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चुनावी पोस्टर में पति मेन हीरो पत्नी सिर्फ कागजी उम्मीदवार
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धर्मशाला। पंचायती राज चुनाव की दस्तक के साथ ही प्रचार का एक ऐसा ट्रेंड चल रहा है, जिसने महिला सशक्तीकरण के दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। धर्मशाला के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे संभावित महिला प्रत्याशियों के पोस्टरों में उनके पति मेन हीरो की भूमिका में नजर आ रहे हैं।
इन पोस्टरों में महिला उम्मीदवार की तस्वीर किसी कोने में छोटी सी लगी है, जबकि उनके पति की फोटो प्रमुखता के साथ काफी बड़े आकार में दिखाई जा रही है। इससे ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो पत्नी सिर्फ एक कागजी उम्मीदवार है और असली कमान पति के हाथों में ही रहेगी। इस पोस्टर कल्चर को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लोग जमकर मजे ले रहे हैं।
फेसबुक और व्हाट्सएप ग्रुप्स में यूजर्स ने कमेंट करते हुए लिखा है कि ‘पोस्टर देख कर यह समझना मुश्किल है कि चुनाव प्रत्याशी लड़ रही है या उनके पति।’ कुछ लोगों ने इसे आरक्षण की मूल भावना का मजाक बताया है। ट्रोलिंग का असर यह हुआ कि कई संभावित प्रत्याशियों को अपनी डिजिटल पोस्ट हटानी पड़ी है या उनमें बदलाव करना पड़ा है।
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उल्लेखनीय है कि पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने का उद्देश्य उन्हें नेतृत्व के लिए स्वतंत्र पहचान देना था। लेकिन पोस्टरों में पतियों की यह चौधर बताती है कि धरातल पर आज भी प्रधान-पति वाली मानसिकता हावी है। जानकार मानते हैं कि जब तक महिला प्रत्याशी खुद पोस्टर और निर्णयों में प्रमुखता से सामने नहीं आएंगी, तब तक असली सशक्तिकरण केवल कागजों तक ही सीमित रहेगा।
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इन पोस्टरों में महिला उम्मीदवार की तस्वीर किसी कोने में छोटी सी लगी है, जबकि उनके पति की फोटो प्रमुखता के साथ काफी बड़े आकार में दिखाई जा रही है। इससे ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो पत्नी सिर्फ एक कागजी उम्मीदवार है और असली कमान पति के हाथों में ही रहेगी। इस पोस्टर कल्चर को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लोग जमकर मजे ले रहे हैं।
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फेसबुक और व्हाट्सएप ग्रुप्स में यूजर्स ने कमेंट करते हुए लिखा है कि ‘पोस्टर देख कर यह समझना मुश्किल है कि चुनाव प्रत्याशी लड़ रही है या उनके पति।’ कुछ लोगों ने इसे आरक्षण की मूल भावना का मजाक बताया है। ट्रोलिंग का असर यह हुआ कि कई संभावित प्रत्याशियों को अपनी डिजिटल पोस्ट हटानी पड़ी है या उनमें बदलाव करना पड़ा है।
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उल्लेखनीय है कि पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने का उद्देश्य उन्हें नेतृत्व के लिए स्वतंत्र पहचान देना था। लेकिन पोस्टरों में पतियों की यह चौधर बताती है कि धरातल पर आज भी प्रधान-पति वाली मानसिकता हावी है। जानकार मानते हैं कि जब तक महिला प्रत्याशी खुद पोस्टर और निर्णयों में प्रमुखता से सामने नहीं आएंगी, तब तक असली सशक्तिकरण केवल कागजों तक ही सीमित रहेगा।