फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Chhattisgarh ›   wife of mahendra karma is fighting election on his seat

दंतेवाड़ा में महेंद्र कर्मा ही एकमात्र मुद्दा

Sun, 10 Nov 2013 12:01 PM IST
सुदीप ठाकुर/अमर उजाला, दंतेवाड़ा
सुदीप ठाकुर/अमर उजाला, दंतेवाड़ा Updated Sun, 10 Nov 2013 12:01 PM IST
विज्ञापन
wife of mahendra karma is fighting election on his seat

यहां से 14 किमी. दूर फरसपाल में बीते तीन दशकों के दौरान यहां हुए हर विधानसभा और लोकसभा चुनावों में बेहद गहमागहमी वाले इस घर में आज सन्नाटा पसरा हुआ है।

विज्ञापन


यह 'बस्तर टाइगर' के नाम से मशहूर रहे महेंद्र कर्मा का घर है, जहां आज उनकी एक भाभी जमली और छत्तीसगढ़ आर्म्ड फोर्स के जवान ही नजर आते हैं।

25 मई को झीरमघाटी में कांग्रेसी नेताओं के काफिले पर हुए भीषण नक्सली हमले में कर्मा और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नंदकुमार पटेल सहित तीस लोग मारे गए थे।

कर्मा के न होने का असर फरसपाल में साफ देखा जा सकता है। जाहिर है, यदि कर्मा आज जिंदा होते, तो वे दंतेवाड़ा से चुनाव लड़ रहे होते। वे पहली बार 1980 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से विधायक चुने गए थे। उसके बाद वे दो बार कांग्रेस से विधायक और एक बार 1996 में जगदलपुर से निर्दलीय सांसद चुने गए थे।
विज्ञापन


मगर झीरमघाटी की घटना ने न केवल कर्मा परिवार की राजनीतिक योजनाओं को, बल्कि दक्षिण बस्तर और कुछ हद तक प्रदेश कांग्रेस की राजनीति को उलट-पुलट दिया।

कर्मा की मौत के बाद अचानक राजनीति में आईं उनकी पत्नी देवती कर्मा को कांग्रेस ने यहां से उम्मीदवार बनाया है। जमली बताती हैं कि इसी वजह से महेंद्र कर्मा के परिजन फरसपाल के बजाए दंतेवाड़ा में ज्यादा रहते हैं। देवती देवी के साथ उनका पूरा परिवार जुटा हुआ है। उनका एक बेटा दीपक नगर पंचायत अध्यक्ष है और बेटी सुलोचना जिला पंचायत सदस्य।
विज्ञापन
विज्ञापन


mahendra karma


















उनके मुकाबले मौजूदा भाजपा विधायक भीमा मंडावी के साथ ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के बोमड़ाराम कोवासी भी उम्मीदवार हैं। 2008 के विधानसभा चुनाव में भी यहां त्रिकोणीय मुकाबला हुआ था, जिसमें भीमा मंडावी विजयी हुए थे और सीपीआई के मनीष कुंजाम के बाद कुछ कम अंतर से ही सही कर्मा तीसरे नंबर पर थे। तो क्या 'कर्मा की शहादत' यहां के नतीजे बदल सकती है।

वास्तव में देवती के लिए उनके पति की मौत ही सबसे बड़ा मुद्दा है। भाजपा के मौजूदा विधायक और उम्मीदवार भीमा मंडावी ऐसा नहीं मानते। वह कहते हैं कि आदिवासियों को डॉ. रमन सिंह की सरकार ने खाद्यान सुरक्षा दी है और जितना विकास पिछले दस वर्षों में हुआ वैसा पहले कभी नहीं हुआ। इस पर बहस हो सकती है। लेकिन यह कहना जरा मुश्किल है कि कर्मा की मौत यहां बड़ा भावनात्मक मुद्दा बन पाई है।

हालांकि हकीकत यह है कि कर्मा 2005 में चलाए गए सलवा जुड़ूम के कारण नक्सलियों के निशाने पर पहले से थे। तब वे विपक्ष के नेता थे और छत्तीसगढ़ में लोग उन्हें 12 सदस्यीय रमन मंत्रिमंडल का 13वां मंत्री तक कहते थे। उनके बेटे छबींद्र कर्मा कहते हैं कि हमारी रैलियों में जनता स्वस्फूर्त तरीके से आ रही है। इससे यह साफ होता है कि जनता बदलाव चाहती है। दंतेवाड़ा में यही चुनावी चर्चा है कि क्या महेंद्र कर्मा का मुद्दा कोई बदलाव ला पाएगा।

मनीष कुंजाम ने क्यों बदली सीट?
संभवतः यह कर्मा की मौत का ही असर है कि पिछली बार दूसरे स्थान पर रहे सीपीआई उम्मीदवार मनीष कुंजाम इस बार दंतेवाड़ा के बजाए इससे सटी अपनी पुरानी सीट कोंटा से उम्मीदवार हैं। मनीष कुंजाम आदिवासी महासंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं और दो वर्ष पहले तब चर्चा में आए थे जब बस्तर के नवगठित सुकमा जिले के पहले कलेक्टर एलेक्स पाल मेनन को नक्सलियों ने अगवा किया था और तब वे मेनन के लिए दवा लेकर जंगल के भीतर गए थे।

jamli


















कोंटा से पिछली बार सीपीआई के उम्मीदवार रहे रामा सोरी कहते हैं कि कोंटा ही मनीष की असली सीट है और इस बार हमने खूब मेहनत की है। वास्तव में कोंटा क्षेत्र में यदि सर्वाधिक झंडे और बैनर नजर आते हैं तो वह सीपीआई के ही हैं। वह कांग्रेस के मौजूदा विधायक कवासी लकमा के खिलाफ मैदान में हैं। यही वही कवासी हैं, जो झीरमघाटी के हमले में बच गए थे।


कर्मा परिवार को भी हुई थी चतुर्थ श्रेणी की नौकरी की पेशकश
महेंद्र कर्मा की नक्सली हमले में मौत के बाद राज्य की रमन सिंह सरकार ने उनके परिजनों को चतुर्थ श्रेणी की नौकरी की पेशकश की थी। असल में ऐसे मामलों में अनुकंपा नियुक्ति का प्रावधान है। कर्मा की बेटी सुलोचना ने अमर उजाला को बताया कि तहसील ऑफिस से एक पत्र आया था जिसमें परिवार के एक सदस्य को तृतीय या चतुर्थ श्रेणी की सरकारी नौकरी का प्रस्ताव दिया गया था।

इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है। वह कहती हैं कि मैं खुद और मेरे चार भाई पढ़े-लिखे हैं, बल्कि मेरा एक भाई आशीष तो दिल्ली में यूपीएससी की तैयारी ही कर रहा है। कम से कम उसे डिप्टी कलेक्टर बनाया जा सकता था।

उनसे जब यह पूछा गया कि दिग्गज राजनीतिक परिवार का सदस्य होने के बावजूद क्या उनका कोई भाई सरकारी मुलाजिम बनना पसंद करेगा। वह कहती हैं, मेरे पापा चाहते थे कि आशीष आईएएस अफसर बने। इसके लिए उन्होंने तैयारी करने के लिए दिल्ली भेजा, मगर उनकी मौत के बाद से वह यहीं हैं।

(ऊपर दी गई दूसरी तस्वीर में बाईं ओर महेंद्र कर्मा की भाभी जमली और दाईं ओर कर्मा की बेटी सुलोचना खड़ी हैं।)

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed