने से पहले बिल्कुल स्वच्छ हो जाता है। एनजीटी के आदेश पर दिल्ली में नजफगढ़ ड्रेन व उत्तर प्रदेश सरकार की हिंडन पर इसी मॉडल काम करने की योजना है। उत्तर प्रदेश सरकार के सूत्र बताते हैं कि उसके अधिकारियों की यमुना बॉयोडायवर्सिटी पार्क के विशेषज्ञों के साथ इस मसले पर कई बार चर्चा भी हुई है। फिलहाल पूरे पोजेक्ट की डीपीआर तैयार की जानी है।
2 पार्क तैयार, 5 पर चल रहा काम
दिल्ली में 457 एकड़ में फैला यमुना बॉयोडायवर्सिटी पार्क व करीब 692 एकड़ में फैला अरावली बॉयोडायवर्सिटी पार्क तैयार हो गया है। इसमें अलग-अलग प्रजाति के करीब 1000 पौधे व जंतुओं की करीब 2000 प्रजाति हैं। इसके अलावा तुगलकाबाद, तिलपत वैली, नीला हौज, कमला नेहरू व दक्षिणी दिल्ली बॉयोडायवर्सिटी पार्क पर काम चल रहा है। सभी पार्कों के तैयार होने पर दिल्ली में जैव विविधता पार्कों का दायरा करीब 2 हजार एकड़ हो जाएगा।
लैंटाना व कीकर ने बिगाड़ी दिल्ली रिज की सूरत
दिल्ली रिज की सबसे बड़ी दिक्क्त लैंटाना व कीकर हैं। रिज के 60 फीसदी हिस्से को इन दोनों ने कवर कर रखा है। विलायती कीकर का न सिर्फ जल बजट खराब है, बल्कि जमीन पर फैलने वाली लैंटाना के साथ मिलकर इसने पूरे पारिस्थितिकी तंत्र का कमजोर कर रखा है। वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी का कहना है कि दिल्ली सरकार ने 2017-18 में इसे हटाने के लिए बजटीय प्रावधान किया है, लेकिन इस दिशा में कोई ठोस प्रगति नहीं हो सकी है। इसका प्रस्ताव तैयार कर दिल्ली सरकार के पास भेजा गया है। सरकार ने अभी तक इसे मंजूरी नहीं मिली है।