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केवल आपराधिक मामला लंबित होने पर नियुक्ति रोकना अनुचित: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
Thu, 08 Oct 2026 08:41 PM IST
अमन कोशले
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
अमर उजाला नेटवर्क, रायपुर
Published by: अमन कोशले
Updated Thu, 08 Oct 2026 08:41 PM IST
सार
उच्च न्यायालय ने आरक्षक भर्ती के एक महत्वपूर्ण मामले में व्यवस्था दी है कि केवल आपराधिक मामला लंबित होने के आधार पर किसी अभ्यर्थी की नियुक्ति रोकना अनुचित है।
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छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने आरक्षक भर्ती के एक महत्वपूर्ण मामले में व्यवस्था दी है कि केवल आपराधिक मामला लंबित होने के आधार पर किसी अभ्यर्थी की नियुक्ति रोकना अनुचित है। उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु ने बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में आरक्षक पद पर नियुक्ति से जुड़े मामले की सुनवाई करते हुए सक्षम अधिकारी को निर्देश दिया है। अदालत ने सक्षम प्राधिकारी को याचिकाकर्ता के दस्तावेज पर विचार करके 60 दिन के भीतर कानून के अनुसार स्पष्ट और कारण दर्शाते हुए आदेश पारित करने का समय दिया है। अदालत के इस निर्णय से भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और योग्य अभ्यर्थियों को न्याय मिलने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
चयन प्रक्रिया और विभाग की रोक
यह मामला जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम धनगांव निवासी नरेंद्र पाल बर्मन से जुड़ा हुआ है। पुलिस विभाग ने 1 जनवरी 2024 को नया रायपुर से आरक्षक भर्ती के लिए एक विज्ञापन जारी किया था। याचिकाकर्ता ने अनुसूचित जाति वर्ग के तहत बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में आरक्षक पद के लिए अपना आवेदन जमा किया था। इसके पश्चात अभ्यर्थी ने शारीरिक मापदंड परीक्षा तथा लिखित परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की। परीक्षा परिणाम आने पर प्रतीक्षा सूची में याचिकाकर्ता का नाम पहले स्थान पर आया, जिसके बाद विभाग ने उसे चिकित्सीय जांच के लिए भेजा।
नरेंद्र पाल बर्मन ने भर्ती प्रक्रिया के दौरान जमा किए गए चरित्र सत्यापन प्रपत्र में अपने विरुद्ध न्यायालय में लंबित आपराधिक मामले की पूरी जानकारी दर्ज की थी। उसने विभाग से कोई भी तथ्य नहीं छिपाया था। इसके बावजूद पुलिस विभाग ने उसे नियुक्ति पत्र प्रदान नहीं किया। विभाग ने मौखिक रूप से अभ्यर्थी को सूचित किया कि अदालत में आपराधिक प्रकरण लंबित होने के कारण उसको नियुक्ति नहीं दी जा रही है।
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याचिकाकर्ता की दलील और पैरवी
नियुक्ति न मिलने से परेशान होकर अभ्यर्थी ने अधिवक्ता नरेंद्र मेहर के माध्यम से उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। इस याचिका पर सुनवाई न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी तथा अधिवक्ता जैनब मुस्तफा वनक ने अदालत में पक्ष रखा। अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि किसी योग्य उम्मीदवार को महज इसलिए नौकरी से वंचित नहीं कर सकते क्योंकि उसके खिलाफ कोई मामला अदालत में चल रहा है।
याचिकाकर्ता के वकीलों ने जोर देकर कहा कि संबंधित आपराधिक मामले में अदालत ने अभ्यर्थी को दोषी साबित नहीं किया है। मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए अभ्यर्थी को दोषी मानकर उसकी उम्मीदवारी को खारिज करना विधि के विपरीत है। अभ्यर्थी ने सत्यापन फॉर्म भरते समय अपने खिलाफ लंबित प्रकरण की जानकारी स्वयं दी थी, जो उसकी निष्पक्षता और ईमानदारी को दर्शाती है।
