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1857 जंग से जुड़ा है खुर्जा का इतिहास
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1857 जंग से जुड़ा है खुर्जा का इतिहास
खुर्जा। पॉटरी नगरी के नाम से प्रसिद्ध खुर्जा का इतिहास हिंदुस्तान की पहली जंगे आजादी से जुड़ा है। 1857 की क्रांति के दौरान यह शहर क्रांतिकारियों की शरण स्थली बना हुआ था। दिल्ली के अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने भी यहां एक रात गुजारी थी।
सन 1857 की क्रांति के दौरान इसी शासक की तीसरी पीढ़ी के नवाब आजम अली खाँ की इजाजत से क्रांतिकारियों ने यहां शरणस्थली बनाया था। दरअसल अंग्रेजों को जब इस बात की भनक लगी कि आजादी के मतवाले यहां रुके हैं तो उन्होंने पूरे लाव-लश्कर के साथ किले को घेर लिया। ऐसे में आजम अली खाँ ने क्रांतिकारियों को सुरंगों के रास्ते सुरक्षित बाहर निकाल दिया और गोला-बारूद के साथ पहुँची अंग्रेज सेना अपना सा मुँह लिए लौट गई थी। इसका बदला लेने के लिए अंग्रेजों ने खुर्जा, बुलंदशहर, मथुरा तथा बांदा जनपद की सारी जागीरें जब्त कर लीं थी। ऐसे में आज भी खुर्जा में जंगे आजादी के कई निशान हैं जो उसकी याद दिलाते हैं।
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खुर्जा। पॉटरी नगरी के नाम से प्रसिद्ध खुर्जा का इतिहास हिंदुस्तान की पहली जंगे आजादी से जुड़ा है। 1857 की क्रांति के दौरान यह शहर क्रांतिकारियों की शरण स्थली बना हुआ था। दिल्ली के अंतिम मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने भी यहां एक रात गुजारी थी।
सन 1857 की क्रांति के दौरान इसी शासक की तीसरी पीढ़ी के नवाब आजम अली खाँ की इजाजत से क्रांतिकारियों ने यहां शरणस्थली बनाया था। दरअसल अंग्रेजों को जब इस बात की भनक लगी कि आजादी के मतवाले यहां रुके हैं तो उन्होंने पूरे लाव-लश्कर के साथ किले को घेर लिया। ऐसे में आजम अली खाँ ने क्रांतिकारियों को सुरंगों के रास्ते सुरक्षित बाहर निकाल दिया और गोला-बारूद के साथ पहुँची अंग्रेज सेना अपना सा मुँह लिए लौट गई थी। इसका बदला लेने के लिए अंग्रेजों ने खुर्जा, बुलंदशहर, मथुरा तथा बांदा जनपद की सारी जागीरें जब्त कर लीं थी। ऐसे में आज भी खुर्जा में जंगे आजादी के कई निशान हैं जो उसकी याद दिलाते हैं।
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