सामाजिक दायित्व का बोध करा गया 'भगत'
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शनिवार को अपराह्न चार बजे छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने स्थानीय परंपरागत शैली नाचा गम्मत विधा के जरिए माया के परीक्षा नाटक की प्रस्तुति किया। मलिक राम साहू के निर्देशन में चिन्हारी जन शिक्षा एवं संस्कृति बिलासपुर छत्तीसगढ़ के कलाकारों ने इस नाटक में नाचा गम्मत वाद्ययंत्र के साथ नाच-गाना हास्य आदि का प्रयोग कर जीवन के सच को उकेरा, जिसमें कोई किसी का नहीं है।
इसी क्रम में, मध्यप्रदेश, ग्वालियर से आए परिवर्तन समूह के कलाकारों ने जफर संजरी के निर्देशन में दिल्ली दरबार की प्रस्तुति की। पारसी विधा से प्रस्तुत इस नाट्य में अन्याय के बीच न्याय की लड़ाई को प्रदर्शित किया गया, जिसमें अंत में सत्य की जीत होती है। शाम साढ़े छह बजे के करीब भगत विधा में रंगलीला आगरा के कलाकारों ने अनिल शुक्ल के निर्देशन में संगत कीजै साधु की प्रस्तुति की। इसमें कलाकारों ने दर्शकों को बताया कि हर व्यक्ति का कर्तव्य बनता है कि वह समाज के उत्थान के बारे में सोचे। अंत में आठ बजे के करीब सत्य हरिश्चंद्र नौटंकी की प्रस्तुति की गई।
कानपुर की अग्रवाल एवं दल के कलाकारों ने नौटंकी विधा में प्रस्तुति कर स्पष्ट कर दिया कि सत्य पराजित नहीं होता, जीत उसी की होती है। इससे पूर्व, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के आदिवासियों के नृत्य को सीधी मध्यप्रदेश से आए इंद्रावती नाट्य समिति के कलाकारों ने पेश किया। सभी मंचन ने दर्शकों के दिल पर छाप छोड़ी।
जजी मैदान में आयोजित देशज में शनिवार को विभिन्न विधाओं की चार नाटक की प्रस्तुति अलग-अलग प्रांतों के कलाकारों ने की। इसमें सच की जीत, न्याय की लड़ाई और समाजिकता की झलक देखने को मिली।
छत्तीसगढ़ की चिन्हारी जन शिक्षा एवं संस्कृति समिति के कलाकारों ने नाचा गम्मत शैली में माया की परीक्षा नाटक की प्रस्तुति किया। इसके कथानक में स्वार्थ की झलक देखने को मिली। कहानी में किसान का बेटा मरने का नाटक करता है। उसे जिंदा करने के बदले साधू एक सदस्यों को मरने को कहता है लेकिन कोई तैयार नहीं होता। इससे युवक को पता चलता है कि दुनिया स्वार्थ की है। नाचा गम्मत वाद्य यंत्र से नाच गाने के साथ कलाकारों ने इसका मंचन किया।
वहीं, दिल्ली दरबार में पारसी थिएटर के जरिए कलाकरों ने न्याय की लड़ाई की पेशकश की। इसमें शाहजहां के दो पुत्रों में बड़ा शेरवानी और छोटा जलाल आलम शमशीर है, एक पुत्री जहांआरा है। महिलाओं के रहने वाले स्थान जहां पुरूष प्रवेश वर्जित, एक दिन जहांआरा सो रही थी। तभी सांप उनके सीने पर जाकर बैठ गया। एक दासी ने देखा तो वह डर गई, दासी ने अपने मंगेतर आजम को शहजादी की जान बचाने को बुलाया।
पुरूष निषेध होने के बाद भी आजम वहां पहुंचकर शहजादी की जान बचाता है। लेकिन बदले में जहांआरा अपने बड़े भाई को बुलाकर आजम को सजा देने के लिए कहती है। आजम पर नियम तोडने का आरोप लगता है। लेकिन जहांआरा का छोटा भाई आजम के पक्ष में रहता है। इसको लेकर न्याय अन्याय की जंग छिड़ती है। बाद में पता चलता है कि बड़ा भाई ही बहन की जान लेना चाहता है। इस दौरान छोटा भाई तख्त पलटकर पिता की गद्दी संभाल लेता है।
वह न्याय करता है। इस दौरान वह बड़े भाई को मौत की सजा सुनाता है, आजम को बरी कर देता है। जहांआरा भी छोटे भाई के साथ होती है।