उच्चतम न्यायालय की नजीर और आदेश
याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने अपने तर्कों के समर्थन में उच्चतम न्यायालय के दो प्रमुख निर्णयों का हवाला दिया। उन्होंने 'अवतार सिंह बनाम केंद्र सरकार' तथा 'अजहर मेहर बनाम भारत संघ' के मामलों में दिए गए निर्णयों को प्रस्तुत किया। इन निर्णयों में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि यदि किसी उम्मीदवार ने अपने विरुद्ध लंबित आपराधिक मामले की जानकारी विभाग से नहीं छिपाई है, तो विभाग को केवल मामला लंबित होने के आधार पर आवेदन निरस्त करने के बजाय आपराधिक कृत्य की प्रकृति और परिस्थितियों को देखकर निर्णय लेना चाहिए।
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चयन प्रक्रिया और विभाग की रोक
यह मामला जांजगीर-चांपा जिले के ग्राम धनगांव निवासी नरेंद्र पाल बर्मन से जुड़ा हुआ है। पुलिस विभाग ने 1 जनवरी 2024 को नया रायपुर से आरक्षक भर्ती के लिए एक विज्ञापन जारी किया था। याचिकाकर्ता ने अनुसूचित जाति वर्ग के तहत बलौदाबाजार-भाटापारा जिले में आरक्षक पद के लिए अपना आवेदन जमा किया था। इसके पश्चात अभ्यर्थी ने शारीरिक मापदंड परीक्षा तथा लिखित परीक्षा सफलतापूर्वक उत्तीर्ण की। परीक्षा परिणाम आने पर प्रतीक्षा सूची में याचिकाकर्ता का नाम पहले स्थान पर आया, जिसके बाद विभाग ने उसे चिकित्सीय जांच के लिए भेजा।
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नरेंद्र पाल बर्मन ने भर्ती प्रक्रिया के दौरान जमा किए गए चरित्र सत्यापन प्रपत्र में अपने विरुद्ध न्यायालय में लंबित आपराधिक मामले की पूरी जानकारी दर्ज की थी। उसने विभाग से कोई भी तथ्य नहीं छिपाया था। इसके बावजूद पुलिस विभाग ने उसे नियुक्ति पत्र प्रदान नहीं किया। विभाग ने मौखिक रूप से अभ्यर्थी को सूचित किया कि अदालत में आपराधिक प्रकरण लंबित होने के कारण उसको नियुक्ति नहीं दी जा रही है।
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याचिकाकर्ता की दलील और पैरवी
नियुक्ति न मिलने से परेशान होकर अभ्यर्थी ने अधिवक्ता नरेंद्र मेहर के माध्यम से उच्च न्यायालय में याचिका दायर की। इस याचिका पर सुनवाई न्यायमूर्ति बी.डी. गुरु के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मतीन सिद्दीकी तथा अधिवक्ता जैनब मुस्तफा वनक ने अदालत में पक्ष रखा। अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि किसी योग्य उम्मीदवार को महज इसलिए नौकरी से वंचित नहीं कर सकते क्योंकि उसके खिलाफ कोई मामला अदालत में चल रहा है।
याचिकाकर्ता के वकीलों ने जोर देकर कहा कि संबंधित आपराधिक मामले में अदालत ने अभ्यर्थी को दोषी साबित नहीं किया है। मामला अभी न्यायालय में विचाराधीन है, इसलिए अभ्यर्थी को दोषी मानकर उसकी उम्मीदवारी को खारिज करना विधि के विपरीत है। अभ्यर्थी ने सत्यापन फॉर्म भरते समय अपने खिलाफ लंबित प्रकरण की जानकारी स्वयं दी थी, जो उसकी निष्पक्षता और ईमानदारी को दर्शाती है।
उच्चतम न्यायालय की नजीर और आदेश
याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने अपने तर्कों के समर्थन में उच्चतम न्यायालय के दो प्रमुख निर्णयों का हवाला दिया। उन्होंने 'अवतार सिंह बनाम केंद्र सरकार' तथा 'अजहर मेहर बनाम भारत संघ' के मामलों में दिए गए निर्णयों को प्रस्तुत किया। इन निर्णयों में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि यदि किसी उम्मीदवार ने अपने विरुद्ध लंबित आपराधिक मामले की जानकारी विभाग से नहीं छिपाई है, तो विभाग को केवल मामला लंबित होने के आधार पर आवेदन निरस्त करने के बजाय आपराधिक कृत्य की प्रकृति और परिस्थितियों को देखकर निर्णय लेना चाहिए।