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75 साल के हयात ने अकेले बनाई 9 किमी सड़क
नवीन भट्ट / अमर उजाला, रानीखेत (अल्मोड़ा)
Updated Fri, 05 Sep 2014 03:42 PM IST
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पहाड़ काटकर रास्ता बनाने वाले बिहार के दशरथ मांझी की तरह उत्तराखंड के हयात सिंह अब तक नौ किमी सड़क बनाकर सरकार के लिए नजीर पेश रहे हैं।
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रोज सुबह 8 बजे निकल जाते हैं घर से
उम्र है 75 साल और उनका काम है रास्ते बनाना। रोज सुबह 8 बजे सब्बल (लोहे की लंबी और नुकीली रॉड) और बेल्चा लेकर निकलते हैं। दोपहर तीन बजे तक शरीर का पसीना निचोड़कर जमीन खोदते हैं और तब कहीं साल-छह महीने में एक मार्ग तैयार होता है।
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जिस काम के लिए नेता जनता से वोट मांगते हैं, वो काम हयात सिंह अकेले अपने फौलादी इरादों के दम पर कर रहे हैं।
पणकोट गांव के हैं हयात सिंह। अब तक ढाई से तीन किलोमीटर लंबे चार रास्ते बना चुके हैं।
हर रास्ते की चौड़ाई करीब तीन से साढ़े तीन फीट है। लोक निर्माण विभाग से बेलदार पद से रिटायर इस बुजुर्ग ने नौकरी के बाद ही रास्ते बनाने का लक्ष्य तय किया और आज भी अपना मकसद पूरा करने को वह अकेले निकलते हैं।
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एक और खासियत यह कि अगर कहीं पर रास्ता खराब दिखाई दे तो वो उसे भी ठीक करने में जुट जाते हैं। शमशान घाट को जोड़ने वाला रास्ता उन्हीं की देन है। हवालबाग विकासखंड के अंतर्गत आने वाला पणकोट गांव रानीखेत से करीब 28 किमी दूर है।
मुख्य सड़क से गांव पहुंचने में दो किमी पैदल चलना पड़ता है। हयात सिंह बताते हैं कि जब रिटायर हुए तब आसपास के गांवों को जोड़ने के लिए छोटे-छोटे रास्तों का अभाव था। पुराने मार्ग क्षतिग्रस्त हो गए थे। चरवाहों के जंगल जाने के लिए तक रास्ते सही नहीं थे।
गांव के लोगों ने नेताओं से संपर्क मार्ग रास्ते बनाने की गुहार लगाई, लेकिन मार्ग बनने तो दूर, खराब रास्तों की हालत तक नहीं सुधारी गई। इसीलिए उन्होंने अकेले यह बीड़ा उठाया।
आज भी हयात सिंह रोज सुबह उठते हैं और नाश्ता करने के बाद आठ बजे बेल्चा, सब्बल पकड़कर मार्ग बनाने में जुट जाते हैं। इस कार्य के लिए उन्हें कहीं से भी किसी तरह का सहयोग नहीं है। उम्र के अंतिम पड़ाव में पहुंच चुके यह बुजुर्गवार कहते हैं कि अब अंतिम सांस तक इसी तरह रास्ते बनाता रहूंगा।
ये संपर्क मार्ग बनाए हैं
उजगल से केस्ता - तीन किमी
पणकोट-शमशानघाट मार्ग - दो किमी
पणकोट-जंगल मार्ग - डेढ़ किमी
पणकोट-चारढुंगा मार्ग - ढाई किमी
मांझी ने पहाड़ काटकर बनाया था रास्ता
दशरथ मांझी ‘माउंटेन मैन’ के तौर पर मशहूर हैं। वह बिहार के गया जिले के गहलौर गांव के रहने वाले थे। मांझी ने 1960 से लेकर 1982 के बीच 22 साल हथौड़ा और छेनी चलाकर पहाड़ का सीना चीरकर रास्ता बनाया था। गहलौर से अतरी और वजीरगंज ब्लाक के अस्पताल में जाने के लिए 80 किमी का सफर तय करना पड़ता था।
मांझी की पत्नी गिरकर घायल हो गयी थी। उन्हें समय पर उपचार नहीं मिल पाया, जिससे उनकी मौत हो गई। उनकी पत्नी जैसा दूसरे के साथ नहीं हो, इसके लिए मांझी ने गांव की पहाड़ी को चीरकर रास्ता बनाने ठान ली।
उन्होंने पहाड़ को चीरकर 360 फीट लंबा और 30 फीट चौड़ा रास्ता बना दिया। इसके बाद उनके गांव से अस्पताल की दूरी मात्र तीन किमी रह गई।