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शहीद के बच्चों को मिलने वाली सुविधाओं पर सेना छह सप्ताह में ले फैसला : हाईकोर्ट
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कारगिल युद्ध में शहीद हुए सैनिक के बच्चों को मिलने वाली सुविधाओं के संबंध में सेना के अधिकारियों को छह सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की एकलपीठ ने शहीद की पत्नी विमलेश देवी की याचिका पर दिया।
मेरठ के कैंट निवासी विमलेश देवी ने अपने तीन बच्चों को सेना की छात्रवृत्ति व अन्य सुविधाएं दिलाए जाने की मांग को लेकर याचिका दाखिल की थी।
याची की ओर से अधिवक्ता ने दलील दी कि विमलेश देवी के पति सतीश कुमार वर्ष 1999 में ऑपरेशन विजय और ऑपरेशन रक्षक के दौरान कारगिल में शहीद हो गए थे। सरकार ने उन्हें मरणोपरांत सेना मेडल से सम्मानित किया था। उस समय याची की कोई संतान नहीं थी। पेंशन आदेश में स्पष्ट प्रावधान था कि यदि शहीद की पत्नी उसी परिवार में पुनर्विवाह करती है तो उसे सभी सुविधाओं का लाभ मिलता रहेगा। इसी आधार पर विमलेश देवी ने अपने देवर शिवकुमार से पुनर्विवाह किया। इसका प्रमाण पत्र भी सेना की ओर से जारी किया गया।
दूसरे विवाह से याची के तीन बच्चे हुए लेकिन सेना इन बच्चों को शहीद के आश्रितों को मिलने वाली सुविधाएं देने से इन्कार कर रहा है। सेना का कहना है कि बच्चों के जैविक पिता नहीं हैं। इसलिए वे पात्र नहीं हैं।
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कोर्ट ने सेना के संबंधित अधिकारी को निर्देश दिया कि याची की ओर से दिए गए प्रत्यावेदन पर विचार कर छह सप्ताह के भीतर कारण सहित निर्णय लिया जाए।
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मेरठ के कैंट निवासी विमलेश देवी ने अपने तीन बच्चों को सेना की छात्रवृत्ति व अन्य सुविधाएं दिलाए जाने की मांग को लेकर याचिका दाखिल की थी।
याची की ओर से अधिवक्ता ने दलील दी कि विमलेश देवी के पति सतीश कुमार वर्ष 1999 में ऑपरेशन विजय और ऑपरेशन रक्षक के दौरान कारगिल में शहीद हो गए थे। सरकार ने उन्हें मरणोपरांत सेना मेडल से सम्मानित किया था। उस समय याची की कोई संतान नहीं थी। पेंशन आदेश में स्पष्ट प्रावधान था कि यदि शहीद की पत्नी उसी परिवार में पुनर्विवाह करती है तो उसे सभी सुविधाओं का लाभ मिलता रहेगा। इसी आधार पर विमलेश देवी ने अपने देवर शिवकुमार से पुनर्विवाह किया। इसका प्रमाण पत्र भी सेना की ओर से जारी किया गया।
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दूसरे विवाह से याची के तीन बच्चे हुए लेकिन सेना इन बच्चों को शहीद के आश्रितों को मिलने वाली सुविधाएं देने से इन्कार कर रहा है। सेना का कहना है कि बच्चों के जैविक पिता नहीं हैं। इसलिए वे पात्र नहीं हैं।
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कोर्ट ने सेना के संबंधित अधिकारी को निर्देश दिया कि याची की ओर से दिए गए प्रत्यावेदन पर विचार कर छह सप्ताह के भीतर कारण सहित निर्णय लिया जाए।