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Hindi News ›   City & states ›   The police have not registered an FIR even after a month.

एक महीने बाद भी पुलिस ने दर्ज नहीं की एफआईआर

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 30 Jul 2026 01:00 AM IST
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ब्लड बैंक गबन मामले में स्वास्थ्य विभाग को एफआईआर दर्ज कराने की सिफारिश किए एक माह से अधिक समय बीत चुका है लेकिन पुलिस अब तक मामला दर्ज नहीं कर सकी। सवाल यह है कि क्या पुलिस इतने समय में सिविल सर्जन कार्यालय से आवश्यक दस्तावेज भी एकत्र नहीं कर पाई या फिर दस्तावेज अब तक सौंपे ही नहीं गए। तीन साल तक गबन चलता रहा फिर भी ऑडिट और विभागीय निगरानी में गड़बड़ी क्यों नहीं पकड़ी गई। पहली जांच में लेखाकार को क्लीन चिट और दूसरी जांच में दोषी पाए जाने से भी जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
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कार्रवाई न करने के पीछे पुलिस का तर्क-
पुलिस का कहना है कि पहले सभी संबंधित दस्तावेजों को कब्जे में लेकर उनका परीक्षण किया जाएगा। इसके बाद उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पूरे मामले की गहन जांच पूरी की जाएगी। जांच में जो भी तथ्य सामने आएंगे, उनके अनुसार नियमानुसार आगे की कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
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इन सवालों के अभी नहीं मिले जवाब
- पहली जांच में लेखाकार को क्लीन चिट कैसे मिल गई जबकि दूसरी जांच में वह दोषी मिला।

- क्या पुलिस के ऊपर कार्रवाई न करने का दबाव है जिसकी वजह से पुलिस अपने आप को बचा रही है।
- तीन किलोमीटर दूर स्थित सिविल सर्जन कार्यालय से एक महीने में पुलिस दस्तावेज क्यों नहीं ला पाई
- क्या हर साल होने वाले ऑडिट के दौरान यह गड़बड़ी पकड़ में नहीं आई। यदि आई तो क्या उसे दबाया गया।
- क्या इस मामले में अन्य अधिकारियों भी है जिनको बचाने के प्रयास में कार्रवाई करने से बचा जा रहा है

28 जून को किया था खुलासा
संवाद न्यूज एजेंसी ने अमर उजाला में 28 जून को प्रकाशित दान का खून बेचकर 19 लाख का कर दिया गया गबन शीर्षक से समाचार प्रकाशित किया था। इसमें बताया गया था किस प्रकार लेखाकार ने तीन साल तक 19 लाख रुपये से अधिक रुपये का गबन किया। इस मामले में दो अलग-अलग जांच हुई थी। जांच में सामने आया था कि 2023-24 में प्राप्त 10 लाख 97 हजार 700 रुपये में से केवल 82 हजार 500 रुपये जमा करवाए गए। इसी प्रकार 2024-25 में प्राप्त 7 लाख 34 हजार 700 रुपये में से केवल 2 लाख 37 हजार 600 रुपये और 2025-26 में प्राप्त 5 लाख 90 हजार 600 रुपये में से केवल एक लाख 98 हजार 100 रुपये ही जमा करवाए गए थे।
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