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बारिश की कमी ने बढ़ाई किसानों की चिंता, धान की खेती हुई महंगी
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बादली। पर्याप्त बारिश न होने से क्षेत्र में धान की खेती करने वाले किसानों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। बारिश की कमी के कारण खेतों की मिट्टी सूखने लगी है और कई जगहों पर दरारें पड़ गई हैं। धान की रोपाई और फसल को बचाने के लिए किसानों को लगातार सिंचाई करनी पड़ रही है। इस बार नहरों में भी पानी ना के बराबर आया है, जिसके चलते किसानों को ट्यूबवेल, बोरिंग और पंपसेट के सहारे खेतों की सिंचाई करनी पड़ रही है।
बार-बार सिंचाई करने से बिजली और डीजल से चलने वाले पंपसेटों के कारण किसानों का खर्च भी बढ़ रहा है। निजी सिंचाई व्यवस्था या किराए के पंप पर निर्भर छोटे किसानों की परेशानी और अधिक बढ़ गई है। पानी की कमी का असर धान की नर्सरी पर भी पड़ रहा है। पर्याप्त पानी नहीं मिलने के कारण नर्सरी में तैयार धान का बिचड़ा पीला पड़ने के साथ सूखने लगा है।
किसानों का कहना है कि पिछले साल बारिश के कारण सिंचाई पर कम खर्च करना पड़ा था, लेकिन इस बार फसल को बचाने के लिए बार-बार पानी देना पड़ रहा है। इससे प्रति एकड़ खेती की लागत करीब 70 रुपए तक बढ़ गई है और किसानों को उत्पादन से अपेक्षित लाभ मिलने की उम्मीद कम हो गई है। किसानों को अब अच्छी बारिश का इंतजार है, ताकि फसल को पर्याप्त पानी मिल सके और बढ़ती सिंचाई लागत से राहत मिल सके।
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पांच एकड़ में धान की फसल लगाई है। लगातार सिंचाई, डीजल और अन्य कृषि कार्यों पर करीब दो लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। बारिश नहीं होने से बार-बार सिंचाई करनी पड़ रही है। लागत लगातार बढ़ रही है और अब फसल से अच्छा लाभ मिलने की उम्मीद कम है।- राणा, किसान गुभाना।
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पिछले साल के मुकाबले इस बार बारिश काफी कम हुई है। महंगे डीजल और बिजली की अधिक खपत के कारण खेती की लागत बढ़ गई है। बढ़ते खर्च के कारण मैंने करीब दो एकड़ में धान की फसल की देखरेख बंद कर दी है।- प्रदीप, गुभाना।
पिछले साल अच्छी बारिश हुई थी, इसलिए उसी अनुमान के आधार पर इस बार 15 एकड़ में धान की फसल लगाई थी लेकिन इस बार बारिश कम हुई और नहर में भी पानी ना के बराबर आया। अब लगातार सिंचाई करनी पड़ रही है, जिससे खर्च बढ़ गया है और फसल से लाभ होने की गुंजाइश कम हो गई है।- महाबीर, किसान बूपनियां।
फोटो नंबर 71 :बिना पानी के खेतों में खड़ी धान की फसल। (संवाद)
फोटो नंबर 72 : राणा, किसान गुभाना।
फोटो नंबर 73: प्रदीप, गुभाना।
फोटो नंबर 74: महाबीर, किसान बूपनियां।
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बार-बार सिंचाई करने से बिजली और डीजल से चलने वाले पंपसेटों के कारण किसानों का खर्च भी बढ़ रहा है। निजी सिंचाई व्यवस्था या किराए के पंप पर निर्भर छोटे किसानों की परेशानी और अधिक बढ़ गई है। पानी की कमी का असर धान की नर्सरी पर भी पड़ रहा है। पर्याप्त पानी नहीं मिलने के कारण नर्सरी में तैयार धान का बिचड़ा पीला पड़ने के साथ सूखने लगा है।
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किसानों का कहना है कि पिछले साल बारिश के कारण सिंचाई पर कम खर्च करना पड़ा था, लेकिन इस बार फसल को बचाने के लिए बार-बार पानी देना पड़ रहा है। इससे प्रति एकड़ खेती की लागत करीब 70 रुपए तक बढ़ गई है और किसानों को उत्पादन से अपेक्षित लाभ मिलने की उम्मीद कम हो गई है। किसानों को अब अच्छी बारिश का इंतजार है, ताकि फसल को पर्याप्त पानी मिल सके और बढ़ती सिंचाई लागत से राहत मिल सके।
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पांच एकड़ में धान की फसल लगाई है। लगातार सिंचाई, डीजल और अन्य कृषि कार्यों पर करीब दो लाख रुपये खर्च हो चुके हैं। बारिश नहीं होने से बार-बार सिंचाई करनी पड़ रही है। लागत लगातार बढ़ रही है और अब फसल से अच्छा लाभ मिलने की उम्मीद कम है।- राणा, किसान गुभाना।
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पिछले साल के मुकाबले इस बार बारिश काफी कम हुई है। महंगे डीजल और बिजली की अधिक खपत के कारण खेती की लागत बढ़ गई है। बढ़ते खर्च के कारण मैंने करीब दो एकड़ में धान की फसल की देखरेख बंद कर दी है।- प्रदीप, गुभाना।
पिछले साल अच्छी बारिश हुई थी, इसलिए उसी अनुमान के आधार पर इस बार 15 एकड़ में धान की फसल लगाई थी लेकिन इस बार बारिश कम हुई और नहर में भी पानी ना के बराबर आया। अब लगातार सिंचाई करनी पड़ रही है, जिससे खर्च बढ़ गया है और फसल से लाभ होने की गुंजाइश कम हो गई है।- महाबीर, किसान बूपनियां।
फोटो नंबर 71 :बिना पानी के खेतों में खड़ी धान की फसल। (संवाद)
फोटो नंबर 72 : राणा, किसान गुभाना।
फोटो नंबर 73: प्रदीप, गुभाना।
फोटो नंबर 74: महाबीर, किसान बूपनियां।