आखिर दूसरी बार राज्यपाल ने नेता सदन को क्यों लिखा पत्र?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सदन में 18 मार्च को भाजपा और नौ कांग्रेस विधायकों के राजभवन पहुंच सरकार के अल्पमत में आने के दावे के बाद राजभवन ने सरकार को दो बार विश्वास मत हासिल करने के लिए पत्र लिखा। घटनाक्रम के अगले दिन 19 मार्च को राज्यपाल ने नेता सदन हरीश रावत को पत्र लिखकर 28 मार्च तक विश्वास मत हासिल करने के लिए कहा।
ऐसा करने की वजह राजभवन ने यह बताई है कि इसी दिन विधानसभा अध्यक्ष ने सदन आहूत करने के लिए तय किया था और सरकार को सूट भी करता था। जबकि 20 मार्च को दोबारा नेता सदन को पत्र भेजकर जितना जल्द हो सके, विश्वास मत हासिल करने को कह दिया। आखिर दूसरी बार पत्र भेजने का क्या कारण रहा? यह राज्यपाल के संदेश में स्पष्ट नहीं है।
28 मार्च को सदन आहूत करने का विधानसभा अध्यक्ष ने जो निर्णय लिया था, वह सरकार की रणनीति के हिसाब से बिल्कुल सही थी। यह तिथि हरीश रावत सरकार के पक्ष में इसलिए दिख रही थी, क्योंकि इस बीच नौ बागियों के खिलाफ दल बदल कानून के तहत कार्यवाही का पर्याप्त समय मिल जाता।
दोबारा राजभवन से पत्र जाने पर है बड़ा सवाल
दल बदल कानून के तहत बागी विधायकों से जवाब तलब करने के लिए सात दिन का नोटिस देना होता है। ऐसे में जो बागी विधायकों को मुख्य सचेतक ने नोटिस दिया, उसकी अवधि 26 मार्च तक पूरी हो रही है। इसके बाद मुख्य सचेतक बागियों की सदस्यता को लेकर विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष कार्रवाई के लिए भेज सकता है।
28 मार्च और कार्रवाई के बीच दो दिन का समय सरकार को मिल जाता। ऐसे में बागियों पर वापसी का दबाव रहता। सरकार की इस गणना को तब और बल मिला, जब राज्यपाल ने विश्वास मत के लिए 28 मार्च तक की समय अवधि दे दी। राजभवन ने इसका कारण भी साफ किया कि उस दिन सत्र आहूत होना तय किया गया था।
बुधवार को राज्यपाल ने जो संदेश जारी किया, उसमें दो बार नेता सदन को विश्वास मत के लिए पत्र भेजने का जिक्र है। ऐसे में 19 मार्च के बाद 20 मार्च को पत्र भेजने की वजहें सियासी सुगबुगाहट को तेज कर रही हैं। दोबारा राज्यपाल के भेजे पत्र में विश्वास मत जल्द से जल्द लेने का उल्लेख है।
इससे यह सवाल उठा खड़ा हो रहा है कि कहीं 28 मार्च की पहले दी डेडलाइन को बदलने के संकेत के रूप में राज्यपाल ने दूसरी बार पत्र तो नहीं लिखा। अगर ऐसा होता तो सरकार की बहुमत साबित करने की प्लानिंग को झटका भी लग सकता था।
28 मार्च को फिट बैठता है सरकार का गणित
सदन में 18 मार्च को हुए हंगामे के दिन विनियोग विधेयक पर अगर वोटिंग होती तो सरकार अल्पमत में आ जाती। भाजपा और नौ बागी कांग्रेस विधायकों का 35 का जोड़ था, जबकि दो सदस्य अनुपस्थित थे।
अब 28 मार्च को सरकार दल बदल कानून के तहत अगर नौ बागियों की सदस्यता समाप्त करने की कार्रवाई करवा ले जाती है तो स्थिति सरकार के पक्ष में आ सकती है।
भाजपा के 28 विधायक हैं, जबकि सरकार के साथ मौजूदा स्थिति में पीडीएफ और बसपा को मिलाकार 33 सदस्य हैं। ऐसे में अगर बसपा का भी साथ छूटता है तो भी सरकार बहुमत में रहेगी।