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'महिला बैंक' में खाता नहीं खुलवाना चाहतीं यहां की औरतें!

Wed, 04 Dec 2013 02:27 PM IST
आलोक प्रकाश पुतुल
आलोक प्रकाश पुतुल Updated Wed, 04 Dec 2013 02:27 PM IST
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women bank_raipur_

छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर के चंगोराभाटा इलाके में रहने वाली देवमति देवांगन से अगर आप भारतीय महिला बैंक की चर्चा करें तो वह लगभग बिफर जाती हैं। उन्हें इस बैंक के बारे में तो नहीं पता लेकिन वे अपने शहर के इंदिरा प्रियदर्शिनी महिला नागरिक सहकारी बैंक को चाह कर भी नहीं भुला पातीं।

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रायपुर शहर के इंदिरा प्रियदर्शिनी महिला नागरिक सहकारी बैंक में उन्होंने करीब 12 साल पहले अपना खाता खुलवाया था। अलग-अलग तरह के काम धंधे करके बडी मुश्किल से जुटाए गए एक लाख रुपए से अधिक की रकम उन्होंने खाते में जमा करवाए।
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महिलाओं के लिये खास तौर पर बनाए गए इस बैंक के संचालक मंडल में केवल महिलाएं थीं। बैंक में केवल महिलाओं को ही ऋण देने की व्यवस्था भी थी।

देवमति की योजना थी कि कुछ सालों बाद बैंक से ऋण ले कर अपना पत्तल-दोना बनाने का व्यापार शुरू करेंगी। लेकिन एक दिन खबर मिली की बैंक बंद हो गया है।

देवमति के सारे सपने तार-तार हो गये।

वे कहती हैं, “अब महिला बैंक हो चाहे मर्द बैंक, मैं भले अपनी कमाई किसी अनाथ आश्रम में दे दूं बैंक में तो कदम नहीं रखूंगी।”

महिला बैंक
गौरतलब है कि समाज के कमजोर वर्ग की महिलाओं को बेहद कम ब्याज दर पर कर्ज देकर उन्हें आर्थिक तौर पर स्वावलंबी बनाने के उद्देश्य से भारत सरकार ने 'महिला' बैंक शुरू करने की पहल की है।
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कुछ हफ्तों पहले ही गुवाहाटी, कोलकाता, चेन्नई, मुंबई, अहमदाबाद, बेंगलुरु और लखनऊ में महिला बैंक की शाखाएं खोली गई हैं।

इस बैंक का मकसद काम और सेवा में महिलाओं को प्राथमिकता देना है।

लेकिन रायपुर के लोग इंदिरा प्रियदर्शिनी बैंक के अनुभव की वजह से कडवाहट से भरे हुए हैं।

रायपुर शहर के सर्वाधिक व्यस्ततम सदर बाजार के इलाके में वर्ष 1995 में जब महिलाओं के लिये खास तौर पर इंदिरा प्रियदर्शिनी महिला नागरिक सहकारी बैंक खोला गया तो महिलाओं में गजब का उत्साह था।

सब कुछ ठीक-ठीक चल रहा था। लेकिन बाद में बैंक के कुछ अधिकारियों और संचालक मंडल के घोटाले के मामले सामने आए 2 अगस्त 2006 को बैंक में तालाबंदी हो गई।

शहर में मौजूद बैंक की दो शाखाएं भी बंद हो गईं।

इंदिरा प्रियदर्शिनी महिला नागरिक सहकारी बैंक संघर्ष समिति के कन्हैया अग्रवाल बताते हैं कि जब बैंक के आखरी दिनों उसके 25 हजार से ज्यादा उपभोक्ता थे। इनमें से ज्यादातर लोग ऐसे थे जिन्होंने सालों छोटी-छोटी रकम खाते में जमा करवाए थे। इससे उनके सपने भी जुडे थे - किसी के व्यापार की योजना, बेटी की शादी, बच्चों की पढाई वगैरह।

कन्हैया अग्रवाल का इलजाम है, "संचालक मंडल के सदस्यों और बैंक प्रबंधन ने 54 करोड से अधिक की रकम का घालमेल किया। फिर उन्होंने एक दिन अचानक बैंक बंद करने की घोषणा कर दी।”

मुख्यमंत्री पर आरोप

मामले की पुलिस में रिपोर्ट हुई। धरना प्रदर्शनों का सिलसिला शुरू हुआ। सरकार ने कुछ खाता धारकों का पैसा वापस भी किया। कुछ आरोपियों की गिरफ्तारी भी हुई और आरोपी जमानत पर छूट कर बाहर भी आ गये। लेकिन इस मामले ने इस साल जुलाई में तब तूल पकडा, जब इस बंद हो चुके बैंक के प्रबंधक की नार्को टेस्ट की सीडी सार्वजनिक हुई।

छत्तीसगढ पुलिस द्वारा कराये गए इस नार्को टेस्ट की सीडी में बैंक प्रबंधक ने दावा किया था कि उसने बैंक घोटाले को दबाने के लिये राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह और उनके चार मंत्रियों को करोडों रुपए की रिश्वत दी थी।

रायपुर के पुलिस महानिरीक्षक जीपी सिंह का कहना है कि नार्को टेस्ट की जो सीडी सार्वजनिक हुई, उसकी विश्वसनीयता पर कोई सवाल नहीं है। लेकिन नार्को टेस्ट के दौरान बैंक प्रबंधक ने जो बयान दिया था उसमें विरोधाभास था। इसलिये उस सीडी को अदालत में पेश नहीं किया गया।


रायपुर की महापौर किरणमयी नायक का कहना है कि इस पूरे घोटाले को दबाने की कोशिश की गई।

वे कहती हैं, "आंदोलन के अलावा मंत्रियों के भ्रष्टाचार की सीडी भी बंटी है। अभी चुनाव में भी यह मुद्दा था और रिजल्ट के बाद इसका परिणाम पता चलेगा।”

किरणमयी नायक मानती हैं कि महिला बैंक के इस घोटाले में उन महिलाओं का भरोसा टूटा है, जो छोटा-मोटा काम करके इस बैंक में अपना पैसा जमा करती थीं।
अफसरों की अनियमितता

हालांकि बिलासपुर की बिलासा महिला नागरिक सहकारी बैंक की अध्यक्ष अरुणा दीक्षित इससे सहमत नहीं हैं।

वे मानती हैं कि उनके बैंक समेत दूसरे महिला बैंकों में भी राजनीतिक हस्तक्षेप होता है लेकिन रायपुर का महिला बैंक अफसरों की अनियमितता का शिकार हुआ।

अरुणा दीक्षित कहती हैं, “हमारे बैंक में लगभग नौ हजा खाताधारक हैं और संचालक मंडल में 12 महिलाएं हैं। 16 सालों से हमारा काम बेहतर तरीके से चल रहा है। मुझे लगता है कि अब कहीं जा कर जब भारतीय महिला बैंक की शुरुआत हुई है तो इसे महिलाओं को सुदृढ बनाने की दिशा में एक बडे कदम के तौर पर देखा जाना चाहिए।”

लेकिन जाहिर तौर पर देवमति और उनके जैसी जिन सैकडों महिलाओं के पैसे बैंक में डूब गए हैं, उनके सवालों के जवाब किसी के पास नहीं है।

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